#GodNightTuesday
#रोटीकपड़ा_चिकित्सा_शिक्षामकान
. काल के जाल से छुड़वाने वाला बन्दिछोड है
. गरीब, ब्रह्मा विष्णु महेश्वर माया, और धर्मराय कहिये।
इन पाँचों मिल परपंच बनाया, वाणी हमरी लहिये।।
इन पाँचों मिल जीव अटकाये, जुगन-जुगन हम आन छुटाये।
बन्दी छोड़ हमारा नामं, अजर अमर है अस्थिर ठामं।।
पीर पैगम्बर कुतुब औलिया, सुर नर मुनिजन ज्ञानी।
येता को तो राह न पाया, जम के बंधे प्राणी।।
धर्मराय की धूमा-धामी, जम पर जंग चलाऊँ।
जोरा को तो जान न दूगां, बांध अदल घर ल्याऊँ।।
काल अकाल दोहूँ को मोसूं, महाकाल सिर मूंडू।
मैं तो तख्त हजूरी हुकमी, चोर खोज कूं ढूंढू।।
मूला माया मग में बैठी, हंसा चुन-चुन खाई।
ज्योति स्वरूपी भया निरंजन, मैं ही कर्ता भाई।।
हंस अठासी दीप मुनीश्वर, बंधे मुला डोरी।
ऐत्यां में जम का तलबाना, चलिए पुरुष कीशोरी।।
मूला का तो माथा दागूं, सतकी मोहर करूंगा।
पुरुष दीप कूं हंस चलाऊँ, दरा न रोकन दूंगा।।
हम तो बन्दी छोड़ कहावां, धर्मराय है चकवै।
सतलोक की सकल सुनावां, वाणी हमरी अखवै।।
नौ लख पटट्न ऊपर खेलूं, साहदरे कूं रोकूं।
द्वादस कोटि कटक सब काटूं, हंस पठाऊँ मोखूं।।
चौदह भुवन गमन है मेरा, जल थल में सरबंगी।
खालिक खलक खलक में खालिक, अविगत अचल अभंगी।।
अगर अलील चक्र है मेरा, जित से हम चल आए।
पाँचों पर प्रवाना मेरा, बंधि छुटावन धाये।।
जहाँ ओंकार निरंजन नाहीं, ब्रह्मा विष्णु वेद नहीं जाहीं।
जहाँ करता नहीं काल भगवाना, काया माया पिण्ड न प्राणा।।
पाँच तत्त्व तीनों गुण नाहीं, जोरा काल दीप नहीं जाहीं।
अमर करूं सतलोक पठाँऊ, तातैं बन्दी छोड़ कहाऊँ।।
कबीर साहेब जी की महिमा बताते हुए आदरणीय गरीबदास साहेब जी कह रहे हैं कि हमारे प्रभु कविर साहिब जी बन्दी छोड़ हैं। बन्दी छोड़ का भावार्थ है काल की कारागार से छुटवाने वाला, काल ब्रह्म के इक्कीस ब्रह्माण्डों में सर्व प्राणी पापों के कारण काल के बंदी हैं। पूर्ण परमात्मा (कविर्देव) कबीर साहेब पाप का विनाश कर देते हैं। पापों का विनाश न ब्रह्म, न परब्रह्म, न ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी कर सकते हैं। केवल जैसा कर्म है, उसका वैसा ही फल दे देते हैं।
इसीलिए यजुर्वेद अध्याय 5 के मन्त्र 32 में लिखा है ‘कविरंघारिरसि‘ कविर्देव (कबीर परमेश्वर) पापों का शत्रु है, ‘बम्भारिरसि‘ बन्धनों का शत्रु अर्थात् बन्दी छोड़ है। इन पाँचों (ब्रह्मा-विष्णु-शिव-माया और धर्मराय) से ऊपर सतपुरुष परमात्मा (कविर्देव) है। जो सतलोक का मालिक है। शेष सर्व परब्रह्म-ब्रह्म तथा ब्रह्मा-विष्णु-शिव जी व आदि माया नाशवान परमात्मा हैं। महाप्रलय में ये सब तथा इनके लोक समाप्त हो जाएंगे। आम जीव से कई हजार गुणा ज्यादा लम्बी इनकी उम्र है। परन्तु जो समय निर्धारित है वह एक दिन पूरा अवश्य होगा।
आदरणीय गरीबदास जी महाराज कहते हैं कि
शिव ब्रह्मा का राज, इन्द्र गिनती कहां।
चार मुक्ति वैकुंण्ठ समझ, येता लह्या।।
संख जुगन की जुनी, उम्र बड़ धारिया।
जा जननी कुर्बान, सु कागज पारिया।।
येती उम्र बुलंद मरैगा अंत रे।
सतगुरु लगे न कान, न भैंटे संत रे।।
