क्या सच में वो सब मिल गया तुम्हें, जिसके लिए तुमने मेरे निश्चल प्रेम को ठुकरा दिया?
बताओ… क्या कहीं ऐसा सुकून मिला, जैसा मेरे बचपने भरे अपनापन में था? क्या किसी ने तुम्हें वैसे समझा, जैसे मैं बिना कहे समझ लिया करता था? क्या तुमने मुझसे अधिक सच्चा प्रेम पाया, या मुझसे बेहतर कोई इंसान मिला?
कभी-कभी सोचता हूँ — क्या मैं तुम्हें याद नहीं आता? क्या सच में तुम बिना रुके जी लेती हो, बिना उस एहसास के कि तुम्हारी ज़िंदगी से कुछ बहुत अपना छूट गया है? क्या हर निवाला सहज उतर जाता है, या कहीं एक खामोशी गले में अटकती है?
मैं शिकायत नहीं करता… बस जानना चाहता हूँ — क्या #??? तुम्हारी उस जिद ने तुम्हें वो खुशी दी, जिसके लिए तुमने हमारा सब कुछ पीछे छोड़ दिया, या फिर कभी अकेले में तुम्हें भी एहसास होता है कि तुमने क्या खो दिया।