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😂पहेलियाँ ❓ - DG puzzle चित्र में १० अंतर ढूंढिए.. ~ ~ 7 DG puzzle चित्र में १० अंतर ढूंढिए.. ~ ~ 7 - ShareChat
#bhakti #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏 देवी दर्शन🌸 #👉 लोगों के लिए सीख👈
bhakti - f4٠] से प्रश्न पूछा, तब भगवान ने उन्हें एक अमृत नारद मुनि ने जब भगवान कलश लेकर तीनों लोकों की परिक्रमा करने को कहा। तीनों लोकों की परिक्रमा TauT f49] एक बार नारद मुनि ने भगवान ٦ ؟٥  ٤ ने पूछा, इस दौरान मेरा स्मरण कितनी बार किया?' नारद मुनि बोले हे प्रभु मेरा ध्यान केवल  भगवन, इस समय आपका सबसे प्रिय भक्त कौन विष्णु  ೯?'  'ar बोले,   मेरा सबसे प्रिय भक्त कलश पर था, आपका ध्यान कहां कर सकता था। एक किसान है। नारद मुनि निराश मन से बोले   मैं बोले हे नारद, वही भगवान तो आपका बड़ा भक्त हूं॰ फिर आपका सबसे प्रिय मेरा सच्चा प्रिय भक्त है, जो कर्म क्यों नहीं?' भगवान बोले इसका जवाब तुम स्वयं करते हुए भी मेरा स्मरण करे। खोजो। फिर उन्होंने नारद मुनि को एक अमृत से भरा  तुम तो लगातार जप करते हो, पर जब तुम्हें कर्म दिया गया, तब  कलश थमाया और कहा, इस कलश को लेकर तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही तीनों लोकों की परिक्रमा कर आओ, लेकिन ध्यान EIEI नहीं था। रहे, एक बूंद भी गिर गई, तो तुम्हारा पुण्य नष्ट हो किसान हर दिन काम करते जाएगा ।' नारद मुनि यात्रा पर निकले।  भी थोड़ा समय निकाल लेता স্থা় fিথ 9্াব মদম্ব নিন্ষাল লনি  तीनों लोकों की परिक्रमा के दौरान उनका पूरा पर था। वे हर जगह ध्यानपूर्वक  है। इसलिए  वह ध्यान कवल कलश भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने चलते, अमृत को एक बूंद भी गिरने न दी॰ और सुरक्षित लौट आए कहा, आपने मेरा दृष्टिकोण बदल दिया। अंततः भगवान के पास | মাণান f4٠] से प्रश्न पूछा, तब भगवान ने उन्हें एक अमृत नारद मुनि ने जब भगवान कलश लेकर तीनों लोकों की परिक्रमा करने को कहा। तीनों लोकों की परिक्रमा TauT f49] एक बार नारद मुनि ने भगवान ٦ ؟٥  ٤ ने पूछा, इस दौरान मेरा स्मरण कितनी बार किया?' नारद मुनि बोले हे प्रभु मेरा ध्यान केवल  भगवन, इस समय आपका सबसे प्रिय भक्त कौन विष्णु  ೯?'  'ar बोले,   मेरा सबसे प्रिय भक्त कलश पर था, आपका ध्यान कहां कर सकता था। एक किसान है। नारद मुनि निराश मन से बोले   मैं बोले हे नारद, वही भगवान तो आपका बड़ा भक्त हूं॰ फिर आपका सबसे प्रिय मेरा सच्चा प्रिय भक्त है, जो कर्म क्यों नहीं?' भगवान बोले इसका जवाब तुम स्वयं करते हुए भी मेरा स्मरण करे। खोजो। फिर उन्होंने नारद मुनि को एक अमृत से भरा  तुम तो लगातार जप करते हो, पर जब तुम्हें कर्म दिया गया, तब  कलश थमाया और कहा, इस कलश को लेकर तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही तीनों लोकों की परिक्रमा कर आओ, लेकिन ध्यान EIEI नहीं था। रहे, एक बूंद भी गिर गई, तो तुम्हारा पुण्य नष्ट हो किसान हर दिन काम करते जाएगा ।' नारद मुनि यात्रा पर निकले।  भी थोड़ा समय निकाल लेता স্থা় fিথ 9্াব মদম্ব নিন্ষাল লনি  तीनों लोकों की परिक्रमा के दौरान उनका पूरा पर था। वे हर जगह ध्यानपूर्वक  है। इसलिए  वह ध्यान कवल कलश भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने चलते, अमृत को एक बूंद भी गिरने न दी॰ और सुरक्षित लौट आए कहा, आपने मेरा दृष्टिकोण बदल दिया। अंततः भगवान के पास | মাণান - ShareChat
