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#🌙 गुड नाईट
🌙 गुड नाईट - शुभरात्रि लिए दूसरों के दिल से दुआ करो अपने लिए मांगने की గాై जरूरत नहीं पड़ेगी शुभ रात्रि शुभरात्रि लिए दूसरों के दिल से दुआ करो अपने लिए मांगने की గాై जरूरत नहीं पड़ेगी शुभ रात्रि - ShareChat
☯️🕉️🌳🌻🛕🌝🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! रात्रिकालीन वंदन !!_* *_आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरी ! योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते !!_* *_स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे ! महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते !!_* *_प्राप्ता विद्या जीवनाख्या तस्मै शुक्रात्मने नमः ! नमस्तस्मै भगवते भृगुपुत्राय वेधसे !!_* *_तारामण्डलमध्यस्थ स्वभासासिताम्बर ! यस्योदये जगत्सर्वं मङ्गलार्हं भवेदिह !!_* *_दैत्यगुरुं सुरशत्रुं विद्यासम्पत्प्रदायकम् !सौन्दर्यारोग्यदातारं शुक्रं प्रणमाम्यहम् !!_* *_!! धूल में पहचान: "सफलता का शोर और संघर्ष का साथ। " !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, "सुबह मैंने सच्चे रिश्तों की कसौटी एवं मानवीय मूल्यों से संबंधीत एक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था। निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है।" मित्रों, जीवन की इस भागदौड़ भरी दौड़ में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि "रिश्तों की असली परीक्षा कहाँ होती है।" प्रस्तुत यह पंक्ति— "कपड़ों पर लगी धूल में जो साथ खड़ा वहीं अपना है"—एक गहरा दर्पण हमारे सामने रखती है। यह केवल एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, "बल्कि जीवन के यथार्थ का वह नंगा सच है," जिसे हम चकाचौंध में देखना ही नहीं चाहते।_* *_हमारा समाज एक अजीब विरोधाभास पर टिका है। "हम सफलता की प्रतिमा को देखकर भाव-विभोर हो जाते हैं," उस पर फूल बरसाते हैं, और उसकी चमक में अपनी एक झलक पाने की आकांक्षा रखते हैं। पर जरा गौर करें—"जिस मूर्ति की भव्यता को हम निहार रहे हैं, उसे बनाने वाले मूर्तिकार के हाथ कितनी बार छिले होंगे ?" कितनी रातों की नींद उसने बलि चढ़ाई होगी ? उस निर्माण की वेदना, संघर्ष की धूल और पसीने की गंध को समझने वाले कितने लोग हैं ?_* *_मित्रों,"तर्क यह है कि सफलता का शिखर सदैव भीड़ से घिरा होता है।" वह भीड़, जो आपकी चमक का आनंद लेने आती है, जो आपके साथ फोटो खिंचवाना चाहती है, जो आपकी तारीफों के पुल बाँधती है। लेकिन यही भीड़, "जब आप उस शिखर से उतरकर घाटी के अंधेरे में खो जाते हैं," या जब आपके कपड़ों पर चढ़ती सफलता की चमक की जगह संघर्ष की धूल जम जाती है—तब यह भीड़ बिखर जाती है।यहीं पर हमें रुककर सोचना होगा। "क्या हम स्वयं उस भीड़ का हिस्सा तो नहीं हैं ? क्या हम भी दूसरों की सफलता को देखकर उनके ‘साथी’ बनने को आतुर नहीं हो जाते, भले ही उस सफलता की नींव में हमारा कोई योगदान न हो ?" यह पोस्ट हमसे निम्नलिखित तीन गहरे सवाल पूछती है :-_* *_1) पहचान का सवाल: क्या हम उन लोगों को पहचान पाते हैं जो हमारे ‘पतन की धूल’ में हमारे साथ खड़े थे ? क्या हम उन्हें अपनी ‘सफलता की चकाचौंध’ में भी उतना ही स्थान देते हैं ?_* *_2) मूल्य का सवाल: "क्या हमारे लिए किसी इंसान की कीमत उसकी उपलब्धियों से मापी जाती है, या उसकी उपस्थिति से ?" क्या हम किसी के संघर्ष के दिनों में उसे ‘पूंजी’ की तरह संजोते हैं, या उसे ‘बोझ’ समझकर किनारे कर देते हैं ?