चाहे शंख युग की लम्बी उम्र भी क्यों न हो वह एक दिन समाप्त जरूर होगी। यदि सतपुरुष परमात्मा (कविर्देव) कबीर साहेब के नुमाँयदे पूर्ण संत(गुरु) जो तीन नाम का मंत्र (जिसमें एक ओउम + तत् + सत् सांकेतिक हैं) देता है तथा उसे पूर्ण संत द्वारा नाम दान करने का आदेश है, उससे उपदेश लेकर नाम की कमाई करेंगे तो हम सतलोक के अधिकारी हंस हो सकते हैं। सत्य साधना बिना बहुत लम्बी उम्र कोई काम नहीं आएगी क्योंकि निरंजन लोक में दुःख ही दुःख है।
कबीर, जीवना तो थोड़ा ही भला, जै सत सुमरन होय।
लाख वर्ष का जीवना, लेखै धरै ना कोय।।
कबीर साहिब अपनी (पूर्णब्रह्म की) जानकारी स्वयं बताते हैं कि इन परमात्माओं से ऊपर असंख्य भुजा का परमात्मा सतपुरुष है जो सत्यलोक (सच्च खण्ड, सतधाम) में रहता है तथा उसके अन्तर्गत सर्वलोक ख्ब्रह्म (काल) के 21 ब्रह्माण्ड व ब्रह्मा, विष्णु, शिव शक्ति के लोक तथा परब्रह्म के सात शंख ब्रह्माण्ड व अन्य सर्व ब्रह्माण्ड, आते हैं और वहाँ पर सत्यनाम-सारनाम के जाप द्वारा जाया जाएगा जो पूरे गुरु से प्राप्त होता है।
सच्चखण्ड (सतलोक) में जो आत्मा चली जाती है उसका पुनर्जन्म नहीं होता। सतपुरुष (पूर्णब्रह्म) कबीर साहेब (कविर्देव) ही अन्य लोकों में स्वयं ही भिन्न-भिन्न नामों से विराजमान हैं। जैसे अलख लोक में अलख पुरुष, अगम लोक में अगम पुरुष तथा अकह लोक में अनामी पुरुष रूप में विराजमान हैं। ये तो उपमात्मक नाम हैं, परन्तु वास्तविक नाम उस पूर्ण पुरुष का कबीर साहेब है।
AnnapurnaMuhim SantRampalJi #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
#GodNightMonday
#रोटीकपड़ा_चिकित्सा_शिक्षामकान
. #अरदास - हे मेरे सतगुरू जी!
सतगुरु की सिजदा करू, जिन कर्म छुड़ाये कोट।
ऐसे सतगुरु की निंदा करें, उसके हम तोड़ेंगे होट।।
सुखी होने के लिये मैंने कौनसा काम नहीं किया? विवाह किया, संतानें पैदा कीं, धन कमाया, यश-कीर्ति के लिये प्रयास किया, लोगों से प्रेम बढ़ाना चाहा और न मालूम क्या-क्या किया। परन्तु सच कहता हूँ मेरे मालिक ! ज्यों ज्यों सुख के लिये प्रयत्न किया, त्यों-ही-त्यों परिणाम में दुःख और कष्ट ही मिलते गये। जहाँ मन टिकाया वहीं धोखा खाया ! कहीं भी आशा फलवती नहीं हुई। चिन्ता, भय, निराशा और विषाद बढ़ते ही गये। कहीं रास्ता दिखायी नहीं दिया। मार्ग बंद हो गया।
आपकी कृपा की हुई, आपकी कृपा से यह बात समझ में आने लगी कि आपके अभय चरणों के आश्रय को छोड़कर कहीं भी सच्चा और स्थायी सुख नहीं है। आपका चरणाश्रय प्राप्त करने के लिये कुछ खर्च भी नही किया गया। प्रयत्न भी नही किया। आपकी कृपा से मुझ नीच को सरलता से शरण मे ले लिया। जैसे घोबी मैले कुचले कपडो को उजवल करने के लिये लेता है।आपकी शरण मे आने के बाद मुझे सुख-शान्ति और वव्यभवता और सम्पनता मिली।
परन्तु मेरे मालिक हे मेरे सतगुरू ! पूर्वाभ्यासवश बार बार यह मन विषयों की ओर चला जाता है। रोकने की चेष्टा भी करता हूँ, कभी-कभी रूकता भी है, परन्तु जाने की आदत छोड़ता नहीं ! आपके चरणों के सिवा इस दुनिया मे सर्वत्र भय-ही-भय छाया रहता है। दुःखों का सागर ही लहराता रहता है। यह जानते, समझते और देखते हुए भी मेरा मन विषय भोगो की तरफ बे लगाम घोडो की तरह दौडता है। इससे अधिक मेरे मन की नीचता और क्या होगी। हे दयामय मेरे मालिक!