#✍️ जीवन में बदलाव #👉 लोगों के लिए सीख👈 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #☝अनमोल ज्ञान
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #bhakti
🕉️सनातन धर्म🚩 - चंद्रजयंती (१५ फरवरी ) शिवनेमस्तकपर धारणकिया चंद्रमा चंद्रमा का जन्म फाल्गुन मास को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हुआ था। शिव-पार्वती के विवाह  को इस तिथि को महाशिवरात्रि के रूप गें मनाया जाता है। शिव ने चंद्रमा को इसो दिन अपने मस्तक पर धारण किया था। ऋग्वेद के ' पुरुष सूक्त खंड में वर्णन है कि चंद्रमा  का जन्म मन से और सूर्य का जन्म आदिम सत्ता की चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो आंखों से हुआ था।  अजायत , इसलिए चंद्रमा को॰  मन' या मन के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। मन जिसकी कोई थाह नहीं है। मन की जीवन में निर्णायक भूमिका होती है, क्योंकि कहा गया है- ' मन के हारे हार है मन के जोते जीत। नव ग्रहों में रानी और संबंधों में मां के रूप में प्रतिष्ठित, कोमल भावनाओं का प्रतीक राजसी सुख भी देता है। चंद्रमा " ऐसा  मत्स्य एवं अग्नि पुराण में ப = 1 जब विष को ज्वाला सेशिव॰का मस्तिष्क जलने लगा, तो उसे शीतलता प्रदान करने के लिए उन्होंने जब ब्रह्माजी सृष्टि को रचना कर रहे थे, तो उन्होने संकल्प से अपने दस मानस पुत्रों की उत्पत्ति की। मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया।  इन कथाओंके बीच चंद्रमा केजन्म का पद्म पुराण में इनमें - अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य मरीचि, पुलह क्रतु भीजिक्र आता है।ब्रह्याजो ने अपने मानस पुत्र अत्रिको भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और नारद थे। इनमें अत्रि ऋषि सृष्टि के विस्तार की आज्ञा दी। ऋषि अत्रिने अनुत्तर  का विवाह प्रजापति कर्दम और देवहूति की कन्या से हुआ| अनसूया से ।तप करते हुए ऋषि  दत्तात्रेय और नामकातप करना आरंभ करदिया ؟٩٨٩٢, अनसूया के नेत्रों से जल के कुछ कण टपक गए।दिव्य रोशनी से सोम तोन पुत्र हुए। सोम ही चंद्र के नाम से जाने जाते हैं। वैदिक काल में सोम का स्थान प्रमुख देवताओं कामना सेदिशाओं जगमगाते हुए उनकणों को पुत्रकी में था। सूर्य अग्नि और इंद्र आदि देवताओं की तरह  ने स्त्री रूप में धारण कर लिया, लेकिन वे उस तेज को सोम के भो स्तुति मंत्र प्रचलित हैें । संभाल नहीं पाईं और उसे त्याग दिया। ब्रह्याजी नेउस चंद्रमा केजन्म को एक अन्य कथा भी है।पौराणिक त्यागे हुए गर्भको पुरुष रूप दिया।यही पुरुष रूप चंद्रमा है। चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की सत्ताइस नक्षत्र कथा के अनुसार जब देवता और दानवों ने मिलकर  कन्याओं से हुआ | पत्नी रोहिणी के प्रति विशेष लगाव समुद्र मंथन किया था॰ तो उसमें चौदह रत्न निकले। चंद्रमा इन्हों में से एक थे। यद्यपि ग्रह रूप में चंद्रमा को केकारण दक्ष ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया था, जिसे उपस्थिति समुद्र मंथन से पहले भी थो। समुद्रसे निकले भगवानशिवनेआंशिकरूपसेठीककिया ।इसी कारण चंद्रमा घटते और बढ़ते हैं।  चौदह रत्नों में से दोको शिव ने ग्रहण किया एक कालकूट विष और दूसरा चंद्रमा | ऐसी मान्यता है कि चंद्रजयंती (१५ फरवरी ) शिवनेमस्तकपर धारणकिया चंद्रमा चंद्रमा का जन्म फाल्गुन मास को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हुआ था। शिव-पार्वती के विवाह  को इस तिथि को महाशिवरात्रि के रूप गें मनाया जाता है। शिव ने चंद्रमा को इसो दिन अपने मस्तक पर धारण किया था। ऋग्वेद के ' पुरुष सूक्त खंड में वर्णन है कि चंद्रमा  का जन्म मन से और सूर्य का जन्म आदिम सत्ता की चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो आंखों से हुआ था।  