_* *_3) उपस्थिति का सवाल: "सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हम स्वयं दूसरों के जीवन में किस तरह का ‘अपना’ बनना चाहते हैं ? क्या हम केवल ‘दर्शक’ बनकर रह जाना चाहते हैं, जो तैयार मूर्ति पर आस्था का दिखावा करे ?" या फिर हम उस ‘सच्चे साथी’ की भूमिका निभाना चाहेंगे, जो निर्माण की वेदना को समझे, जो अंधेरे में कंधा मिलाए, और जो धूल में भी हाथ थामे रहे ?_* 👌🏻🤔 *_🙏🏻शुक्रवार रात्रि: काल की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को माँ लक्ष्मी जी एवं माँ संतोषी जी का स्नेहभरा आशीर्वाद प्राप्त हो। मातेश्वरी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें, आप सदा खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित सुमंगलम, स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों में प्रेषित करें।धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस.एस.अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, "वैभव में शामिल होने वाले तो हजारों मिल जाएंगे, पर पतन की धूल में हाथ थामने वाला विरला ही होता है।" सच्चा रिश्ता वह नहीं जो आपके मुकुट पर रत्न जड़ने आए, "बल्कि वह है जो आपके सिर के बालों में उलझी धूल को साफ करने से न हिचकिचाए।" आज का यह चिंतन हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है कि हम अपने जीवन के कीमती रत्नों ( सच्चे लोगों ) को पहचानें और स्वयं भी किसी के लिए वह ‘धूल में साथ खड़ा’ इंसान बनें। क्योंकि आखिरकार, "सफलता की चमक क्षणिक है, पर संघर्ष में मिला साथ ही जीवन की सच्ची पूंजी है।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🛕😴🛕💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट
☯️🕉️🌳🌻🛕🌄🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! संध्या: कालीन वंदन !!_* *_वेंकटेशो वासुदेवो वारिजासनवन्दितः! स्वामी पुष्करिणीवासः शंखचक्रगदाधरः !! पीताम्बरधरो देवो गरुडारूढशोभितः ! विश्वात्मा विश्वलोकेशो विजयो वेंकटेश्वरः !!_* *_ॐ श्री संतोषी महामाये गजानन भगिनी पूजिता ! सद्भक्तं सुखसम्पत्ति देहि देहि नमोस्तुते !!_* *_अस्तं यस्ते ह्यरिष्टं स्यात्तस्मै मंगलरूपिणे ! त्रिपुरावासिनो दैत्यान् शिवबाणप्रपीडितान् !! विद्ययाऽजीवयच्छुक्रो नमस्ते भृगुनन्दन ! ययातिगुरवे तुभ्यं नमस्ते कविनन्दन !!_* *_ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥_* *_!! होली: "परंपरा का दमन या उत्सव का पुनर्लेखन ?" एक तथ्यात्मक विश्लेषण !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, होली, रंगों का पर्व, भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक चेतना में रचा-बसा एक अविस्मरणीय अवसर है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, "बल्कि सामाजिक समरसता, ऋतु परिवर्तन और जीवन के आनंद का प्रतीक है।" लेकिन जब भी कोई पर्व सदियों से जन-जीवन का अभिन्न अंग होता है, "उसके इर्द-गिर्द तरह-तरह की व्याख्याएं और कथाएं स्वाभाविक रूप से जुड़ती चली जाती हैं।" हाल ही में एक लेख प्रचारित किया जा रहा है जो "होली की हिंदू धार्मिक उत्पत्ति को नकारते हुए इसे पूर्णतः बौद्ध पर्व बताने का दावा करता है।" यह लेख ऐतिहासिक रूप से "अधिकतर अप्रमाणित और भ्रामक है।" आइए, आज आपको तथ्यों और तर्क के साथ इस पर्व की वास्तविकता को बताता हूं :-_* *_1👉🏻 प्राचीन उल्लेखों की अनदेखी: क्या सच में होली का कोई प्राचीन सन्दर्भ नहीं ? :-_* *_मित्रों, "भ्रामक लेख का पहला दावा है कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों में होली का कोई उल्लेख नहीं है।" यह कथन सत्य से परे है। यह सही है कि वेदों में प्रत्यक्ष रूप से 'होली' शब्द का उल्लेख नहीं मिलता, "लेकिन वैदिक काल के बाद के साहित्य में इस उत्सव की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।" जैसे कि :-_* *_1) गृह्य सूत्र और पुराण: जैमिनी के पूर्वमीमांसा-सूत्र ( लगभग 400 ईसा पूर्व ) जैसे ग्रंथ "फाल्गुन पूर्णिमा के महत्व को स्वीकार करते हैं।" इसके अलावा, नारद पुराण और भविष्य पुराण ( जिनकी रचना का समय छठी शताब्दी के आसपास माना जाता है ) जैसे प्राचीन ग्रंथों में फाल्गुन पूर्णिमा के उत्सव और रंगों के क्रीड़ा का वर्णन मिलता है। 