आप दयालु हो, मेरी ओर न देखकर अपनी कृपा से ही मेरे इस दुष्ट मन को अपनी ओर खींच लो। इसे ऐसा जकड़कर बाँध लो कि यह कभी दूसरी ओर जा ही न सके। श्वासो श्वास मे आपका दिया नाम रहे। तीन वक्त नितनियम, असुरनिकंदन रैमणी और संध्या आरती मे भी ध्यान रहे। मेरे सतगुरू ! ऐसा कब होगा ? कब मेरा यह मन आपके चरणों के दर्शनों में ही तल्लीन हो रहेगा। कब यह आपकी मनोहर सुरती आँखो मे बस जाये। हे मेरे मालिक मेरे सतगुरु आप अपने इस नीच दास कर कृपा करे।
हे मेरे मालिक! सुना है कि दुर्वासा श्रृषी के क्रोध बहुत था। बात बात पर क्रोध आता था। मगर मेरे मालिक मै तो क्रोध अग्नि मे हरवक्त जलता रहता हू। इसे आप ही शातं कर सकते है मैने तो बार बार कोशिश की मगर क्रोधअग्नि बढती ही जाती है। इसके शातं करना मेरे वश की बात नही है। हे मेरे मालिक इस राक्षस पृवति को आप ही दास भाव देकर इंसान बना सकते है
अब देर न करो बन्दिछोड! मेरी आखे केवल आपको निहारती रहे और चाहे कुछ भी दिखाई ना दे। मेरे सांसो मे आपके दिया मंत्र रहे व्यर्थ स्वास ना जाये। और आपके सतलोक का स्थाई निवासी बना लेना , चाहे वहा कुछ भी सेवा दे। मेरे मालिक हे बन्दीछोड जीवन-संध्या समीप है। इससे पहले-पहले ही आप अपनी दिव्य ज्योति से जीवन में नित्य प्रकाश फैला दो । इससे समुज्ज्वल बनाकर अपने सतलोक धाम में ले चलो और सदा के लिये वहीं रहने का स्थान देकर निहाल कर दो ।
AnnapurnaMuhim SantRampalJi #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
Saint Rampal Ji Maharaj's Annapurna campaign brought hope to three innocent children and their elderly grandmother in Sher Nagar village, Mathura. Providing rations to a needy family exemplified humanity.
By helping Balbir ji's family, Annapurna Abhiyan proved that service to humanity is #🔊सुन्दर कांड🕉️ #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏 देवी दर्शन🌸 #💫ध्यान के मंत्र🧘♂️ #🌠ओशो☘️ the greatest virtue.
#AnnapurnaMuhim_SantRampalJi
#SantRampalJiMaharaj #SatlokAshram
#FactfulDebatesYouTubeChannel
#KabirisGod
#SupremeGod
Saint Rampal Ji Maharaj's Annapurna campaign brought hope to three innocent children and their elderly grandmother in Sher Nagar village, Mathura. Providing rations to a needy family exemplified humanity.
By helping Balbir ji's family, Annapurna Abhiyan proved that service to humanity is the greatest virtue.
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जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी भगवान जी की जय हो बंदी छोड़ सतगुरु रामपाल जी भगवान जी जय हो बंदी छोड़ जय हो #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
#GodNightFriday
#मांस_खाना_अल्लाह_का_आदेशनहीं
, कबीरजी ने स्वामी रामानन्दजी को तत्वज्ञान समझाया
पंडित स्वामी रामानन्द जी एक विद्वान पुरुष थे। वेदों व गीता जी के मर्मज्ञ ज्ञाता माने जाते थे। जिस समय कबीर परमेश्वर (कविर्देव) अपने लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हो गए तब गुरु मर्यादा बनाए रखने के लिए लीला की। अढ़ाई वर्ष की आयु के बच्चे का रूप धारण करके सुबह-सुबह अंधेरे में पंचगंगा घाट की पौड़ियों के ऊपर लेट गए, जहाँ पर स्वामी रामानन्द जी प्रतिदिन स्नानार्थ जाया करते थे। श्री रामानन्द जी चारों वेदों के ज्ञाता और पवित्र गीता जी के विद्वान माने जाते थे। स्वामी रामानन्द जी की आयु 104 वर्ष की हो चुकी थी। काशी में जो पाखण्ड पूजा दूसरे पण्डितों ने चला रखी थी वह बंद करवा दी थी।
