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sn vyas
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🌺 गंगा में डुबकी नहीं, गंगा में भरोसा चाहिए 🌺 (श्रद्धा और शुद्धता की एक अद्भुत कथा) हरिद्वार की वह सुबह कुछ अलग थी। माँ गंगा अपनी अविरल धारा में बह रही थीं—जैसे साक्षात करुणा प्रवाहित हो रही हो। घाटों पर भक्तों की भीड़ थी। कोई मंत्र जप रहा था, कोई जयकारे लगा रहा था—“हर हर गंगे… हर हर महादेव।” जल में उतरते, डुबकी लगाते और बाहर निकलते शरीर तो भीग रहे थे, पर मन… मन का क्या? इसी भीड़ में साधारण मानव रूप धारण किए स्वयं महादेव और माता पार्वती विचरण कर रहे थे। पार्वती जी की दृष्टि हर स्नानार्थी पर थी—पर वे केवल देह नहीं देख रहीं थीं, वे चित्त पढ़ रही थीं। कुछ देर बाद उन्होंने चिंतित स्वर में कहा, “नाथ! इतने लोग स्नान कर रहे हैं, फिर भी इनके भीतर का मैल क्यों जस का तस है? काम, क्रोध और लोभ का भार इनके मुख पर क्यों झलक रहा है? क्या गंगा की पवित्रता अब पहले जैसी नहीं रही?” शिवजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “उमा, गंगा आज भी उतनी ही पवित्र हैं। दोष जल में नहीं, भावना में है। जिसने मन से स्नान नहीं किया, उसने गंगा को केवल छुआ है—पाया नहीं।” पार्वती जी को आश्चर्य हुआ, “पर ये तो अभी-अभी जल से निकले हैं!” महादेव गंभीर हुए, “शरीर को भिगोना स्नान नहीं होता, प्रिये। आओ, तुम्हें इसे प्रत्यक्ष दिखाता हूँ।” 🌧️ अगले ही दिन आकाश घिर आया। वर्षा ने हरिद्वार की गलियों को कीचड़ से भर दिया। एक चौराहे पर गहरा गड्ढा बन गया—और वहीं एक अति वृद्ध, दुर्बल व्यक्ति फिसलकर गिर पड़ा। वह और कोई नहीं, स्वयं शिव थे—लीला रचते हुए। पास ही एक व्याकुल स्त्री (माता पार्वती) बैठी राहगीरों से विनती करने लगीं, “कोई मेरे पति को बाहर निकाल दो… वे असहाय हैं।” 👉 पर साथ ही एक शर्त रख दी— “ध्यान रहे, मेरे पति पूर्ण निष्पाप हैं। उन्हें वही छू सकता है जो स्वयं पापरहित हो और जिसने सच्चे मन से गंगा स्नान किया हो। पापी का स्पर्श होते ही वह भस्म हो जाएगा।” गंगा से लौटते लोग रुकते, सुनते—और ठिठक जाते। कोई अपने झूठ याद करता, कोई किसी को दिया हुआ दुख। कोई डरकर पीछे हटता, कोई बहाना बनाकर निकल जाता। दिन बीतता गया, पर हाथ बढ़ाने का साहस किसी में न था। शिवजी ने कीचड़ से ही मुस्कराकर कहा, “उमा, देख रही हो? गंगा स्नान बहुतों ने किया, पर विश्वास किसी का पूरा नहीं कि उनके पाप धुल गए हैं।” संध्या के समय एक युवक आया। हाथ में लोटा, मुख पर आनंद, होंठों पर गान— “हर हर गंगे!” पार्वती जी ने उसे पुकारा और शर्त सुनाई। युवक शर्त सुनकर हँस पड़ा। उसने सहज भाव से कहा, “माता, मैं अभी गंगा माँ की गोद से उठा हूँ। यदि गंगा स्नान के बाद भी मैं पापी हूँ, तो फिर मुझे कौन धोएगा? मुझे न अपने पापों का डर है, न भस्म होने का। क्योंकि मैंने गंगा पर पूरा भरोसा किया है।” इतना कहकर वह निःसंकोच गड्ढे में उतरा और वृद्ध को सहारा देकर बाहर ले आया। ✨ क्षण भर में दृश्य बदल गया। वृद्ध महादेव बन गए, साधारण स्त्री जगदंबा। दिव्य तेज से आकाश प्रकाशित हो उठा। शिवजी ने पार्वती से कहा, “उमा! आज इस युवक ने ही सच्चा गंगा स्नान किया है। क्योंकि उसने जल पर नहीं—श्रद्धा पर विश्वास किया।” 🔱 संदेश 🔱 यह कथा केवल उस युवक की नहीं, हम सबकी है। हम कर्मकांड में उलझकर भाव भूल जाते हैं। याद रखें: ✅ पवित्रता जल से नहीं, विश्वास से आती है। ✅ तीर्थ देह नहीं, मन चाहता है। ✅ ईश्वर वहीं प्रकट होते हैं, जहाँ संदेह नहीं—श्रद्धा होती है। हर हर गंगे, हर हर महादेव! 🙏🌸 🍀आध्यात्मिक ज्ञान 🍀 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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