'भविष्य पुराण' में वर्णित 'ढूंढा' नामक राक्षसी की कथा, जिसे लोग हंसी-ठिठोली और रंगों से भगाते हैं, "सीधे तौर पर होली की वर्तमान परंपरा से जुड़ती है।" यह कहना कि होली का कोई प्राचीन उल्लेख नहीं है, पुराणों के साक्ष्यों को पूरी तरह अनदेखा करना है।_* *_2👉🏻 'होलिका-प्रह्लाद' की कथा: अंग्रेजों की देन या सनातन आस्था ? :-_* *_भ्रामक लेख में होलिका-प्रह्लाद की कथा को अंग्रेजों की देन बताया गया है, जो ऐतिहासिक तथ्यों की सबसे बड़ी विकृति है। 'होलिका' और 'प्रह्लाद' का उल्लेख सबसे प्राचीन पुराणों में मिलता है। मत्स्य पुराण और भागवत पुराण ( जिनकी रचना छठी से दसवीं शताब्दी के बीच मानी जाती है ) में यह कथा विस्तार से वर्णित है। यह कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, "बल्कि दार्शनिक अर्थों से भरपूर है।" प्रह्लाद भक्ति और सत्य के प्रतीक हैं, जबकि होलिका अहंकार और अधर्म की। "उनका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का वह सनातन प्रतीक है, जो सदियों से भारतीय मन को आलोकित करता आ रहा है।" यह कहना कि अंग्रेजों ने इस कथा को गढ़ा, इतिहास के प्रति अज्ञानता और दुराग्रह दोनों को दर्शाता है।_* *_3👉🏻 कैलेंडर और तिथियां: "चोरी" का सिद्धांत कितना तर्कसंगत ? :-_* *_मित्रों, लेख में दावा किया गया है कि हिंदुओं ने बौद्धों से फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि "चुराई"। यह तर्क नितांत अतार्किक है। भारत में अधिकांश पर्व और त्योहार "ऋतुओं और चंद्र चक्र ( सौर-चांद्र कैलेंडर ) पर आधारित हैं।" यह कैलेंडर व्यवस्था भारतीय उपमहाद्वीप की साझी विरासत है। बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म ने इसी मौजूदा कैलेंडर और उसके अनुसार आने वाले पर्वों को "अपनी-अपनी परंपराओं से जोड़ा।" फाल्गुन पूर्णिमा बौद्धों के लिए महत्वपूर्ण है "क्योंकि इसी दिन भगवान बुद्ध के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं।" लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि "यह तिथि या इस दिन मनाया जाने वाला उत्सव बौद्धों की देन है।" यह तर्क उसी प्रकार का है जैसे यह कहना कि चूंकि ईसाई भी रविवार को चर्च जाते हैं, इसलिए 'रविवार' या 'सप्ताह' की अवधारणा "ईसाइयों " की देन है।_* *_4👉🏻 ऐतिहासिक साक्ष्यों का चयनात्मक पाठ :-_* *_भ्रामक लेख में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और विद्वान अलबरूनी के विवरणों का हवाला देकर यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि "होली एक बौद्ध पर्व था जिसका बाद में हिंदूकरण किया गया।" ह्वेन त्सांग ( सातवीं शताब्दी ) और अलबरूनी ( ग्यारहवीं शताब्दी ) ने भारत के सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन किया है। उन्होंने भारत में प्रचलित कैलेंडर, पर्वों और उत्सवों का उल्लेख किया है। "लेकिन उनके किसी भी विवरण में यह नहीं लिखा है कि फाल्गुन पूर्णिमा का उत्सव केवल बौद्धों का था और हिंदुओं ने उसे बाद में अपना लिया।" उन्होंने जो देखा, उसका वर्णन किया, "जो एक समन्वित और जटिल समाज का चित्र था," न कि एक विचारधारा से प्रेरित सरलीकृत इतिहास का। होलिका दहन को "स्त्री जलाने" का उत्सव बताना इस पर्व के "प्रतीकात्मक और नैतिक पक्ष की सबसे बड़ी अवहेलना है।" यह बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है, न कि हिंसा का।