ओशो...
मैंने सुना है, जापान के एक गांव में एक सुंदर युवा फकीर रहता था। सारा गांव उसे श्रद्धा और आदर देता था।
लेकिन एक दिन सारी बात बदल गयी। गांव में अफवाह उड़ी कि उस फकीर से किसी लड़की को एक बच्चा पैदा हो गया है। उस स्त्री ने अपने बाप को कह दिया है कि यह उसी फकीर का बच्चा है, जो गांव के बाहर रहता है। वही फकीर इसका बाप है।
सारा गांव टूट पड़ा उस फकीर पर। जाकर उसकी झोपड़ी में आग लगा दी। सुबह सर्दी के दिन थे, वह - बैठा था। उसने पूछा कि ‘‘मित्रों, यह क्या कर रहे हो? क्या बात है?''
तो उन्होंने उस नवजात बच्चे को उसकी गोद में पटक दिया और कहा, हमसे पूछते हो, क्या बात है न यह बच्चा तुम्हारा है।''
उस फकीर ने कहा, ‘‘इज इट सो? क्या ऐसी बात है? अगर तुम कहते हो, ठीक ही कहते होओगे। क्योंकि भीड़ तो कुछ गलत कहती ही नहीं भीड़ तो हमेशा सत्य ही कहती है। अब तुम कहते हो, तो ठीक ही कहते होओगे। ''
वह बच्चा रोने लगा, तो वह फकीर उसे थपथपाने लगा। गांव भर के लोग गालियां देकर वापस लौट आये और उस बच्चे को उसके पास छोड़ आये।
फिर दोपहर को जब फकीर भीख मांगने निकला, तो उस बच्चे को लेकर भीख मांगने निकला गांव मैं। कौन उसे भीख देगा? आप भीख देते? कोई उसे भीख नहीं देगा। जिस दरवाजे पर वह गया, दरवाजे बंद हो गये।
उस रोते हुए छोटे बच्चे को लेकर उस फकीर का उस गांव से गुजरना….। बडी अजीब सी हालत हो गयी उसकी। लोगों की भीड़ उसके पीछे चलने लगी, उसे गालियां देती हुई।
फिर वह उस दरवाजे के सामने पहुंचा, जिसकी बेटी को यह बच्चा हुआ था। और उसने उस दरवाजे के सामने आवाज लगायी कि कसूर मेरा होगा इसका बाप होने में, लेकिन इसका मेरा बेटा होने में क्या कसूर हो सकता है।
बाप होने में मेरी गलती होगी, लेकिन बेटा होने में इसकी तो कोई गलती नहीं हो सकती। कम से कम इसे तो दूध मिल जाये।
उस बच्चे को जन्म देनेवाली लड़की द्वार पर ही खड़ी थी। उसके प्राण कंप गये, फकीर को भीड़ में घिरा हुआ पत्थर खाते हुए देखकर छिपाना मुश्किल हो गया।
उसने बाप के पैर पकड़ लिये, कहा, मुझे क्षमा करें, इस फकीर को तो मैं पहचानती भी नहीं। सिर्फ इसके असली बाप को बचाने के लिये मैंने इस फकीर का झूठा नाम ले दिया था! ''बाप आकर फकीर के पैरों पर गिर पड़ा और बच्चे को फकीर से छीन लिया। और फकीर से क्षमा मांगने लगा।
फकीर ने पूछा, ‘‘लेकिन बात क्या है? बच्चे को क्यों छीन लिया तुमने? उसके बाप ने कहा, लड़की के बाप ने, ''आप कैसे नासमझ हैं। आपने ही क्यों न बताया कि यह बच्चा आपका नहीं है?
''उस फकीर ने कता, ''इज इट सो, क्या ऐसा है? मेरा बेटा नहीं है? तुम्हीं तो सुबह कहते थे कि तुम्हारा है, और भीड़ तो कभी झूठ बोलती नहीं है। अगर तुम बोलते हो नहीं है मेरा, तो नहीं होगा। ''
लोग कहने लगे कि ‘‘तुम कैसे पागल हो! तुमने सुबह कहा क्यों नहीं कि बच्चा तुम्हारा नहीं है। तुम इतनी निंदा और अपमान झेलने को राजी क्यों हुए?''
