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"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"
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poetry - गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता इन्तज़ाम क्या क्या है फक़ीर शेख कलन्दर इमाम क्या क्या है तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है अमीर-ए-शहर के कुछ कारोबार याद आए, मैं रात सोच रहा था हराम क्या-क्या है। गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता इन्तज़ाम क्या क्या है फक़ीर शेख कलन्दर इमाम क्या क्या है तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है अमीर-ए-शहर के कुछ कारोबार याद आए, मैं रात सोच रहा था हराम क्या-क्या है। - ShareChat
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poetry - बशीर की उम्दा ग़ज़ल : बद्र खुद को इतना भी मत बचाया कर, बारिशें हो तो भीग जाया कर। चाँद लाकर कोई नहीं देगा, अपने चेहरे से जगमगाया कर। दर्द हीरा है, दर्द मोती है, दर्द आँखों से मत बहाया कर। काम लेे कुछ हसीन होंठो से, बातों बातों में मुस्कुराया कर। धूप मायूस लौट जाती है, छत पे किसी बहाने आया कर। कौन कहता है दिल मिलाने को, कम-से॰कम हाथ तो मिलाया कर ! बशीर की उम्दा ग़ज़ल : बद्र खुद को इतना भी मत बचाया कर, बारिशें हो तो भीग जाया कर। चाँद लाकर कोई नहीं देगा, अपने चेहरे से जगमगाया कर। दर्द हीरा है, दर्द मोती है, दर्द आँखों से मत बहाया कर। काम लेे कुछ हसीन होंठो से, बातों बातों में मुस्कुराया कर। धूप मायूस लौट जाती है, छत पे किसी बहाने आया कर। कौन कहता है दिल मिलाने को, कम-से॰कम हाथ तो मिलाया कर ! - ShareChat
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poetry - आसान नर्हीं होता किसी प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करा, क्योकि उसे पसंद नहीं होती जी हजूरी, नरहीं वो कभी झुकती  जब तकनहो रिश्तों में प्रेम की भावना 5#5,3K7#7க6 ி चो नर्हीं जानती क्योकि उसने सीखा ही नहीं झूट की डोर में रिश्तों को बाँधना की चाशनी में डुबो कर वो नहीं जानती स्वांग সপনী নান সনবানা; चो तो जानती है बेबाकी से सच बोल जाना फिजूल ` की बहस में पड़ना उसकी आदत में शुमार नहीं लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना चो क्षण क्षण गहने कपड़ों की बात नहीं किया करती चो तो संवारती है स्वयं को अपने आत्मविश्वास से॰ निखारती है अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी ಔ೯# गलतियों पर तुम्हें टोकती है ரி तो तकलीफ़ मे तुम्हें संभालती भी है बख़ूबी आता है उसे घर संभालना a qI' तो अपने सपर्नों  1 अगर नहीं आता तो, किसी की अनर्गल बातों को मान लेना पौरुष के आगे वह नतमस्तक नहीं होती है तो निःस्वार्थ प्रेम के आगे तुम्हारे  झुकती | और इसी प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है हौसला हो निभाने का तभी ऐसी स्त्री से प्रेम কামা; क्योकि टूट जाती है वो धोखे से, छलावे से, पुरुष अहंकार से॰ जुड़ नहीं पाती किसी प्रेम की ख़ातिर.. फिर आसान नर्हीं होता किसी प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करा, क्योकि उसे पसंद नहीं होती जी हजूरी, नरहीं वो कभी झुकती  जब तकनहो रिश्तों में प्रेम की भावना 5#5,3K7#7க6 ி चो नर्हीं जानती क्योकि उसने सीखा ही नहीं झूट की डोर में रिश्तों को बाँधना की चाशनी में डुबो कर वो नहीं जानती स्वांग সপনী নান সনবানা; चो तो जानती है बेबाकी से सच बोल जाना फिजूल ` की बहस में पड़ना उसकी आदत में शुमार नहीं लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना चो क्षण क्षण गहने कपड़ों की बात नहीं किया करती चो तो संवारती है स्वयं को अपने आत्मविश्वास से॰ निखारती है अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी ಔ೯# गलतियों पर तुम्हें टोकती है ரி तो तकलीफ़ मे तुम्हें संभालती भी है बख़ूबी आता है उसे घर संभालना a qI' तो अपने सपर्नों  1 अगर नहीं आता तो, किसी की अनर्गल बातों को मान लेना पौरुष के आगे वह नतमस्तक नहीं होती है तो निःस्वार्थ प्रेम के आगे तुम्हारे  झुकती | और इसी प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है हौसला हो निभाने का तभी ऐसी स्त्री से प्रेम কামা; क्योकि टूट जाती है वो धोखे से, छलावे से, पुरुष अहंकार से॰ जुड़ नहीं पाती किसी प्रेम की ख़ातिर.. फिर - ShareChat
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poetry - धर्मवीर भारती সুনা্া ক্া ঐবনা 82 पुरुष और नारी के क्य एकही रास्ता सम्बन्धका - qua fas3iK qfaadl నగా নৃদি! और दूरी क्या सम्बन्धों को, विश्वासों को जिन्दा नहीं रहने दे सकते? कौननसा गुनाह? कसा गनाह? किसीसे जिन्दगी भर लेह रखने, प्रेम करने का गुनाह सह ओर प्रेप जव अपनी पराकाष्ठा पर पहचन लगेतो उसका त्याग करने का गूनाह . नी अजीव गातः धर्मवीर भारती সুনা্া ক্া ঐবনা 82 पुरुष और नारी के क्य एकही रास्ता सम्बन्धका - qua fas3iK qfaadl నగా নৃদি! और दूरी क्या सम्बन्धों को, विश्वासों को जिन्दा नहीं रहने दे सकते? कौननसा गुनाह? कसा गनाह? किसीसे जिन्दगी भर लेह रखने, प्रेम करने का गुनाह सह ओर प्रेप जव अपनी पराकाष्ठा पर पहचन लगेतो उसका त्याग करने का गूनाह . नी अजीव गातः - ShareChat