रामानन्द जी शास्त्र अनुकूल साधना बताया करते थे और पूरी काशी में अपने बावन दरबार लगाया करते थे। रामानन्द जी पवित्र गीता जी व पवित्र वेदों के आधार पर विधिवत् साधना बताते थे। ओ3म् नाम का जाप उपदेश देते थे। उस दिन भी जब स्नान करने के लिए पंचगंगा घाट पर गए तो पौड़ियों पर कबीर साहेब लेटे हुए थे। सुबह ब्रह्ममुहूर्त के अंधेरे में स्वामी रामानन्द जी को कबीर साहेब दिखाई नहीं दिए। कबीर साहेब के सिर में रामानन्द जी के पैर की खड़ाऊ लग गई। कविर्देव ने जैसे बालक रोते हैं ऐसे रोना शुरु कर दिया।
रामानन्द जी तेजी से झुके और देखा कि कहीं बालक को चोट तो नहीं लग गई तथा प्यार से उठाया। उसी समय रामानन्द जी के गले की कण्ठी (माला) निकल कर परमेश्वर कविर्देव के गले में डल गई। रामानन्द जी ने कहा कि बेटा राम - राम बोलो। राम के नाम से दुःख दूर हो जाते हैं, पुत्र राम - राम बोलो, कबीर साहेब के सिर पर हाथ रखा। शिशु रूप में कबीर साहेब चुप हो गए। फिर रामानन्द जी स्नान करने लग गए और सोचा कि बच्चे को आश्रम में ले चलूँगा। जिसका होगा उसके पास भिजवा दूँगा। रामानन्द जी ने स्नान करके देखा तो बच्चा वहाँ पर नहीं है। कबीर साहेब वहाँ से अंतध्र्यान हुए और अपनी झोपड़ी में आ गए। रामानन्द जी ने सोचा कि बच्चा था चला गया होगा, अब उसको कहाँ ढूंढू?।
कबीर जी द्वारा स्वामी रामानन्द को दो रूप दिखाना
एक दिन स्वामी रामानन्द जी का कोई शिष्य कहीं पर सत्संग कर रहा था। कबीर साहेब वहाँ पर चले गए। वह ऋषि जी श्री विष्णु पुराण की कथा सुना रहा था। वह कह रहा था कि भगवान विष्णु जी सारी सृष्टि के रचनहार हैं, यही पालनकर्ता हैं, यही राम और कृष्ण रूप में अवतार आने वाली परम शक्ति हैं, अजन्मा हैं, श्री विष्णु जी के कोई माता-पिता नहीं हैं। कविरीश्वर ने यह सारी चर्चा सुनी।
सत्संग के उपरान्त कबीर परमेश्वर ने कहा ऋषि जी क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? ऋषि जी ने कहा कि हाँ बेटा! पूछो। वहाँ सैकड़ों की संख्या में भक्तजन उपस्थित थे। कविर्देव ने कहा कि आप विष्णु पुराण से सत्संग सुना रहे थे कि श्री विष्णु जी परमशक्ति है, इन्हीं से ब्रह्मा और शिव की उत्पत्ति हुई है। ऋषि जी ने कहा कि मैं जो सुनाता हूँ, विष्णु पुराण में ऐसा ही लिखा हुआ है। कबीर साहेब ने कहा कि ऋषि जी मैंने तो आपसे संशय निवारण के लिए प्रार्थना की है आप क्षुब्ध मत होइऐ।
एक दिन मैंने शिवपुराण सुना था। उसमें वह महापुरुष सुना रहे थे कि भगवान शिव से विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई (प्रमाण पवित्र शिव पुराण, रूद्र संहिता, अध्याय 6 तथा 7 में, गीता प्रैस गोरख पुर से प्रकाशित) देवी भागवत के तीसरे स्कंद में लिखा है कि देवी इन तीनों ब्रह्मा-विष्णु- शिव की माँ है। ये तीनों नाशवान हैं, अविनाशी नहीं हैं। ऋषि जी निरूतर हो गए। क्रोधित होकर बोला तू कौन है ? किसका पुत्र है ? कबीर साहेब से पहले ही दूसरे भक्तजन कहने लगे कि यह तो नीरु जुलाहे का पुत्र है।
स्वामी रामानन्द जी का शिष्य कहने लगा कि तूने गले में कण्ठी कैसे डाल रखी है ? तेरा गुरुदेव कौन है? कबीर साहेब ने कहा कि मेरे गुरुदेव वही हैं जो आपके गुरुदेव हैं। वह ऋषि बहुत क्रोधित हो गया तथा बोला कि रे नादान ! तू अछूत जुलाहे का बच्चा और मेरे गुरुदेव को अपना गुरुदेव बताता है। मेरे गुरुदेव का पता है कौन हैं ? श्री श्री 1008 पंडित रामानन्द जी आचार्य। तू जुलाहे का बालक, वे तो तेरे जैसे अछूतों के दर्शन भी नहीं करते और तू कह रहा है कि मैंने उनसे नाम लिया है। देख लो भाई भक्तजनों यह झूठा, कपटी है। अभी गुरुदेव के पास जाऊँगा और उनको तेरी सारी कहानी बताऊँगा। तू छोटी जाति का बच्चा हमारे गुरुदेव की बेइज्जती करता है।
