Sangam Singh
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#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - बेरोजगार युवा खोल कर देखा बटुआ एक दिन बेबसी की झलक मिलीं ख़ाली वह भी था ख़ाली मैं भी था न दर्द उसका कम था न दर्द मेरा कम था वह भी सोचता होगा किस बदनसीब के पाले में हूं मज़ाक बनके रह गया हूं मैं बेरोजगार युवा हूं आज fis बेरोजगार युवा खोल कर देखा बटुआ एक दिन बेबसी की झलक मिलीं ख़ाली वह भी था ख़ाली मैं भी था न दर्द उसका कम था न दर्द मेरा कम था वह भी सोचता होगा किस बदनसीब के पाले में हूं मज़ाक बनके रह गया हूं मैं बेरोजगार युवा हूं आज fis - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - नारी सबकी नजरों से बचकर निकली हूं घर से अकेली कुछ दूर जाकर पता चला बहुत मुश्किल हैं सफ़र मेरा मगर हारी नही रास्ते कोी बाधाओं से लड़ती रही अपनों और परायों से एक दिन दिखा दूंगी आईना इस तक़दीर को नारी हूं चीर दूंगी मुश्किलों के गुरुर को संगम सिंह नारी सबकी नजरों से बचकर निकली हूं घर से अकेली कुछ दूर जाकर पता चला बहुत मुश्किल हैं सफ़र मेरा मगर हारी नही रास्ते कोी बाधाओं से लड़ती रही अपनों और परायों से एक दिन दिखा दूंगी आईना इस तक़दीर को नारी हूं चीर दूंगी मुश्किलों के गुरुर को संगम सिंह - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - प्रतियोगी छात्र नौकरी की आस में युवा बेचारे उम्मीदों के पुल बांधे मगर नेताओं के झूठे वादे रोज़गार की जगह राशन दिलाते कितना संघर्ष हैं जीवन में कभी प्रयागराज आकर देख जाते आधा पेट खाकर युवा किताब-कापी के पैसे जुटाते कितने पत्थर दिल हो जो इनकी करुण पुकार सुन नहीं पाते  है इनका क्या कसूर जो तुम इन्हें खून के आंसू रुलाते संगम सिंह प्रतियोगी छात्र नौकरी की आस में युवा बेचारे उम्मीदों के पुल बांधे मगर नेताओं के झूठे वादे रोज़गार की जगह राशन दिलाते कितना संघर्ष हैं जीवन में कभी प्रयागराज आकर देख जाते आधा पेट खाकर युवा किताब-कापी के पैसे जुटाते कितने पत्थर दिल हो जो इनकी करुण पुकार सुन नहीं पाते  है इनका क्या कसूर जो तुम इन्हें खून के आंसू रुलाते संगम सिंह - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - रोज़गार पढ़ लिख कर सोचा था मां-बाप का मान बढ़ाऊंँगा जिन्होंने दिया सब कुछ उनका कर्ज चुकाऊंगा लेकिन नेताओं के किए गए वादे अब लग रहे हैं जुमले ज्यादे इनके चक्करों में फंस जाते हैं युवा बेचारे सीधे-साधे बिगुल बजना चाहिए मग़र अब एक स्वर में आवाज उठनी चाहिए भीख नहीं , अधिकार चाहिए बेरोजगार हूं , रोज़गार चाहिए संगम सिंह रोज़गार पढ़ लिख कर सोचा था मां-बाप का मान बढ़ाऊंँगा जिन्होंने दिया सब कुछ उनका कर्ज चुकाऊंगा लेकिन नेताओं के किए गए वादे अब लग रहे हैं जुमले ज्यादे इनके चक्करों में फंस जाते हैं युवा बेचारे सीधे-साधे बिगुल बजना चाहिए मग़र अब एक स्वर में आवाज उठनी चाहिए भीख नहीं , अधिकार चाहिए बेरोजगार हूं , रोज़गार चाहिए संगम सिंह - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - संविदा संविदा और ठेका बनाकर बहते हुए पानी को रोका अब इस पानी का सड़ जाना बाकी हैं कैसे भरू परिवार का