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*_!! रात्रि : कालीन वंदन !!_*
*_सत्यनारायणं देवं वन्देऽहं कामदं प्रभुम्। लीलया विततं विश्वं येन तस्मै नमो नमः॥_*
*_ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रयसमन्वितम्। लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभाभरणं हरिम्॥_*
*_नीलवर्णं पीतवस्त्रं श्रीवत्साङ्कं सुभूषितम्। गोविन्दं गोकुलानन्दं ब्रह्माद्यैरपि पूजितम्॥_*
*_ॐ विश्वामित्राय विद्महे, धनुर्हस्ताय धीमहि, तन्नो जीवः प्रचोदयात्॥_*
*_ॐ जलबीजाय विद्महे, नीलपुरुषाय धीमहि, तन्नो वरुणः प्रचोदयात्॥_*
*_!! जल के विभिन्न रूप: जीवन का दर्पण !!_*
*_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट !✍🏻_*
*_☝🏻मित्रों, सुबह मैंने जल ( पानी ) के विभिन्न रूप एवं नामों से संबंधीत एक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था, निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है ! मित्रों, पिछले कुछ समय से मन में एक गहरा विचार उठ रहा था, "जो आज इन पंक्तियों को पढ़कर और भी प्रबल हो गया।" अक्सर हम पानी को केवल अपनी प्यास बुझाने या रोज़मर्रा के कामों के लिए "ज़रूरी एक तत्व मात्र समझ लेते हैं।" लेकिन क्या हमने कभी गहराई से देखा है कि यह साधारण-सा दिखने वाला जल अपने हर रूप में हमें जीवन का एक नया सबक सिखाता है ? यह पैराग्राफ "पानी के कितने नाम" हमें उसी यात्रा पर ले जाता है - एक ऐसी यात्रा जो "भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों से शुरू होकर आध्यात्मिकता की गहराइयों तक" पहुँचती है।_*
*_मित्रों, पानी आकाश से गिरता है तो "बारिश कहलाता है," और सूरज की गर्मी पाकर वापस आकाश की ओर उठता है तो "भाप बन जाता है।" यह चक्र हमें सिखाता है कि जीवन में "परिवर्तन ही एकमात्र स्थिरांक है।" परिस्थितियाँ बदलती हैं, और हमें भी उनके अनुसार स्वयं को ढालना सीखना चाहिए। कभी हम कठोर परिस्थितियों में बर्फ या ओलों की तरह मज़बूत बने रहते हैं, तो कभी सहज और बहते हुए नदी की तरह। "यह परिवर्तन हमारी कमज़ोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है।" गौर कीजिए, पानी जिससे भी मिलता है, "उसी का गुण धारण कर लेता है।" फूल पर गिरकर वह "सुगंधित ओस" बन जाता है, और सीप के भीतर जाकर वह "अनमोल मोती" बन जाता है। यह हमें "समाज और संगति" का महत्व समझाता है। हमारा व्यक्तित्व भी उन लोगों के संपर्क से आकार लेता है, जिनके बीच हम रहते हैं। अगर हम अच्छे विचारों और अच्छे लोगों की संगति में रहेंगे, तो हमारा जीवन भी "इत्र" की तरह सुगंधित हो जाएगा।_*
*_मित्रों, पानी जब सीमाओं में बंधा होता है, "तो वह झील बनकर जीवन का आधार बनता है" - आस-पास की हरियाली को संजोता है। लेकिन जब वही पानी अपनी सीमाएं तोड़ देता है, "तो विनाशकारी प्रलय बन जाता है।" यह हमारे जीवन का एक गहरा सत्य है। हमारी इच्छाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और क्रोध भी ऐसे ही हैं। एक सीमा में रहकर ये हमें जीवन देते हैं, लेकिन जैसे ही ये सीमाएं तोड़ते हैं, "यही हमारे जीवन को नष्ट कर सकते हैं।" संतुलन ही जीवन की कुंजी है। आँख से निकला आँसू मन की पीड़ा और करुणा को बयां करता है, तो शरीर से निकला पसीना हमारे परिश्रम और संघर्ष की कहानी कहता है। और फिर वह परम रूप - "श्रीराम के चरणों को छूकर निकले तो चरणामृत।" यहाँ पानी केवल एक भौतिक पदार्थ नहीं रह जाता, "बल्कि भक्ति और समर्पण का प्रतीक बन जाता है।" यह बताता है कि हमारे "कर्म और भावनाएँ," जब सच्ची श्रद्धा और समर्पण से जुड़ जाती हैं, तो वे सामान्य से असामान्य और पवित्र हो जाती हैं।_* 🤔👌🏻
*_🙏🏻बृहस्पतिवार रात्रि की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ सुमंगलम, स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों के साथ साझा करें। धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस. एस. अरोड़ा 9877906419🙏🏻_*
*_विशेष :-_*
*_☝🏻मित्रों, "सचमुच, जल का हर रूप हमारे जीवन के किसी न किसी पहलू को दर्पण की तरह दिखाता है।" यह हमें कोमलता सिखाता है ( ओस की तरह ), करुणा सिखाता है ( आंसू की तरह ), संघर्ष सिखाता है ( नदी की तरह पहाड़ों को काटना ), और अंत में समर्पण सिखाता है ( चरणामृत की तरह )। अगली बार जब आप पानी की एक बूंद को देखें, "तो उसे सिर्फ H2O मत समझिए। उस बूंद में छिपे जीवन के दर्शन को देखिए और अपने भीतर झांकिए।" आप आज अपने जीवन के किस रूप में हैं ? "बहती नदी, स्थिर झील, या समर्पित चरणामृत ?" जल है तो कल है, और जल का हर रूप हमें जीने की कला सिखाता है। ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻
*_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_*
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