अजायत , इसलिए चंद्रमा को॰  मन' या मन के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। मन जिसकी कोई थाह नहीं है। मन की जीवन में निर्णायक भूमिका होती है, क्योंकि कहा गया है- ' मन के हारे हार है मन के जोते जीत। नव ग्रहों में रानी और संबंधों में मां के रूप में प्रतिष्ठित, कोमल भावनाओं का प्रतीक राजसी सुख भी देता है। चंद्रमा " ऐसा  मत्स्य एवं अग्नि पुराण में ப = 1 जब विष को ज्वाला सेशिव॰का मस्तिष्क जलने लगा, तो उसे शीतलता प्रदान करने के लिए उन्होंने जब ब्रह्माजी सृष्टि को रचना कर रहे थे, तो उन्होने संकल्प से अपने दस मानस पुत्रों की उत्पत्ति की। मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया।  इन कथाओंके बीच चंद्रमा केजन्म का पद्म पुराण में इनमें - अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य मरीचि, पुलह क्रतु भीजिक्र आता है।ब्रह्याजो ने अपने मानस पुत्र अत्रिको भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और नारद थे। इनमें अत्रि ऋषि सृष्टि के विस्तार की आज्ञा दी। ऋषि अत्रिने अनुत्तर  का विवाह प्रजापति कर्दम और देवहूति की कन्या से हुआ| अनसूया से ।तप करते हुए ऋषि  दत्तात्रेय और नामकातप करना आरंभ करदिया ؟٩٨٩٢, अनसूया के नेत्रों से जल के कुछ कण टपक गए।दिव्य रोशनी से सोम तोन पुत्र हुए। सोम ही चंद्र के नाम से जाने जाते हैं। वैदिक काल में सोम का स्थान प्रमुख देवताओं कामना सेदिशाओं जगमगाते हुए उनकणों को पुत्रकी में था। सूर्य अग्नि और इंद्र आदि देवताओं की तरह  ने स्त्री रूप में धारण कर लिया, लेकिन वे उस तेज को सोम के भो स्तुति मंत्र प्रचलित हैें । संभाल नहीं पाईं और उसे त्याग दिया। ब्रह्याजी नेउस चंद्रमा केजन्म को एक अन्य कथा भी है।पौराणिक त्यागे हुए गर्भको पुरुष रूप दिया।यही पुरुष रूप चंद्रमा है। चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की सत्ताइस नक्षत्र कथा के अनुसार जब देवता और दानवों ने मिलकर  कन्याओं से हुआ | पत्नी रोहिणी के प्रति विशेष लगाव समुद्र मंथन किया था॰ तो उसमें चौदह रत्न निकले। चंद्रमा इन्हों में से एक थे। यद्यपि ग्रह रूप में चंद्रमा को केकारण दक्ष ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया था, जिसे उपस्थिति समुद्र मंथन से पहले भी थो। समुद्रसे निकले भगवानशिवनेआंशिकरूपसेठीककिया ।इसी कारण चंद्रमा घटते और बढ़ते हैं।  चौदह रत्नों में से दोको शिव ने ग्रहण किया एक कालकूट विष और दूसरा चंद्रमा | ऐसी मान्यता है कि - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #🕉️सनातन धर्म🚩 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #✍️ जीवन में बदलाव
🙏 प्रेरणादायक विचार - সামথো-সনাথো डॉ . प्रकाशचंद्र गंगराड़े कष्ट दूर करसुख समृद्धिदेता पीपल पीपल केवृक्ष की पूजा क्यों की जाती है ?  নিলা कुमार अश्वत्थ तैत्तिरीय संहिता में प्रकृति के सात वृक्षों में पीपल को गणना है। पावन ब्रह्मवैवर्तपुराण में शी पीपल की पवित्रता के संदर्भ में उल्लेख মিলনা है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल का विष्णु  @ ಕ೫ 'arr का रूप इसीलिए इसे धार्मिक क्षेत्र मेंश्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली है। अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा का महिलाओं में यह विश्वास है कि॰ विधान है। सोमवती अमावस्या के दिनपीपल के वृक्ष में साक्षात भगवान पीपल की निरंतर   पूजा अर्चना विष्णु 1 एवंलक्ष्मो का वासहोता है। परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से में पोपल ( अश्वत्थ संतान को प्राप्ति होती है। पुण्य guf' কষা মিলনা बहुत महत्व बताया गया है। स्कंद है। अदृश्य आत्माएं होकर सहायकबनती हैं।