कविरग्नि बोले कि ठीक है गुरुदेव जी को बताओ। उस ऋषि ने जाकर श्री रामानन्द जी को बताया कि गुरुदेव एक जुलाहे जाति का लड़का है। उसने तो हमारी नाक काट दी। वह कहता है कि स्वामी रामानन्द जी मेरे गुरुदेव हैं। हे भगवन् ! हमारा तो बाहर निकलना दुःभर हो गया। स्वामी रामानन्द जी बोले कि कल सुबह उसको बुला कर लाओ। कल देखना तुम्हारे सामने मैं उसको कितना दण्ड दूँगा।
स्वामी रामानन्द जी के मन की बात बताना।
अगले दिन सुबह-सुबह कबीर साहेब को दस नादान व्यक्तियों ने पकड़ कर श्री रामानन्द जी के सामने उपस्थित कर दिया। रामानन्द जी ने यह दिखाने के लिए कि मैं कभी छोटी जाति वालों के दर्शन भी नहीं करता, यह झूठ बोल रहा था कि इसने मेरे से दीक्षा ली है, आगे पर्दा लगा लिया। रामानन्द जी ने पर्दे के पीछे से पूछा कि तू कौन है और तेरी क्या जाति है? तेरा कौन सा पंथ है, अर्थात् किस परमात्मा की पूजा करता है?:-
रामानंद अधिकार सुनि, जुलहा अक जगदीश।
दास गरीब बिलंब ना, ताहि नवावत शीश।।
रामानंद कूं गुरु कहै, तनसैं नहीं मिलात।
दास गरीब दर्शन भये, पैडे लगी जुं लात।।
पंथ चलत ठोकर लगी, रामनाम कहि दीन।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लई प्रबीन।।
आडा पडदा लाय करि, रामानंद बूझंत।
दास गरीब कुलंग छबि, अधर डाक कूदंत।।
कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाम।
दास गरीब अधीन गति, बोलत है बलि जांव।।
उत्तर कबीर जी का:-
जाति हमारी जगतगुरु, परमेश्वर पद पंथ।
दास गरीब लिखति परै, नाम निंरजन कंत।।
रामानन्द जी बोले:-
रे बालक सुन दुर्बद्धि, घट मठ तन आकार।
दास गरीब दरद लग्या, हो बोले सिरजनहार।।
तुम मोमन के पालवा, जुलहै के घर बास।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास।।
मान बडाई छांडि करि, बोलौ बालक बैंन।
दास गरीब अधम मुखी, एता तुम घट फैंन।।
तर्क तलूसैं बोलतै, रामानंद सुर ज्ञान।
दास गरीब कुजाति है, आखर नीच निदान।।
परमेश्वर कबीर जी ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया -
महके बदन खुलास कर, सुनि स्वामी प्रबीन।
दास गरीब मनी मरै, मैं आजिज आधीन।।
मैं अविगत गति सैं परै, च्यारि बेद सैं दूर।
दास गरीब दशौं दिशा, सकल सिंध भरपूर।।
सकल सिंध भरपूर हूँ, खालिक हमरा नाम।
दासगरीब अजाति हूँ, तैं जूं कह्या बलि जांव।।
जाति पाति मेरे नहीं, नहीं बस्ती नहीं गाम।
दासगरीब अनिन गति, नहीं हमारे नाम।।
नाद बिंद मेरे नहीं, नहीं गुदा नहीं गात।
दासगरीब शब्द सजा, नहीं किसी का साथ।।
सब संगी बिछरू नहीं, आदि अंत बहु जांहि।
दासगरीब सकल वंसु, बाहर भीतर माँहि।
ए स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टि हमारै तीर।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत सत्य कबीर।।
पौहमी धरणि आकाश मैं, मैं व्यापक सब ठौर।
दास गरीब न दूसरा, हम समतुल नहीं और।
हम दासन के दास हैं, करता पुरुष करीम।
दासगरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम।।
सुनि रामानंद राम हम, मैं बावन नरसिंह।
दास गरीब कली कली, हमहीं से कृष्ण अभंग।।
हमहीं से इंद्र कुबेर हैं, ब्रह्मा बिष्णु महेश।
दास गरीब धरम ध्वजा, धरणि रसातल शेष।।
सुनि स्वामी सति भाखहूँ, झूठ न हमरै रिंच।
दास गरीब हम रूप बिन, और सकल प्रपंच।।
गोता लाऊं स्वर्ग सैं, फिरि पैठूं पाताल।
गरीबदास ढूंढत फिरूं, हीरे माणिक लाल।
इस दरिया कंकर बहुत, लाल कहीं कहीं ठाव।
गरीबदास माणिक चुगैं, हम मुरजीवा नांव।
मुरजीवा माणिक चुगैं, कंकर पत्थर डारि।
दास गरीब डोरी अगम, उतरो शब्द अधार।।
यदि मेरी जाति पूछ रहे हो तो मैं जगतगुरु हूँ (वेदों में लिखा है कि जगतगुरु, सारी सृष्टि को ज्ञान प्रदान करने वाले कबीर प्रभु हैं) मेरा पंथ क्या है? (किस परमेश्वर का मैं मार्गदर्शन करता हूँ?) इसके उत्तर में कबीर जी ने कहा मेरा परमेश्वर पंथ है। ईश, ईश्वर, परमेश्वर (ब्रह्म, परब्रह्म, पूर्णब्रह्म तथा क्षर पुरुष, अक्षर पुरुष, परम अक्षर पुरुष) मैं उस सर्वोच्च शक्ति (सुप्रीम पावर) परमेश्वर का मार्ग दर्शन करने आया हूँ, जो अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड के रचयिता और धारण-पोषण करने वाले हैं। वेदों में जिसको कविर्देव, कविरग्नि आदि नामों से सम्बोधित किया है।