_* 👌🏻 *_🙏🏻शुक्रवार सांयकाल की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को माँ लक्ष्मी जी एवं माँ संतोषी जी का स्नेहभरा आशीर्वाद प्राप्त हो। मातेश्वरी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें, आप सदा खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित सुमंगलम, स्नेहिल संध्या वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों में प्रेषित करें।धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस.एस.अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, "उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि होली के बौद्ध पर्व होने का दावा करने वाला लेख एक विशेष विचारधारा से प्रेरित है, जो भारत की सनातन परंपराओं को जानबूझकर विकृत करने का प्रयास कर रही है।" यह प्रयास हिंदू पर्वों की उत्पत्ति को बौद्ध या अन्य स्रोतों से जोड़कर उनकी "ऐतिहासिकता और वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाने का है।" होली का उत्सव भारत में प्राचीन काल से विभिन्न रूपों में मनाया जाता रहा है। "इसकी जड़ें हिंदू पौराणिक कथाओं, दार्शनिक चिंतन और स्थानीय लोक परंपराओं में गहरी हैं।" यह पर्व समय के साथ विकसित हुआ है, "इसने कई स्थानीय रूप धारण किए हैं और सदियों से समाज के हर वर्ग ने इसे अपने ढंग से मनाया है।" किसी भी पर्व का इतिहास लिखते समय हमें न केवल "ग्रंथों, बल्कि शिलालेखों, मूर्तिकला, चित्रकला और लोक साहित्य जैसे विविध स्रोतों का साक्ष्य लेना चाहिए।" तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर या चुनिंदा साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना इतिहास के प्रति निष्ठा नहीं, "बल्कि एक सांस्कृतिक आक्रमण है।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🛕🌝🛕💐🌴🕉️☯️ #🌜 शुभ संध्या🙏
☯️🕉️🌳🌻🛕🌞🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! प्रातःकालीन वंदन !!_* *_ॐ श्री संतोषी महामाये गजाननभगिनी पूजिता। सद्भक्तं सुखसम्पत्ति देहि देहि नमोस्तुते॥_* *_ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥_* *_हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥_* *_दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामतिः। प्रभुस्ताराग्रहाणां च पीडां हरतु मे भृगुः॥_* *_नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तुते॥_* *_नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते॥_* *_ॐ शुक्राय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥_* *_!! ༺꧁ प्रभात पुष्प ꧂༻ !!_* *_☝🏻मित्रों, "जिस प्रकार मिट्टी का गीलापन पेड़ की जड़ों को तूफान में भी थामे रखता है," उसी प्रकार मनुष्य की संवेदनशीलता और व्यवहार की मधुरता ही "रिश्तों की नींव को मजबूती देती है।" जैसे सूखी बंजर धरती पर पेड़ नहीं पनप सकता, "वैसे ही कठोरता और उपेक्षा के बीच कोई रिश्ता फल-फूल नहीं सकता।" रिश्तों को उर्वर बनाए रखने के लिए केवल जुड़ाव ही नहीं, "बल्कि कोमलता और नम्रता भी उतनी ही आवश्यक है।" रिश्ता जोड़ना एक कला है, "पर उसे निभाना साधना है।" यह साधना हमें अहंकार मिटाकर, समर्पण भाव रखकर और निःस्वार्थ भाव से देना सिखाती है। सच्चे रिश्ते उन खेतों की तरह होते हैं, "जिनकी उपजाऊ शक्ति बरसों बरक्षत बनी रहती है - बशर्ते उनमें लगातार प्यार की सींचाई होती रहे।"👌🏻_* *_🙏🏻शुक्रवार प्रातःकाल की पवित्र मंगल बेला में, ईश्वर आपको सदैव अक्षय आरोग्य, धन-संपदा और अपरिमित ऊर्जा प्रदान करें। सुरेन्द्र अरोड़ा की ओर से आपके लिए मंगलकामनाएँ। आपके स्वास्थ्य, सफलता और यश-कीर्ति की असीमित दुआओं के साथ सुमंगलम स्नेहिल भोर-वंदन, मित्रों। माँ लक्ष्मी जी और माँ संतोषी जी का स्नेह-सिक्त आशीर्वाद आप सभी मित्रों पर सदैव बरसता रहे। मस्त रहें, व्यस्त रहें, स्वस्थ रहें, सभी पाप-कर्मों से दूर रहें और "प्रकृति के सदैव अहसानमंद और शुक्रगुजार रहें। " 🙏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈☀️🌈💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞
☯️🕉️🌳🌻🛕🌝🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! रात्रि : कालीन वंदन !!_* *_सत्यनारायणं देवं वन्देऽहं कामदं प्रभुम्। लीलया विततं विश्वं येन तस्मै नमो नमः॥_* *_ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रयसमन्वितम्। लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभाभरणं हरिम्॥_* *_नीलवर्णं पीतवस्त्रं श्रीवत्साङ्कं सुभूषितम्। गोविन्दं गोकुलानन्दं ब्रह्माद्यैरपि पूजितम्॥_* *_ॐ विश्वामित्राय विद्महे, धनुर्हस्ताय धीमहि, तन्नो जीवः प्रचोदयात्॥_* *_ॐ जलबीजाय विद्महे, नीलपुरुषाय धीमहि, तन्नो वरुणः प्रचोदयात्॥_* *_!! जीवन का रहस्य: ईश्वर पर भरोसा, अपने कर्मों पर विश्वास !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक "विचारोत्तेजक एवं प्रेरणादायक " पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, "सुबह मैंने आध्यात्मिकता एवं सार्थक जीवन जीने के सिद्धांतों से संबंधीत एक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था।" निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है। जीवन की इस भागदौड़ भरी दुनिया में, हम अक्सर दो चरम सीमाओं के बीच झूलते रहते हैं - "या तो हम सब कुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर निष्क्रिय हो जाते हैं, या फिर खुद को ही सर्वशक्तिमान समझ कर अहंकार के जाल में फंस जाते हैं।" लेकिन सच्चा संतुलन, सच्ची समझ, इन दोनों के बीच के मार्ग में छिपी है।_* *_जैसा कि परिच्छेद ( पैराग्राफ ) में कहा गया है, "प्रार्थना ऐसी करनी चाहिए जैसे सब कुछ ईश्वर पर निर्भर है, और काम ऐसे करने चाहिए जैसे सब कुछ हम पर निर्भर है।" यह पंक्ति जीवन दर्शन का निचोड़ है। "यह हमें सिखाती है कि विनम्रता और आस्था के साथ हमें उस शक्ति से जुड़ना चाहिए जो हमसे कहीं बड़ी है।" प्रार्थना हमें याद दिलाती है कि हम इस ब्रह्मांड के एक छोटे से "हिस्सा मात्र हैं," जहाँ हर चीज़ पर हमारा नियंत्रण नहीं है। यह हमें अहंकार से मुक्त करती है। लेकिन इसके ठीक अगले ही क्षण, "हमें यह भी याद रखना है कि हम निष्क्रिय नहीं हो सकते। ईश्वर ने हमें विवेक, शक्ति और कर्म करने की क्षमता दी है।" उस क्षमता का उपयोग करना, पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपना काम करना, यही हमारा कर्तव्य है। फल की चिंता ईश्वर पर छोड़कर, हमें अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं रखनी चाहिए। यही तर्कसंगतता है - ईश्वरीय सहायता में आस्था और स्वयं के प्रयासों में पूर्ण समर्पण।_* *_मित्रों, "हम अक्सर नाम जप या प्रार्थना को केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया बना देते हैं।" होंठ हिल रहे हैं, शब्द बाहर आ रहे हैं, "पर मन कहीं और भटक रहा है।" यह केवल एक औपचारिकता है। वास्तविक प्रार्थना तो वह है "जो हृदय के सबसे गहरे कोने से निकले।" जब हम प्रार्थना में इतने डूब जाएँ कि हमें ईश्वर की उपस्थिति अपने हर अणु में महसूस होने लगे। "नाम जप को हृदय का अनुभव बनाएँ" का अर्थ है कि हम उस परमात्मा से जुड़ाव महसूस करें, "एक ऐसा अटूट संबंध जो हमें आंतरिक बल प्रदान करे।" जब ईश्वर की उपस्थिति हृदय में बस जाती है, तो बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, हमारे भीतर अटल शांति और आत्मविश्वास बना रहता है। यही असली आध्यात्मिक शक्ति है।