कामना पूर्ति पीपल के पेड़ में पुराण के अनुसार  fqu केलिए पोपल के तने पर सूत लपेटने और महेश त्रिवेद यानी ब्रह्या का वास माना जाता है।मान्यता हैकि की भी परंपरा है। पीपल की जड़ में शनिवार को जल चढाने और दीपक पोपल के मूल ( जड़ में भगवान f್ जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का লম্মা; নন স মানান और ऊपरी शाखाओं मं भगवान शिव निवारण होता है। शनि को जब विराजते हैं।इसके अलावा, पीपल में साढ़ेसाती होती है॰ तो लोग पीपल के वृक्षका पूजन और परक्रिमा करते हैं पितरों का वास भो माना जाता है। इससे शनि जनित कष्ट कम होते हैँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं- और उनको कृपा प्राप्त होती है। अश्वत्यः सर्ववृक्षाणां | श्रीमद्भगवद्गीता १० २६ ) इसको छाल যস हवन पूजापाठ, पुराण कथा आदि के लिए अर्थात मैं सब वृक्षों में पीपल का श्रेष्ठ मानी गई है। पीपल के पत्तों से वृक्ष हूं। इस कथन में उन्होंने अपने शुभ काम में वंदनवार भी बनाए जाते आपको पीपल के वृक्ष में समासीन घोषित किया है हैं। वातावरण के दृषित तत्वों पद्मपुराण के मतानुसार पोपलको कीटाणुओं को नष्ट करने के कारण देवतुल्य प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा माना जाता है। पीपलको करने से आयु लंबी होती है।जो वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल निरंतर व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है, वह 24 ঘসোনসীতন নৈ নালা সলন सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग में वृक्ष है। इसके निकट रहने जाता है। पीपल में पितरों का वास प्राणशक्त बढती है।इसके अलावा माना गया है। इसमें सब तीर्थों का पीपल के a 3f # 7 निवास भी होता है॰ इसलिए मुंडन औषधीय गुण होने के कारण यह সানিস্োদৌপলননীনননোন रोगनाशक भी होता हे। का प्रचलन है। साभारः पुस्तक महल , दिल्लो সামথো-সনাথো डॉ . प्रकाशचंद्र गंगराड़े कष्ट दूर करसुख समृद्धिदेता पीपल पीपल केवृक्ष की पूजा क्यों की जाती है ?  নিলা कुमार अश्वत्थ तैत्तिरीय संहिता में प्रकृति के सात वृक्षों में पीपल को गणना है। पावन ब्रह्मवैवर्तपुराण में शी पीपल की पवित्रता के संदर्भ में उल्लेख মিলনা है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल का विष्णु  @ ಕ೫ 'arr का रूप इसीलिए इसे धार्मिक क्षेत्र मेंश्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली है। अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा का महिलाओं में यह विश्वास है कि॰ विधान है। सोमवती अमावस्या के दिनपीपल के वृक्ष में साक्षात भगवान पीपल की निरंतर   पूजा अर्चना विष्णु 1 एवंलक्ष्मो का वासहोता है। परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से में पोपल ( अश्वत्थ संतान को प्राप्ति होती है। पुण्य guf' কষা মিলনা बहुत महत्व बताया गया है। स्कंद है। अदृश्य आत्माएं होकर सहायकबनती हैं।कामना पूर्ति पीपल के पेड़ में पुराण के अनुसार  fqu केलिए पोपल के तने पर सूत लपेटने और महेश त्रिवेद यानी ब्रह्या का वास माना जाता है।