ईश व क्षर पुरूष तो ब्रह्म को कहा जाता है जो केवल इक्कीस ब्रह्मण्ड का स्वामी है परब्रह्म व अक्षर पुरूष को ईश्वर कहा जाता है जो सात शंख ब्रह्मण्डों का स्वामी है तथा परम अक्षर पुरूष को पूर्ण ब्रह्म व परमेश्वर कहा जाता है जो असंख ब्रह्मण्डों का स्वामी है अर्थात् कुल का मालिक है और इसलिए कबीर जी ने स्वामी रामानंद जी से कहा कि मेरा पंथ परमेश्वर की प्राप्ति वाला है।
गीता अ. 15 श्लोक नं. 17 में लिखा है कि वास्तव में अविनाशी परमेश्वर तो कोई और ही है और वही तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और वही अविनाशी परमात्मा परमेश्वर इस नाम से जाना जाता है। वह परमेश्वर मैं ही हूँ। इस बात को सुनकर स्वामी रामानन्द जी बहुत क्षुब्ध हो गए तथा कहा कि रे निकम्मे! तू छोटी जाति का और छोटा मुँह बड़ी बात। तू अपने आप भगवान बन बैठा। बुरी गालियाँ भी दी। कबीर साहेब बोले हे गुरुदेव! आप मेरे गुरुजी हैं। आप मुझे गाली दे रहे हो तो भी मुझे आनन्द आ रहा है। लेकिन मैं जो आपको कह रहा हूँ, मैं ज्यों का त्यों पूर्णब्रह्म ही हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है।
इस बात को सुनकर रामानन्द जी ने कहा कि ठहर जा तेरी तो लम्बी कहानी बनेगी, तू ऐसे नहीं मानेगा। मैं पहले अपनी पूजा कर लेता हूँ। रामानन्द जी ने कहा कि इसको बैठाओ मैं पहले अपनी कुछ क्रिया रहती है वह कर लेता हूँ, बाद में इससे निपटूंगा। स्वामी रामानन्द जी क्या क्रिया करते थे? भगवान विष्णु जी की एक काल्पनिक मूर्ति बनाते थे। सामने मूर्ति दिखाई देने लग जाती थी (जैसे कर्मकाण्ड करते हैं, भगवान की मूर्ति के पहले वाले सारे कपड़े उतार कर, उनको जल से स्नान करवा कर, फिर स्वच्छ कपड़े भगवान ठाकुर को पहना कर गले में माला डालकर, तिलक लगा कर मुकुट रख देते हैं।)
रामानन्द जी कल्पना कर रहे थे। कल्पना करके भगवान की काल्पनिक मूर्ति बनाई। श्रद्धा से जैसे नंगे पैरों जाकर आप ही गंगा जल लाए हों, ऐसी अपनी भावना बना कर ठाकुर जी की मूर्ति के कपड़े उतारे, फिर स्नान करवाया तथा नए वस्त्रा पहना दिए। तिलक लगा दिया, मुकुट रख दिया और माला (कण्ठी) डालनी भूल गए। यदि कण्ठी न डाले तो पूजा अधूरी और मुकुट रख दिया तो पुनः उसे उतारा नहीं जा सकता। यदि उसी दिन मुकुट उतार दे तो पूजा खण्डित मानी जाती है। स्वामी रामानन्द जी अपने आप को कोस रहे हैं कि इतना जीवन हो गया मेरा कभी, भी ऐसी गलती जिन्दगी में नहीं बनी थी।
प्रभु आज क्या गलती बन गई मुझ पापी से? यदि मुकुट उतारूँ तो पूजा खण्डित। उसने सोचा कि चल मुकुट के ऊपर से कण्ठी (माला) डाल कर देखता हूँ (कल्पना से कर रहे हैं कोई सामने मूर्ति नहीं है और पर्दा लगा है कबीर साहेब दूसरी तरफ बैठे हैं)। मुकुट में माला फँस गई आगे नहीं जा रही थी। तब रामानन्द जी ने सोचा अब क्या करूं? हे भगवन्! आज तो मेरा सारा दिन ही व्यर्थ गया। आज की मेरी भक्ति कमाई व्यर्थ गई (क्योंकि जिसको परमात्मा की कसक होती है उसका एक नित्य नियम भी रह जाए तो उसको दर्द बहुत होता है। जैसे इंसान की जेब कट जाए और फिर बहुत पश्चाताप करता है। ऐसे ही प्रभु के सच्चे भक्तों को इतनी लगन होती है।)
इतने में कबीर साहेब ने कहा कि स्वामी जी माला की घुण्डी खोलो और गले में डाल दो। फिर गाँठ लगा दो, मुकुट उतारना नहीं पड़ेगा। अब रामानन्द जी काहे के मुकुट उतारे था, काहे की गाँठ खोले था। कुटिया के सामने लगा पर्दा भी स्वामी रामानन्द जी ने अपने हाथ से फैंक दिया और सारे ब्राह्मण समाज के सामने उस कबीर परमेश्वर को सीने से लगा लिया। रामानन्द जी ने कहा कि हे भगवन!