_* *_और अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात - "शांति।" हम शांति को बाहर ढूँढ़ते हैं। सोचते हैं कि कोई खास जगह जाकर, कोई खास किताब पढ़कर, या कोई खास वस्तु खरीदकर शांति मिल जाएगी। "लेकिन क्या सच में ऐसा है ? क्या शांति कभी बाज़ार में बिकती देखी है ?" नहीं ! "शांति कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा जा सके।" यह तो हमारे अपने किए हुए "अच्छे कर्मों" का प्रतिफल है। जब हम किसी की मदद करते हैं, किसी के दर्द को समझते हैं, उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं, "तो जो आत्मिक संतोष मिलता है, वही असली शांति है।" जब हम अपने परिवार, अपने प्रियजनों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह बिना किसी स्वार्थ के करते हैं, उनके सुख-दुःख में अपनेपन से शामिल होते हैं, "तो जो अपनापन और सुरक्षा का भाव मिलता है, वही शांति है।"_*👌🏻 *_🙏🏻बृहस्पतिवार रात्रि की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान, श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ सुमंगलम, स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों के साथ साझा करें। धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस. एस. अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, तो आइए आज एक नया संकल्प लें :- ईश्वर पर अटूट विश्वास रखें, लेकिन अपने कर्मों से मुँह न मोड़ें। प्रार्थना को केवल शब्दों का खेल न बनाएँ, "बल्कि हृदय से ईश्वर की उपस्थिति का एहसास करें।" शांति को बाहर न ढूँढ़ें, "बल्कि उसे अपने अच्छे कर्मों, अपनी सहानुभूति और अपने परिवार के प्रति समर्पण से स्वयं सृजित करें।" स्मरण रहे सच्ची शांति और सफलता उसी को मिलती है "जो आकाश में विश्वास रखते हुए भी, अपने पैर ज़मीन पर मज़बूती से टिकाए रखता है।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🛕😴🛕💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट
☯️🕉️🌳🌻🛕🌄🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! संध्या :कालीन वंदन !!_* *_शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम् ! विश्वाधारंगगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् !!_* *_लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ! वन्देविष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् !!_* *_ॐ जीवं जीवं न ऊतये जीवं देवेषु नस्कृतम् ! जीवन्तमग्न आ हुवेस नो बृहस्पतिर्दधातु !!_* *_ॐ वायवे विद्महे प्राणदेवाय धीमहि। तन्नो वायुः प्रचोदयात्॥_* *_प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि मे॥_* *_!! आम्रपाली: "संभोग से समाधि तक " -एक नगरवधू के आध्यात्मिक परिवर्तन की अनसुनी गाथा। !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, "आम्रपाली का नाम सुनते ही एक अत्यंत सुंदरी, नगरवधू और बुद्ध की शिष्या का चित्र मन में उभरता है।" लेकिन उसके जीवन की कहानी सिर्फ इतने भर से कहीं अधिक गहरी, जटिल और रोमांचकारी है। यह प्रेम, शक्ति, बलिदान और अंततः "आध्यात्मिक ज्ञान की गाथा है।" आइए, आज मैं आपको वैशाली की इस अनूठी नारी के अनसुने इतिहास को विस्तार से बताता हूं :-_* *_👉🏻 आम्रपाली के जन्म की कहानी ही एक रहस्य से शुरू होती है। पालि ग्रंथों और बौद्ध परंपराओं के अनुसार, "उनका जन्म लगभग 500 ईसा पूर्व वैशाली गणराज्य में हुआ था।" उनके नाम "आम्रपाली" की व्युत्पत्ति दो संस्कृत शब्दों से हुई है: "आम्र" ( आम ) और "पल्लव" ( नई पत्तियां या कोपलें )। इस नाम के पीछे की कथा अत्यंत रोचक है। "कहा जाता है कि वह किसी माता-पिता से नहीं जन्मी थीं," बल्कि वैशाली के शाही उद्यान में एक आम के वृक्ष के नीचे सहज रूप से प्रकट हुई थीं। एक अन्य लोककथा के अनुसार, "एक राजकीय माली ने उन्हें एक आम के बगीचे में परित्यक्त अवस्था में पाया और उनका पालन-पोषण किया।" वहीं, म्यांमार की बौद्ध परंपरा में इसे और भी अलौकिक रूप में देखा गया है, जहां माना जाता है कि आम्रपाली का जन्म किसी मानवीय जन्म प्रक्रिया से न होकर, "सीधे आम के वृक्ष से हुआ था।" ये सभी कथाएं उनके व्यक्तित्व में शुरू से ही एक दिव्यता और रहस्य का आभास कराती हैं।