🔱महिषासुर मर्दिनी🔱

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sn vyas
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#जय मां महिषासुर मर्दिनी🙏🙏 #🔱महिषासुर मर्दिनी🔱 माँ दुर्गा से जुड़ा एक अत्यंत अद्भुत और महत्वपूर्ण विषय है — 'महिषासुर वध: सामूहिक ऊर्जा (Synergy) और स्त्री शक्ति का प्राकट्य'। पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक असुर को यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी देवता, दानव या पुरुष उसका वध नहीं कर सकता। इस अहंकार में उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। १. एकाकी शक्ति की सीमा और सामूहिक चेतना का उदय जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) सहित सभी देवता महिषासुर से पराजित हो गए, तब उन्होंने यह अनुभव किया कि अलग-अलग लड़कर इस संकट से नहीं उबरा जा सकता। सभी देवताओं के क्रोध और भीतर की दिव्य ऊर्जा (तेज) से एक अत्यंत दिव्य प्रकाश पुंज उत्पन्न हुआ। उसी परम तेजोमय प्रकाश से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। २. शस्त्रों का दान: विविध क्षमताओं का एकीकरण माँ दुर्गा को हर देवता ने अपना सर्वश्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र सौंपा: शिव जी ने त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र, वरुण देव ने शंख, अग्नि ने शक्ति, और हिमालय ने वाहन के रूप में सिंह (शेर) भेंट किया। यह इस बात का प्रतीक है कि जब समाज या संस्था पर बड़ा संकट आता है, तो अपनी-अपनी व्यक्तिगत विशेषज्ञता और क्षमताओं को एक साथ जोड़कर ही उसका सामना किया जा सकता है। ३. महिषासुर: अज्ञान और पशुता का प्रतीक 'महिष' का अर्थ होता है भैंसा। महिषासुर मनुष्य के भीतर छिपी तामसिक प्रवृत्ति, आलस्य, काम, क्रोध और पशुता का प्रतीक है। जब व्यक्ति की वासना और अहंकार अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है, तो साधारण प्रयास उसे नष्ट नहीं कर पाते। उसे नष्ट करने के लिए प्रचंड संकल्प और संगठित मानसिक ऊर्जा (माँ दुर्गा) की आवश्यकता होती है। ४. इस प्रसंग का व्यावहारिक संदेश यह प्रसंग सिखाता है कि स्त्री केवल ममता की मूर्ति ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए सृष्टि की सबसे बड़ी संहारक शक्ति (शक्ति स्वरूप) भी बन सकती है। इसके साथ ही, यह संगठन और सामूहिक शक्ति (Teamwork) का सबसे बड़ा दार्शनिक उदाहरण है।
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sn vyas
713 views 1 months ago
#🔱महिषासुर मर्दिनी🔱 #मां महिषासुर मर्दिनी👅🪔 *जटाजूटसमायुक्तामर्द्धेन्दुकृतशेखराम् ।* *लोचनत्रयसंयुक्तां पुर्णेन्दुसदृशाननाम् ॥* `अर्थात 👉🏻 ( ये महिषमर्दिनी कात्यायनी देवी दुर्गा ) जटाजूटसे समायुक्त हैं एवं मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हैं । ये तीन नेत्रोंसे युक्त ( निर्मल-निष्कलङ्क ) पूर्णचन्द्र-सदृश ( सुन्दर तथा सौम्य ) मुखचन्द्र वाली हैं ।` *तप्तकाञ्चनवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम् ।* *नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् ॥* `अर्थात 👉🏻 इनका वर्ण तपाये सुवर्णके समान है ; ये सुप्रतिष्ठिता औऱ सुलोचना हैं । ये नव-यौवन-सम्पन्ना तथा सर्वाभरणभूषिता हैं ।` *सुचारुदशनां तीक्ष्णां पीनोन्नतपयोधराम् ।