आपका तो इतना कोमल शरीर है जैसे रूई हो और मेरा तो पत्थर जैसा शरीर है। एक तरफ तो प्रभु खड़े हैं और एक तरफ जाति व धर्म की दीवार है। प्रभु चाहने वाली पुण्यात्माऐं धर्म की बनावटी दीवार को तोड़ना श्रेयकर समझते हैं। वैसा ही स्वामी रामानन्द जी ने किया। सामने पूर्ण परमात्मा को पा कर न जाति देखी न धर्म देखा, न छुआ-छात, केवल आत्म कल्याण देखा। इसे ब्राह्मण कहते हैं।
बोलत रामानंदजी, हम घर बडा सुकाल।
गरीबदास पूजा करैं, मुकुट फही जदि माल।।
सेवा करौं संभाल करि, सुनि स्वामी सुर ज्ञान।
गरीबदास शिर मुकुट धरि,माला अटकी जान।
स्वामी घुंडी खोलि करि, फिरि माला गल डार।
गरीबदास इस भजन कूं, जानत है करतार।।
ड्यौढी पडदा दूरि करि, लीया कंठ लगाय।
गरीबदास गुजरी बौहत, बदनैं बदन मिलाय।
स्वामी रामानन्द जी ने कहा हे कबीर प्रभु! आपने झूठ क्यों बोला? कबीर साहेब बोले कि कैसा झूठ स्वामी जी? स्वामी रामानन्द जी ने कहा कि आप कह रहे थे कि आपने मेरे से नाम ले रखा है। आपने मेरे से उपदेश कब लिया? कबीर साहेब बोले एक समय आप स्नान करने के लिए पँचगंगा घाट पर गए थे। मैं वहाँ लेटा हुआ था। आपके पैरों की खड़ाऊ मेरे सिर में लगी थी तो आपने कहा था कि बेटा राम नाम बोलो। रामानन्द जी बोले-हाँ, अब कुछ याद आया। परन्तु वह तो बहुत छोटा बच्चा था (क्योंकि उस समय पाँच वर्ष की आयु के बच्चे बहुत बड़े हो जाया करते थे तथा पाँच वर्ष के बच्चे के शरीर तथा ढ़ाई वर्ष के बच्चे के शरीर में दुगूना अन्तर हो जाता है)।
कबीर साहेब कहने लगे कि स्वामी जी देखो, मैं ऐसा था। स्वामी रामानन्द जी के सामने भी खड़े हैं और एक ढाई वर्षीय बच्चे का दूसरा रूप बना कर किसी सेवक की वहाँ पर खटिया बिछी थी उसके ऊपर विराजमान हो गए। अब रामानन्द जी ने छः बार तो उधर देखा और छः बार उधर देखा। फिर आँखें मलमल कर देखा कि कहीं तेरी आँखें धोखा तो नहीं खा रही हैं। इस प्रकार देख ही रहे थे कि इतने में कबीर साहेब का छोटे वाला रूप उठा और कबीर साहेब के बड़े पाँच वर्ष वाले स्वरूप में समा गया। पाँच वर्ष वाले स्वरूप में कबीर साहेब रह गए।
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परबेश।
गरीबदास गति को लखै, कौन वरण क्या भेष।
यह तौ तुम शिक्षा दई, मानि लई मनमोर।
गरीबदास कोमल पुरूष, हमरा बदन कठोर।।
तब रामानन्द जी बोले कि मेरा संशय मिट गया। हे परमेश्वर! आप को कैसे पहचान सकते हैं। आप किस जाति #🙏🏻विष्णु भजन Video #🙏🏻शनिदेव भजन #🙏🏻श्री साईं भजन #☪ सूफी संगीत 🕌 #🙏🏻 गणपति भजन 🌺 में तथा वेश भूषा में खड़े हो। हम नादान प्राणी आप के साथ वाद-विवाद करके दोषी हो गए, क्षमा करना पूर्ण परमेश्वर कविर्देव, मैं आप का अनजान बच्चा हूँ।
Baakhabar Sant Rampal Ji
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. स्वामी रामानन्दजी की मन की पुजा लखी
स्वामी रामानंद जी विष्णु जी की काल्पनिक मूर्ति बनाकर मानसिक पूजा करते थे। एक समय ठाकुर की मूर्ति पर माला डालनी भूल गए। तब कबीर परमात्मा जो कि 5 वर्ष के बालक की लीला कर रहे थे बोले कि माला की गांठ खोल कर गले में डाल दो स्वामी जी, पूजा खंडित नहीं होगी। तब रामानंद जी जो पर्दे के भीतर मन में पूजा कर रहे थे, कबीर परमात्मा को सबके सामने गले लगा लिया।
मन की पूजा तुम लखी मुकुट माल परवेश।
गरीबदास गति कौ लखै, कौन वरण क्या भेष।।
स्वामी रामानंद जी के पछने पर कि तुम कौन हो, कौन तुम्हारी जात है। तुम्हारे माता पिता औन है तो कबीर साहेब प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं ।
ए स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टि हमारै तीर।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत सत्य कबीर।।