मान्यता हैकि की भी परंपरा है। पीपल की जड़ में शनिवार को जल चढाने और दीपक पोपल के मूल ( जड़ में भगवान f್ जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का লম্মা; নন স মানান और ऊपरी शाखाओं मं भगवान शिव निवारण होता है। शनि को जब विराजते हैं।इसके अलावा, पीपल में साढ़ेसाती होती है॰ तो लोग पीपल के वृक्षका पूजन और परक्रिमा करते हैं पितरों का वास भो माना जाता है। इससे शनि जनित कष्ट कम होते हैँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं- और उनको कृपा प्राप्त होती है। अश्वत्यः सर्ववृक्षाणां | श्रीमद्भगवद्गीता १० २६ ) इसको छाल যস हवन पूजापाठ, पुराण कथा आदि के लिए अर्थात मैं सब वृक्षों में पीपल का श्रेष्ठ मानी गई है। पीपल के पत्तों से वृक्ष हूं। इस कथन में उन्होंने अपने शुभ काम में वंदनवार भी बनाए जाते आपको पीपल के वृक्ष में समासीन घोषित किया है हैं। वातावरण के दृषित तत्वों पद्मपुराण के मतानुसार पोपलको कीटाणुओं को नष्ट करने के कारण देवतुल्य प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा माना जाता है। पीपलको करने से आयु लंबी होती है।जो वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल निरंतर व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है, वह 24 ঘসোনসীতন নৈ নালা সলন सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग में वृक्ष है। इसके निकट रहने जाता है। पीपल में पितरों का वास प्राणशक्त बढती है।इसके अलावा माना गया है। इसमें सब तीर्थों का पीपल के a 3f # 7 निवास भी होता है॰ इसलिए मुंडन औषधीय गुण होने के कारण यह সানিস্োদৌপলননীনননোন रोगनाशक भी होता हे। का प्रचलन है। साभारः पुस्तक महल , दिल्लो - ShareChat
#😂पहेलियाँ ❓ #🏚चुटकुलों का घर😜 #😵टाइम पास #joke #मस्ती मजाक
😂पहेलियाँ ❓ - कोयल और कौवा आपस में बातचीत कर रहे थे.. कोयल भाई अव तक तुमने 1 शादी क्यों नहीं की বনাসা? क्या बात है मझे कौचा : बहन! क्या बताऊं तुम्हें बिना शादी के ही जिंदगी में इतनी कांव-कांव है হাণী ক্ং লুনাা নী কমা ম্ীবা !  आज ये रोटियां संजू जली हुई कैसे है? पत्नी : क्योकि ्मैं आजकल खूबसूरत होती जा रही हूं! तुम्हारे खूबसूरत होने से संजू : रोटी जलने का क्या लेना-देना? रोटियां भी मेरी खूबसूरती ப= को देखकर जलने लगो हैं ! कोयल और कौवा आपस में बातचीत कर रहे थे.. कोयल भाई अव तक तुमने 1 शादी क्यों नहीं की বনাসা? क्या बात है मझे कौचा : बहन! क्या बताऊं तुम्हें बिना शादी के ही जिंदगी में इतनी कांव-कांव है হাণী ক্ং লুনাা নী কমা ম্ীবা !  आज ये रोटियां संजू जली हुई कैसे है? पत्नी : क्योकि ्मैं आजकल खूबसूरत होती जा रही हूं! तुम्हारे खूबसूरत होने से संजू : रोटी जलने का क्या लेना-देना? रोटियां भी मेरी खूबसूरती ப= को देखकर जलने लगो हैं ! - ShareChat
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joke - Hh HA HA 9/ हसो हंसाओ बेटा, जुआ नहीं खेलते ! देखो பIHI : यह ऐसी आदत है कि यदि इसमें आज जीतोगे तो कल हारोगे परसों जीतोगे तो उससे अगले दिन हार जाओगे ! बेटा : बस पापा मैं समझ गया आगे से मैं एक दिन छोड़कर खेला करूंगा ! Hh HA HA 9/ हसो हंसाओ बेटा, जुआ नहीं खेलते ! देखो பIHI : यह ऐसी आदत है कि यदि इसमें आज जीतोगे तो कल हारोगे परसों जीतोगे तो उससे अगले दिन हार जाओगे ! बेटा : बस पापा मैं समझ गया आगे से मैं एक दिन छोड़कर खेला करूंगा ! - ShareChat
#🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🕉️सनातन धर्म🚩 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #👫 हमारी ज़िन्दगी
🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स - निशिचत है। वह प्रकृति का नियम है , जिसे कोई रोक नहीं मृत्यु तो  आएगी , बल्कि यह है कि उसके नहीं है कि मृत्यु सकता | प्रश्न यह कब जी रहे हैं। आने तक हम किस तरह का जीवन हमने अपने भीतर क्या जीवित रखा मृत्यु को जीवन की सबसे बड़ी क्षति मानते हैं। हमें लगता है कि किसी हम अक्सर व्यक्ति का चले जाना, उसकी सांसों का थम जाना ही अंतिम और सबसे गहरा दुख है। हम मृत्यु का नाम ही सिहर उठते हैं। लेकिन इस सोच में हम एक बहुत মুনন बड़ी सच्चाई को भूल जाते हैं। मृत्यु तो निश्चित है। वह प्रकृति का नियम है जिसे कोई रोक नहीं सकेता। प्रश्न यह नहीं है कि मृत्यु कब आएगी, बल्कि यह है कि आने तक हम किस तरह का जीवन जी रहे हैं। मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी उसके हानि नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी हानि वह है, जो हमारे भीतर जीवित रहते हुए मर जाता है। जब हम जीना भूल जाते हैं॰ तभी हमारे भीतर मृत्यु शुरू होती है। जोने का अर्थ केवल जिम्मेदारियां निभाना नहीं है। जीना है महसूस करना, सवाल करना, गलतियों से सीखना और अपने मन की आवाज को सुनना। लेकिन जीवन की दौड़ में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि संवेदनाएं बोझ लगने लगती हैं। हम सपनों को अव्यावहारिक कहकर त्याग देते हैं इच्छाओं को डर के नाम पर दबा देते हैं और धीरे ्धीरे एक ऐसा जीवन जीने लगते हैं जो सुरक्षित तो होता है, पर जीवंत नहीं होता| जब प्रयास करने की इच्छा खत्म हो जाती है जब कुछ नया शुरू करने का साहस नहीं बचता का डर हमें जकड़ लेता है, तब जब असफलता हम जीवित रहकर भी जीवन से दूर हो जाते हैं। यह एक शांत मृत्यु होती है, जिसमें कोई शोर नहीं होता, कोई आंसू नहीं बहते पर भीतर कुछ हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। मृत्यु का भय हमें जीवन से जोड़ने के बजाय उससे काट देता है। हम सोचते हैं कि समय कम है, इसलिए जोखिम नहीं ले सकते। हम कहते हैं कि हालात ठीक नहीं हैं, इसलिए इंतजार करना बेहतर है। लेकिन यह इंतजार ही वह जगह है, जहां जीवन फिसलता चला जाता है समय गुजरता रहता है और हम बस देखते रहते हैं। इसी बीच हमारे भीतर की जिज्ञासा, उत्साह और रचनात्मकता दम तोड़ देती है। सबसे बड़ा नुकसान तब होता है, जब हम स्वयं से समझौता कर लेते हैं। जब हम वह बन जाते हैं॰ जो हम नहीं हैं॰ केवल इसलिए कि समाज को यही स्वीकार्य है। जब हम अपने विचारों को छोटा कर लेते हैं॰ ताकि टकराव न हो। जब हम सच बोलने से बचते हैं, क्योंकि चुप रहना आसान लगता है। हर ऐसा समझौता हमारे भीतर के किसी हिस्से को कमजोर करता है। जीवन का मूल्य उसकी लंबाई में नहीं उसकी गहराई में होता है। कोई व्यक्ति सौ वर्ष जी सकता है, फिर भी भीतर से खाली रह सकता है, जबकि कोई कम समय में भी जीवन को पूरी तरह महसूस कर सकता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि हमने अपने भीतर क्या जीवित रखा। क्या हमने प्रेम को जीवित रखा, करुणा, सच्चाई को, या केवल डर और आदतों के सहारे समय काटा। मृत्यु अपरिहार्य है, लेकिन भीतर का मर जाना हमारी अपनी लापरवाही का परिणाम होता है।