_* *_मित्रों, "आम्रपाली अलौकिक सुंदरी और कई कला में निपुण थीं। उनकी खूबसूरती के किस्से दूर-दूर तक फैल हुए थे।" युवा राजकुमार और कुलीन उनके सान्निध्य की कामना करने लगे। इसी बीच, वैशाली के राजा मनुदेव ने उन्हें एक नृत्य प्रस्तुति में देखा और वह उन पर मोहित हो गए। "उनकी सुंदरता को पाने की लालसा ने उन्हें षड्यंत्र रचने पर उतारू कर दिया।" कहा जाता है कि उन्होंने आम्रपाली के बचपन के प्रेमी और होने वाले वर पुष्पकुमार की शादी के दिन ही हत्या करवा दी थी। इसके बाद राजा ने एक आधिकारिक घोषणा करके आम्रपाली को वैशाली की "दुल्हन" अर्थात नगरवधू घोषित कर दिया। उन्हें 'वैशाली जनपद कल्याणी' की उपाधि भी दी गई, "जो राज्य की सबसे सुंदर और प्रतिभाशाली कन्या को सात वर्षों के लिए दी जाती थी।" यह उपाधि और पद उनके लिए सम्मान की तरह था, "लेकिन यह उनके व्यक्तिगत जीवन की स्वतंत्रता की कीमत पर मिला था।" वह किसी एक पुरुष की नहीं हो सकती थीं, बल्कि पूरे गणराज्य की 'संपत्ति' बन गईं।_* *_नगरवधू बनने के बाद भी आम्रपाली ने अपनी प्रतिभा और बुद्धि से खुद को सिर्फ एक भोग्या से ऊपर उठाया। "वह एक अत्यंत कुशल राजनर्तकी ( राजदरबार की नर्तकी ) बनीं।" उनके पास जाने की कीमत 50 कार्षापण प्रति रात थी और उनका खजाना "किसी राजा के खजाने से भी बड़ा हो गया था।" अपनी इस विलासिता और वैभव का उपयोग "उन्होंने दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता के लिए किया," जिससे वह जनता के बीच भी लोकप्रिय हो गईं। आम्रपाली की सुंदरता की प्रसिद्धि पड़ोसी राज्य मगध के शक्तिशाली राजा बिम्बिसार तक पहुंची।" उन्होंने वैशाली पर आक्रमण कर दिया और इसी दौरान वह आम्रपाली के घर में एक साधारण यात्री बनकर रुके। दोनों में प्रेम हो गया। जब आम्रपाली को उनकी असली पहचान का पता चला, "तो उन्होंने बिम्बिसार से युद्ध रोकने और वापस जाने का आग्रह किया।" प्रेम में डूबे बिम्बिसार ने ऐसा ही किया, "जिससे वैशाली की जनता की दृष्टि में वह कायर ठहरे।" इस प्रेम संबंध से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम विमल कोंडन्न रखा गया।_* *_मित्रों, "मेरी व्यक्तिगत जानकारी अनुसार यह कहानी मुख्यतः मौखिक परंपरा और गिलगित पांडुलिपियों ( जो मूलसर्वास्तिवाद बौद्ध परंपरा से संबंधित हैं ) में मिलती है।" दिलचस्प बात यह है कि पालि त्रिपिटक में "इस प्रेम प्रसंग का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।" विद्वानों का मानना है कि चूंकि बिम्बिसार बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे, "इसलिए प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों में उन पर किसी नगरवधू से संबंध का कलंक न लगे," इसलिए सावधानी बरती गई होगी। आम्रपाली के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरक प्रसंग है "भगवान बुद्ध से उनकी भेंट और आध्यात्मिक परिवर्तन !" जब बुद्ध अपने अंतिम दिनों में वैशाली पधारे, तो वह आम्रपाली के आम्रवन में ठहरे थे। बुद्ध के वैशाली आगमन की सूचना पाकर आम्रपाली उनके दर्शन को गईं और उनके उपदेश से इतनी प्रभावित हुईं कि "उन्होंने बुद्ध और उनके शिष्यों को भोजन पर आमंत्रित कर लिया।" लौटते समय, उनका रथ "वैशाली के लिच्छवी राजकुमारों के रथ से टकरा गया," जो स्वयं बुद्ध को निमंत्रण देने जा रहे थे। राजकुमारों ने आम्रपाली को "गणिका" और "आम की औरत" जैसे अपशब्द कहकर रास्ता छोड़ने को कहा।