पौहमी धरणि आकाश में, मैं व्यापक सब ठौर।
दास गरीब न दूसरा, हम समतुल नहीं और।।
हम दासन के दास हैं, करता पुरुष करीम।
दासगरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम।।
सुनि रामानंद राम हम, मैं बावन नरसिंह।
दास गरीब कली कली, हमहीं से कृष्ण अभंग।।
हमहीं से इंद्र कुबेर हैं, ब्रह्मा बिष्णु महेश।
दास गरीब धर्म धव्जा, धरणि रसातल शेष।।
सुनि स्वामी सति भाखहूँ, झूठ न हमरै रिंच।
दास गरीब हम रूप बिन, और सकल प्रपंच।।
गोता लाऊं स्वगर् सैं, फिरि पैठूं पाताल।
गरीबदास ढूंढत फिरूं, हीरे माणिक लाल।।
इस दरिया कंकर बहुत, लाल कहीं कहीं ठाव।
गरीबदास माणिक चुगैं, हम मुरजीवा नांव।।
मुरजीवा माणिक चुगैं, कंकर पत्थर डारि।
दास गरीब डोरी अगम, उतरो शब्द अधार।।
स्वामी रामानन्द जी ने कहाः- अरे कुजात! अथार्त् शुद्र! छोटा मुंह बड़ी बात, तू अपने आप को परमात्मा कहता है। तेरा शरीर हाड़-मांस व रक्त निमिर्त है। तू अपने आपको अविनाशी परमात्मा कहता है तेरा जुलाहे के घर जन्म है फिर भी अपने आप को अजन्मा अविनाशी कहता है तू कपटी बालक है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि
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ना मैं जन्मु ना मरूँ, ज्यों मैं आऊँ त्यों जाऊँ,
गरीबदास सतगुरु भेद से लखो हमारा ढांव।।
सुन रामानन्द राम मैं, मुझसे ही बावन नृसिंह।
दास गरीब युग-2 हम से ही हुए कृष्ण अभंग।।
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कबीर साहेब कहते हैं: “माँस माँस सब एक है…” चाहे किसी भी जीव का मांस हो, जीव हत्या पाप है। मनुष्य को दया भाव अपनाना चाहिए।
कबीर साहेब ने जीव हत्या को नरक का मार्ग बताया है। अहिंसा अपनाकर ही मानव जीवन सफल हो सकता है।
कबीर साहेब और संत गरीबदास जी महाराज ने अहिंसा को मानवता का आधार बताया। जीवों पर दया करना ही सच्ची भक्ति है।
जिस प्रकार हमें अपने प्रियजनों का दुख सहन नहीं होता, उसी प्रकार पशु भी दर्द महसूस करते हैं।
कबीर साहेब कहते हैं: “मुसलमान मारै करद सो, हिंदू मारे #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 तरवार…” निर्दोष जीव की हत्या करने वाला हर व्यक्ति कर्मों का फल अवश्य भुगतता है।
क्या कभी दयालु परमात्मा ने जीवों की गर्दन काटने का आदेश दिया? कबीर साहेब ने मुल्ला-काजियों से यही प्रश्न पूछा।
दया और मेहर के बिना भक्ति अधूरी है। जीव हत्या करने वाला मनुष्य मोक्ष नहीं पा सकता।
संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि भगवान के नाम पर जीव हत्या करना धर्म नहीं, बल्कि अज्ञानता है।
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कबीर साहेब ने कहा कि दया के बिना मनुष्य 84 लाख योनियों में भटकता रहता है।
जिस जीव को काटा जाता है, उसकी आत्मा भी दर्द से चीखती है। यह समझना ही मानवता है।
गाय, हिरण, मुर्गी या कोई भी जीव — सभी को जीवन प्रिय है। किसी की हत्या धर्म नहीं हो सकती।
कबीर परमात्मा ने स्पष्ट कहा कि हिंसा करने वाले को कर्मों का दंड अवश्य मिलता है।
संतों की वाणी समाज को प्रेम और करुणा का मार्ग दिखाती है।
जीव हत्या करके ईश्वर की भक्ति संभव नहीं। परमात्मा दया से प्रसन्न होता है।
कबीर साहेब का संदेश स्पष्ट है — किसी भी जीव को पीड़ा देना पाप है।
यदि मनुष्य स्वयं दर्द नहीं सह सकता, तो दूसरों को दर्द देने का अधिकार कैसे पा सकता है?
हलाल और झटका दोनों में हिंसा समान है। कबीर साहेब ने दोनों को गलत बताया।
सच्चा धार्मिक वही है जिसके मन में हर जीव के प्रति करुणा हो।
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