ಮಹಾಭಾರತ
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sn vyas
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#महाभारत श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकाशीतितमोऽध्यायः सखियों सहित देवयानी और शर्मिष्ठा का वन-विहार, राजा ययाति का आगमन, देवयानी की उनके साथ बातचीत तथा विवाह...(दिन 260) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ देवयान्युवाच कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् । दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ।। २४ ।। देवयानीने कहा-पुरुषप्रवर ! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ।। २४ ।। ययातिरुवाच एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते । हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ।। २५ ।। दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम । अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ।। २६ ।। ययाति बोले- भद्रे ! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु ! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा ।। २५-२६ ।। देवयान्युवाच दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन् वृतो मया । अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ।। २७ ।। (तिष्ठ राजन् मुहूर्त तु प्रेषयिष्याम्यहं पितुः । देवयानीने कहा- राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे। अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। राजन् ! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ ।। २७ ।। धात्रिके शीघ्रं ब्रह्मकल्पमिहानय ।। गच्छ त्वं स्वयंवरे वृतं शीघ्रं निवेदय च नाहुषम् ।।) धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुषनन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है। वैशम्पायन उवाच त्वरितं देवयान्याथ संदिष्टं पितुरात्मनः । सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ।। २८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार देवयानीने तुरंत धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं ।। २८ ।। श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः । दृष्ट्वैव चागतं शुक्रं ययातिः पृथिवीपतिः। ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ।। २९ ।। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये ।। २९ ।। देवयान्युवाच राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् । नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ।। ३० ।। देवयानी बोली-तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आपको नमस्कार है। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ।। ३० ।। शुक्र उवाच वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया । गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ।। ३१ ।। शुक्राचार्यने कहा-वीर नहुषनन्दन ! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है; अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो ।। ३१ ।। ययातिरुवाच अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव । वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ।। ३२ ।। ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन् ! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ।। ३२ ।। शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम् । अस्मिन् विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते ।। ३३ ।। शुक्राचार्यने कहा- राजन्! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँग लो। इस विवाहको लेकर तुम्हारे मनमें ग्लानि नहीं होनी चाहिये। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ ।। ३३ ।। वहस्व भार्या धर्मेण देवयानीं सुमध्यमाम् । अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ।। ३४ ।। तुम सुन्दरी देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो ।। ३४ ।। इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । सम्पूज्या सततं राजन् मा चैनां शयने ह्वयेः ।। ३५ ।। महाराज ! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न बुलाना ।। ३५ ।। (रहस्येनां समाहूय न वदेर्न च संस्पृशेः । वहस्व भार्यां भद्रं ते यथाकाममवाप्स्यसि ।।) तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम् । शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम् ।। ३६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधिसे मंगलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया ।। ३६ ।। लब्ध्वा शुक्रान्महद् वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् । द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह ।। ३७ ।। सम्पूजितश्च शुक्रेण दैत्यैश्च नृपसत्तमः । जगाम स्वपुरं हृष्टोऽनुज्ञातोऽथ महात्मना ।। ३८ ।। शुक्राचार्यसे देवयानी-जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये ।। ३७-३८ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत ययात्युपाख्यानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-2️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकाशीतितमोऽध्यायः सखियों सहित देवयानी और शर्मिष्ठा का वन-विहार, राजा ययाति का आगमन, देवयानी की उनके साथ बातचीत तथा विवाह...(दिन 259) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ राजवद् रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च । को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ।। १३ ।। आपके रूप और वेष राजाके समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी (विशुद्ध संस्कृत भाषा) बोल रहे हैं। मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ।। १३ ।। ययातिरुवाच ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः । राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ।। १४ ।। ययातिने कहा- मैंने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ।। १४ ।। देवयान्युवाच केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागतः । जिघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया ।। १५ ।। देवयानीने पूछा-महाराज ! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं? ।। १५ ।। ययातिरुवाच मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागतः । बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि तदनुज्ञातुमर्हसि ।। १६ ।। ययातिने कहा-भद्रे ! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ। अतः अब मुझे आज्ञा दीजिये ।। १६ ।। देवयान्युवाच द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह । त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव ।। १७ ।। देवयानीने कहा- राजन्! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे सखा और पति हो जायें ।। १७ ।। ययातिरुवाच विद्धयौशनसि भद्रं ते न त्वामर्दोऽस्मि भाविनि । अविवाह्या हि राजानो देवयानि पितुस्तव ।। १८ ।। ययाति बोले- शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो। भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं ।। १८ ।। देवयान्युवाच संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम् । ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाङ्ग वहस्व माम् ।। १९ ।। देवयानीने कहा- नहुषनन्दन ! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं। अतः मुझसे विवाह कीजिये ।। १९ ।। ययातिरुवाच एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वराङ्गने । पृथग्धर्माः पृथक्छौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः ।। २० ।। ययाति बोले-वरांगने ! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है; परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सब वर्णोंमें श्रेष्ठ हैं ।। २० ।। देवयान्युवाच पाणिधर्मो नाहूषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा । तं मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ।। २१ ।। देवयानीने कहा- नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपहीने मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपहीका मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ ।। २१ ।। कथं नु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत् । गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यृषिणा त्वया ।। २२ ।। मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है ।। २२ ।। ययातिरुवाच क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् । दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता ।। २३ ।। ययाति बोले- देवि ! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ।। २३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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