हम चाहें तो अपने भीतर की संवेदनाओं को बचा सकते हैं। प्रेम व करुणा को बचाएं मृत्यु वह नहीं जो जीवन के अंत में होता है, बल्कि वह है जो जीते-जी हमारे भीतर मर जाता है। जब हम डर के कारण सपने देखना छोड़ देते हैं॰ सवाल करना बंद कर देते 4 हैं और सच से समझौता कर लेते हैं॰ तब हम जीवित रहकर भी जीवन खो देते हैं। प्रेम, करुणा और सच्चाई को अपने भीतर बचाकर रखें। निशिचत है। वह प्रकृति का नियम है , जिसे कोई रोक नहीं मृत्यु तो  आएगी , बल्कि यह है कि उसके नहीं है कि मृत्यु सकता | प्रश्न यह कब जी रहे हैं। आने तक हम किस तरह का जीवन हमने अपने भीतर क्या जीवित रखा मृत्यु को जीवन की सबसे बड़ी क्षति मानते हैं। हमें लगता है कि किसी हम अक्सर व्यक्ति का चले जाना, उसकी सांसों का थम जाना ही अंतिम और सबसे गहरा दुख है। हम मृत्यु का नाम ही सिहर उठते हैं। लेकिन इस सोच में हम एक बहुत মুনন बड़ी सच्चाई को भूल जाते हैं। मृत्यु तो निश्चित है। वह प्रकृति का नियम है जिसे कोई रोक नहीं सकेता। प्रश्न यह नहीं है कि मृत्यु कब आएगी, बल्कि यह है कि आने तक हम किस तरह का जीवन जी रहे हैं। मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी उसके हानि नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी हानि वह है, जो हमारे भीतर जीवित रहते हुए मर जाता है। जब हम जीना भूल जाते हैं॰ तभी हमारे भीतर मृत्यु शुरू होती है। जोने का अर्थ केवल जिम्मेदारियां निभाना नहीं है। जीना है महसूस करना, सवाल करना, गलतियों से सीखना और अपने मन की आवाज को सुनना। लेकिन जीवन की दौड़ में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि संवेदनाएं बोझ लगने लगती हैं। हम सपनों को अव्यावहारिक कहकर त्याग देते हैं इच्छाओं को डर के नाम पर दबा देते हैं और धीरे ्धीरे एक ऐसा जीवन जीने लगते हैं जो सुरक्षित तो होता है, पर जीवंत नहीं होता| जब प्रयास करने की इच्छा खत्म हो जाती है जब कुछ नया शुरू करने का साहस नहीं बचता का डर हमें जकड़ लेता है, तब जब असफलता हम जीवित रहकर भी जीवन से दूर हो जाते हैं। यह एक शांत मृत्यु होती है, जिसमें कोई शोर नहीं होता, कोई आंसू नहीं बहते पर भीतर कुछ हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। मृत्यु का भय हमें जीवन से जोड़ने के बजाय उससे काट देता है। हम सोचते हैं कि समय कम है, इसलिए जोखिम नहीं ले सकते। हम कहते हैं कि हालात ठीक नहीं हैं, इसलिए इंतजार करना बेहतर है। लेकिन यह इंतजार ही वह जगह है, जहां जीवन फिसलता चला जाता है समय गुजरता रहता है और हम बस देखते रहते हैं। इसी बीच हमारे भीतर की जिज्ञासा, उत्साह और रचनात्मकता दम तोड़ देती है। सबसे बड़ा नुकसान तब होता है, जब हम स्वयं से समझौता कर लेते हैं। जब हम वह बन जाते हैं॰ जो हम नहीं हैं॰ केवल इसलिए कि समाज को यही स्वीकार्य है। जब हम अपने विचारों को छोटा कर लेते हैं॰ ताकि टकराव न हो। जब हम सच बोलने से बचते हैं, क्योंकि चुप रहना आसान लगता है। हर ऐसा समझौता हमारे भीतर के किसी हिस्से को कमजोर करता है। जीवन का मूल्य उसकी लंबाई में नहीं उसकी गहराई में होता है। कोई व्यक्ति सौ वर्ष जी सकता है, फिर भी भीतर से खाली रह सकता है, जबकि कोई कम समय में भी जीवन को पूरी तरह महसूस कर सकता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि हमने अपने भीतर क्या जीवित रखा। क्या हमने प्रेम को जीवित रखा, करुणा, सच्चाई को, या केवल डर और आदतों के सहारे समय काटा। मृत्यु अपरिहार्य है, लेकिन भीतर का मर जाना हमारी अपनी लापरवाही का परिणाम होता है।हम चाहें तो अपने भीतर की संवेदनाओं को बचा सकते हैं। प्रेम व करुणा को बचाएं मृत्यु वह नहीं जो जीवन के अंत में होता है, बल्कि वह है जो जीते-जी हमारे भीतर मर जाता है। जब हम डर के कारण सपने देखना छोड़ देते हैं॰ सवाल करना बंद कर देते 4 हैं और सच से समझौता कर लेते हैं॰ तब हम जीवित रहकर भी जीवन खो देते हैं। प्रेम, करुणा और सच्चाई को अपने भीतर बचाकर रखें। - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻हनुमान जी के भजन #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #ram #🙏 माँ वैष्णो देवी