उस फकीर ने कहा, मैंने तुम्हारी कभी चिंता नहीं की, कि तुम क्या सोचते हो। तुम आदर देते हो कि अनादर तुम श्रद्धा देते हो कि निंदा। मैंने तुम्हारी आंखों की तरफ देखना बंद कर दिया है। मैं अपनी तरफ देखूं कि तुम्हारी आंखों की तरफ देखूं। जब तक मैं तुम्हारी आंखों में देखता रहा, तब तक अपने को मैं नहीं देख पाया।
और तुम्हारी आंख तो प्रतिपल बदल रही है। और हर आदमी की आंख अलग है। हजार-हजार दर्पण हैं, मैं किस-किस में देखूं। अब मैंने अपने में ही झांकना शुरू कर दिया है।
अब मुझे फिक्र नहीं है कि तुम क्या कहते हो? अगर तुम कहते हो कि बच्चा मेरा है, तो ठीक ही कहते हो। मेरा ही होगा। आखिर किसी का तो होगा ही? मेरा ही सही। तुम कहते हो कि मेरा नहीं है, तो तुम्हारी मर्जी। नहीं होगा। लेकिन मैंने तुम्हारी आंखों में देखना बंद कर दिया है।
....और वह फकीर कहने लगा कि मैं तुमसे भी कहता हूं कि कब वह दिन आयेगा कि तुम दूसरों की आंखों में देखना बंद कर देंगे, और अपनी तरफ देखना शुरू करोगे....?
यह दूसरा सूत्र आपसे कहना चाहता हूं जीवन क्रांति का कि मत देखो दूसरों की आंखों में कि आप क्या हैं।
वहां जो भी तस्वीर बन गयी है, वह आपके वस्त्रों की तस्वीर है, वह आपकी दिखावट है, वह आपका नाटक है, वह आपकी एक्टिंग है-वह आप नहीं हैं, क्योंकि आप कभी प्रगट ही न हो सके, जो आप हैं, तो उसकी तसवीर कैसे बनेगी! वहां तो आपने जो दिखाना चाहा है, वह दिख रहा है।
भीड़ से बचना धार्मिक आदमी का पहला कर्त्तव्य है, लेकिन भीड़ से बचने का मतलब यह नहीं है कि आप जंगल में भाग जायें। भीड़ से बचने का मतलब क्या है?
समाज से मुक्त होना धार्मिक आदमी का पहला लक्षण है, लेकिन समाज से मुक्त होने का क्या मतलब है?
समाज से मुक्त होने का मतलब यह नहीं है कि आदमी भाग जाये जंगल में। वह समाज से मुक्त होना नहीं है। वह समाज की ही धारणा है संन्यासी के लिये कि जो आदमी समाज छोड्कर भाग जाता है, वह उसको ही आदर देता है। यह समाज से भागना नहीं है। यह तो समाज की ही धारणा को मानना है। यह तो समाज के ही दर्पण में अपना चेहरा देखना है।
गेरुए वस्र पहन कर खड़े हो जाना संन्यासी हो जाना नहीं है। वह तो समाज की आंखों में, समाज के दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखना है। क्योंकि अगर समाज गेरुए वस्त्र को आदर देना बंद कर दे, तो मैं गेरुआ वस्त्र नहीं पहनूंगा।
अगर समाज आदर देता है एक आदमी को-पत्नी और बच्चों को छोड्कर भाग जाने को-तो आदमी भाग जाता है। यहां भी वह समाज की आंखों में देख रहा है। .....नहीं, यह समाज को छोड़ना नहीं है।
समाज को छोड़ने का अर्थ है-समाज की आंखों में अपने प्रतिबिंब को देखना बंद कर दें।
अगर जीवन में कोई भी क्रांति चाहिये, तो लोगों की आंखों में देखना बंद कर दें। भीड़ के दर्पण में देखना बंद कर दें।
संभोग से समाधि की ओर--ओशो (सोलहवां प्रवचन) #📒 मेरी डायरी #☝ मेरे विचार