_* *_लेकिन आम्रपाली ने गर्व से उन्हें बताया कि "बुद्ध पहले ही उनका निमंत्रण स्वीकार कर चुके हैं।" राजकुमारों ने उन्हें यह सम्मान छोड़ने के लिए अपार धन का लालच दिया, लेकिन आम्रपाली ने साफ मना कर दिया। अंततः बुद्ध ने भी राजकुमारों का निमंत्रण यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि "वह पहले आम्रपाली का निमंत्रण स्वीकार कर चुके हैं।" यह उस समय के समाज में एक "नगरवधू के प्रति बुद्ध के अभूतपूर्व सम्मान और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानवीय गरिमा देखने का अद्वितीय उदाहरण है।" आम्रपाली ने अपने भव्य निवास पर बुद्ध और संघ को भोजन कराया और अत्यंत भावविभोर होकर "अपना संपूर्ण वैभव, संपत्ति और आम्रवन बुद्ध को अर्पित कर दिया।" बुद्ध ने इस दान को स्वीकार किया और वह स्थल "आम्रपाली वन" बौद्ध भिक्षुओं के लिए एक विहार बन गया, "जहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए," जिनमें "आम्रपालिका सूत्र" भी शामिल है।_* *_मित्रों, "इसके तुरंत बाद, आम्रपाली ने नगरवधू का पद त्याग दिया और बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर एक भिक्षुणी बन गईं।" आम्रपाली की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। "उनके जीवन के कुछ और पहलू भी हैं जो उन्हें और भी खास बनाते हैं।" जैसे कि :-_* *_1) संवेदनशील कवयित्री: भिक्षुणी बनने के बाद, आम्रपाली ने 'थेरीगाथा' में 19 अद्भुत कविताएं लिखीं। इनमें उन्होंने "अपनी युवावस्था की खूबसूरती और बुढ़ापे में उसके क्षय का बड़ा ही मार्मिक और संवेदनशील चित्रण किया है," जो अनित्यता के बौद्ध सिद्धांत को जीवंत कर देता है।_* *_2) पुत्र की विरासत: "उनके पुत्र विमल कोंडन्न ने भी माता के पदचिह्नों पर चलते हुए " बौद्ध भिक्षु बनकर एक प्रसिद्ध और सम्मानित बुजुर्ग का दर्जा प्राप्त किया।_* *_3) विविध ग्रंथों में उल्लेख: आम्रपाली के जीवन की कहानी विभिन्न बौद्ध परंपराओं के ग्रंथों में मिलती है। "चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेन त्सांग ने अपने यात्रा वृत्तांतों में वैशाली में उनके आम्रवन विहार का उल्लेख किया है।" इसके अतिरिक्त, गिलगित पांडुलिपियों "और चीनी त्रिपिटक में भी उनके जीवन के विवरण मिलते हैं," जो पालि ग्रंथों से कुछ भिन्न हैं।_* 🤔👌🏻 *_🙏🏻बृहस्पतिवार सांयकाल की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ सुमंगलम, स्नेहिल संध्या वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों के साथ साझा करें ! धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस. एस. अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों,"आम्रपाली सिर्फ एक ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र नहीं हैं, वह एक विचार हैं। वह उस युग की नारी हैं, जिसने विपरीत परिस्थितियों में न केवल अपनी गरिमा बनाए रखी, बल्कि अपनी प्रतिभा और बुद्धि से समाज में अद्वितीय स्थान भी बनाया।" राजा बिम्बिसार से उनका प्रेम हो या बुद्ध के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और त्याग, उनके जीवन का हर अध्याय हमें सिखाता है कि "सच्चा सौंदर्य बाहरी आवरण में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान, करुणा और त्याग में निहित है।" एक नगरवधू से एक अर्हत बनने तक की उनकी यात्रा सचमुच अद्वितीय और सदियों तक मानवीय चेतना को प्रेरित करती रहेगी। ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🛕🌝🛕💐🌴🕉️☯️ #🌜 शुभ संध्या🙏