पेट कुछ समझ नहीं आता मामूली सी तनख्वाह भी एक साल से बाकी है क्या हाल कर दिया सिस्टम ने जल रहा तेल बनकर पिस्टन में तेरा तमाशा देखना जारी हैं मेरा धुंआ बनना बाकी हैं संगम सिंह संविदा संविदा और ठेका बनाकर बहते हुए पानी को रोका अब इस पानी का सड़ जाना बाकी हैं कैसे भरू परिवार का पेट कुछ समझ नहीं आता मामूली सी तनख्वाह भी एक साल से बाकी है क्या हाल कर दिया सिस्टम ने जल रहा तेल बनकर पिस्टन में तेरा तमाशा देखना जारी हैं मेरा धुंआ बनना बाकी हैं संगम सिंह - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - दर्द-ए-कश्मीर आतंक का दामन थामकर जुल्म जिन्होंने ढाया हैं मानवता अब पूछे उनसे ক্ীন যা খম গণনামা ই कश्मीर को पावन धरतीं पर लहू जो तुमने बहाया है चिराग बुझाकर जाहिलो क्यों अंधकार फैलाया है काँप उठा दिल भयानक मंजर देखकर प्रश्न पूछे आतंकियों से खुलकर युद्धभूमि में लड़ने की तुम्हारी कोई औकात नहीं संगम सिंह दर्द-ए-कश्मीर आतंक का दामन थामकर जुल्म जिन्होंने ढाया हैं मानवता अब पूछे उनसे ক্ীন যা খম গণনামা ই कश्मीर को पावन धरतीं पर लहू जो तुमने बहाया है चिराग बुझाकर जाहिलो क्यों अंधकार फैलाया है काँप उठा दिल भयानक मंजर देखकर प्रश्न पूछे आतंकियों से खुलकर युद्धभूमि में लड़ने की तुम्हारी कोई औकात नहीं संगम सिंह - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - बूढ़ा हूं , लाचार नही ! उमर के हिसाब से माना थोड़ा थक जाता हूं पर कदमों को देता विराम नही जिम्मेदारियो को ढोता हूं घर-्परिवार संजोता हूं बूढ़ा हूं , लाचार नही पर्वत हूं , पठार नही नसीब का खेल देखो নিমক্কী মন ৭ালা ই उसी ने घर से निकाला है लड़खड़ाते कदमों से चला जाऊंगा मग़र बैसाखी को हाथ नहीं लगाऊंगा बूढ़ा हूं , लाचार नही ! पर्वत हूं , पठार नही ! fis बूढ़ा हूं , लाचार नही ! उमर के हिसाब से माना थोड़ा थक जाता हूं पर कदमों को देता विराम नही जिम्मेदारियो को ढोता हूं घर-्परिवार संजोता हूं बूढ़ा हूं , लाचार नही पर्वत हूं , पठार नही नसीब का खेल देखो নিমক্কী মন ৭ালা ই उसी ने घर से निकाला है लड़खड़ाते कदमों से चला जाऊंगा मग़र बैसाखी को हाथ नहीं लगाऊंगा बूढ़ा हूं , लाचार नही ! पर्वत हूं , पठार नही ! fis - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - रूस-्यूक्रेन युद्ध हाथों में बंदूक थमाकर जंग का माहौल बनाया है पर्दे के पीछे बैठकर खेल ये किसने रचाया है  में है वजूद बेचारे का खतरे बहकावे में गैरों के जो आया हैं टकटकी निगाहें हिंद की ओर মমন্সীন ক্ষী ওপ্সীন লযাঘা ই मानवता का फर्ज निभाकर शांति बहाल करने का प्रयास कराया हैं f% 75` बनने की क्षमता है सारे जग को हमने बतलाया हैं संगम सिंह रूस-्यूक्रेन युद्ध हाथों में बंदूक थमाकर जंग का माहौल बनाया है पर्दे के पीछे बैठकर खेल ये किसने रचाया है  में है वजूद बेचारे का खतरे बहकावे में गैरों के जो आया हैं टकटकी निगाहें हिंद की ओर মমন্সীন ক্ষী ওপ্সীন লযাঘা ই मानवता का फर्ज निभाकर शांति बहाल करने का प्रयास कराया हैं f% 75` बनने की क्षमता है सारे जग को हमने बतलाया हैं संगम सिंह - ShareChat
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