* *त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम् ॥* `अर्थात 👉🏻 ये ( देवी दुर्गा ) सुन्दर औऱ मनोहारी दन्तपङ्क्ति एवं पीनोन्नत पयोधरों वाली हैं । उनका शरीरसंस्थान ललित-त्रिभङ्गसे युक्त है ; ये महिषासुरमर्दिनी हैं ।` *मृणालायतसंस्पर्शदशबाहुसमन्विताम् ।* *त्रिशूलं दक्षिणे देयं खड्गं चक्रक्रमादधः ॥* *तीक्ष्णबाणं तथा शक्तिं बाहुसङ्घेषु सङ्गताम् ।* *खेटकं पूर्णचापं च पाशं चाङ्कुशमूर्धतः ॥* *घण्टां च परशुं चापि वामेऽधः प्रतियोजयेत् ।* *अधस्तान्महिषं तद्वद्विशिरस्कं प्रदर्शयेत् ॥* `अर्थात 👉🏻 वे कमलनालके सदृश सुकोमलस्पर्शवाली दश दीर्घभुजाओं वाली हैं । इन्होंने अपनी दक्षिण पाँच भुजाओंमें ( सबसे उर्ध्वबाहुमें ) त्रिशूल , उसके नीचे क्रमशः खड्ग , चक्र , तीक्ष्णबाण तथा शक्ति धारणकर रखा है । बायीं ओर ऊपरसे नीचे क्रमशः खेटक ( ढाल ) , तना हुआ धनुष , नागपाश , अङ्कुश , घण्टा औऱ परशु भी धारण किया है । उन श्रीभगवतीके नीचे शिर-विहीन महिषको दिखाना चाहिए ।` *शिरश्छेदोद्भवं तद्वद्दानवं खड्गपाणिनम् ।* *हृदि शूलेन निर्भिन्नं निर्यदन्त्रविभूषितम् ॥* *रक्तरक्तीकृताङ्गं च रक्तविस्फुरितेक्षणम् ।* *वेष्टितं नागपाशेन भ्रुकुटीकुटिलाननम् ॥* *सपाशवामहस्तेन धृतकेशं च दुर्गया ।* *वमद्रुधिरवक्त्रं च देव्याः सिंहं प्रदर्शयेत् ॥* *देव्यास्तु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम् ।* *किञ्चिदूर्ध्वं तथा वाममङ्गुष्ठं महिषोपरि ॥* `अर्थात 👉🏻 महिषके शिर कटनेपर उसके कबन्धसे उत्पन्नकी भाँती खड्गपाणि दानव ( महिषासुर ) है । उसका हृदय देवीके शूलसे विद्ध है ,एवं वह ( सिर-कटे महिषकी ) बाहर आती हुई आँतोंसे भूषित है । महिषके रक्तसे उसका ( कबन्धसे निकले दानवराज महिषासुरका ) शरीर लाल हो गया है , तथा उसके नेत्र भी आरक्त हैं । श्रीभगवतीके नागपाशद्वारा वह आबद्ध है औऱ उसके भवें व मुख कुटिल हैं । श्रीभगवती पराशक्ति श्रीदुर्गाकेद्वारा अपने नागपाशयुक्त वामहस्तसे जिसके केश पकड़े गये हों ; जो अपने मुखसे खून उगल रहा हो , ऐसा महिषासुर एवं देवीका प्रिय वाहन सिंह भी दिखाना चाहिए । श्रीदुर्गादेवीका दक्षिणपाद सिंहपर सुस्थित है , तथा कुछ उठा हुआ उनका वाम ( चरणका ) अङ्गुष्ठ महिषासुरके ऊपर है ।` *उग्रचण्डा प्रचण्डा च चण्डोग्रा चण्डनायिका ।* *चण्डा चण्डवती चैव चामुण्डा चण्डिका तथा ॥* *आभिः शक्तिभिरष्टाभिः सततं परिवेष्टिताम् ।* *चिन्तयेत् सततं देवीं धर्मकामार्थमोक्षदाम् ॥* [ `श्रीश्रीकालिकापुराण , ५९.१२-२३` ] `अर्थात 👉🏻 वे देवी उग्रचण्डा , प्रचण्डा , चण्डोग्रा , चण्डनायिका , चण्डा , चण्डवती , चामुण्डा ( चण्डरूपा ) तथा चण्डिका – इन अष्टमहाशक्तियोंसे ( अष्टमहादेवियोंसे ) परिवेष्टिता हैं । ऐसी श्रीभगवती देवीदुर्गाका ध्यान करना चाहिए जो धर्म , अर्थ , काम औऱ मोक्ष प्रदान करने वाली हैं ।` `🎯 ध्यान का फल –` *"""चिन्तयेत् सततं देवीं धर्मकामार्थमोक्षदाम्"""* `👉🏻 जो इस रूप का ध्यान करता है , माँ उसे ☆धर्म , ☆अर्थ , ☆काम ,एवं ☆मोक्ष चारों देती हैं ।` `श्रीमात्रे नमः🚩` `श्रीकाल्यै नमः🚩` `श्रीतारायै नमः🚩` `श्रीत्रिपुरायै नमः🚩` `श्रीभुवनेश्वर्यै नमः🚩` `श्रीअम्बिकायै नमः🚩` `श्रीदुर्गापरमेश्वर्यै नमः🚩` `नमश्चण्डिकायै🚩` `श्रीदक्षिणामूर्तये नमः🚩` `शिव शिव शिव शिव शिव🚩` `हर हर शङ्कर🚩` `जय जय शङ्कर🚩` `🌄🌄 प्रभात वन्दन 🌄🌄©®`
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