🕉️सनातन धर्म🚩 - माता अनसूया को ज्ञात हुआ कि माता सीता को दीर्घकाल तक वनवास का कठोर जीवन व्यतीत करना होगा, तो उन्होंने माता सीता को एक दिव्य साड़ी भेंट की। जानकी जयंती ककईे आज जानकी जयंती का पावन पर्व है।माता सीता करुणा से भर उठा उन्होंने माता   सीता से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं हमारे शास्त्रों और स्नेहपूर्वक एक दिव्य साड़ी भेंट की। यह परंपराओं में वर्णित हैं। उन्हीं में से एक अत्यंत साधारण वस्त्र नहीं था। अग्निदेव ने तपोबल से प्रसन्न होकर माता अनसूया को और प्रेरक कथा यह भी है। भावपूर्ण  श्रीराम , लक्ष्मण और माता सीता चौदह वर्षों यह साड़ी दीथी। जब उस दिव्य साड़ी की विशेषता के वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर रहे थे, यह थी कि वह कभी मैली नहीं तब उनके पथ में महर्षि अत्रि का पवित्र आश्रम होती थी॰ न फटती थी और न आया। प्रभु श्रीराम ने वहां कुछ समय विश्राम करने हो अपनो आभा खोती थो। वह का निश्चय किया। 3nun बनी आश्रम में महर्षि अत्रि की धर्मपल्नी, पतिव्रता सदैव नवीन और उज्ज्वल सीता माता अनसूया ने उनका अत्यंत श्रद्धा और स्नेह से रहती थी। সানা वनवास के चौदह वर्षों तक आदर सत्कार किया। माता अनसूया स्वयं तप त्याग और शील की मूर्ति थीं। जब उन्हें ज्ञात हुआ उसी साडी को धारण किया। घोर वन जीवन, कष्ट और कठिनाइयों के बावजूद वह साडी चौदह वर्षों कि॰ माता सीता को दीर्घकाल तक वनवास को कठोर जीवन व्यतीत करना होगा, तो उनका हृदय बाद भी वैसी ही नई रही। माता अनसूया को ज्ञात हुआ कि माता सीता को दीर्घकाल तक वनवास का कठोर जीवन व्यतीत करना होगा, तो उन्होंने माता सीता को एक दिव्य साड़ी भेंट की। जानकी जयंती ककईे आज जानकी जयंती का पावन पर्व है।माता सीता करुणा से भर उठा उन्होंने माता   सीता से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं हमारे शास्त्रों और स्नेहपूर्वक एक दिव्य साड़ी भेंट की। यह परंपराओं में वर्णित हैं। उन्हीं में से एक अत्यंत साधारण वस्त्र नहीं था। अग्निदेव ने तपोबल से प्रसन्न होकर माता अनसूया को और प्रेरक कथा यह भी है। भावपूर्ण  श्रीराम , लक्ष्मण और माता सीता चौदह वर्षों यह साड़ी दीथी। जब उस दिव्य साड़ी की विशेषता के वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर रहे थे, यह थी कि वह कभी मैली नहीं तब उनके पथ में महर्षि अत्रि का पवित्र आश्रम होती थी॰ न फटती थी और न आया। प्रभु श्रीराम ने वहां कुछ समय विश्राम करने हो अपनो आभा खोती थो। वह का निश्चय किया। 3nun बनी आश्रम में महर्षि अत्रि की धर्मपल्नी, पतिव्रता सदैव नवीन और उज्ज्वल सीता माता अनसूया ने उनका अत्यंत श्रद्धा और स्नेह से रहती थी। সানা वनवास के चौदह वर्षों तक आदर सत्कार किया। माता अनसूया स्वयं तप त्याग और शील की मूर्ति थीं। जब उन्हें ज्ञात हुआ उसी साडी को धारण किया। घोर वन जीवन, कष्ट और कठिनाइयों के बावजूद वह साडी चौदह वर्षों कि॰ माता सीता को दीर्घकाल तक वनवास को कठोर जीवन व्यतीत करना होगा, तो उनका हृदय बाद भी वैसी ही नई रही। - ShareChat
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