🙏ভাইফোঁটার পৌরাণিক কাহিনী🪔
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sn vyas
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #पौराणिक कथा 🌸 जालंधर–वृंदा की गाथा: जहाँ बल हार गया और भक्ति अमर हो गई 🌸 पुराणों के पन्नों में अंकित यह कथा केवल युद्ध या छल की नहीं, बल्कि उस भक्ति की है जिसने स्वयं भगवान को भी नियमों में बाँध दिया। कहा जाता है कि प्राचीन युग में एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ—नाम था जालंधर। कुछ मान्यताओं में वह भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से उत्पन्न हुआ, तो कुछ में समुद्र की अतल गहराइयों से। शिवांश से जन्मा होने के कारण उसमें असाधारण शक्ति और अदम्य पराक्रम था। जालंधर का विवाह हुआ वृंदा से—एक ऐसी नारी, जो असुर कुल में जन्म लेकर भी भक्ति की पराकाष्ठा थी। वह भगवान विष्णु की अनन्य उपासिका और पतिव्रता धर्म की जीवंत प्रतिमा थी। उसका तप, उसका विश्वास—ही जालंधर का वास्तविक कवच था। समय के साथ जालंधर में अपनी शक्ति का अहंकार भर गया। उसने देवलोक को ललकारा। इंद्र भयभीत हो उठे, देवता विचलित हो गए। अंततः स्वयं भगवान शिव युद्धभूमि में उतरे। रणभेरी बजी, अस्त्र-शस्त्र टकराए, आकाश गूँज उठा—पर आश्चर्य यह कि महादेव भी जालंधर को परास्त न कर सके। हर प्रहार निष्फल हो रहा था। कारण स्पष्ट था—जालंधर की रक्षा उसकी तलवार नहीं, वृंदा का संकल्प कर रहा था। जब-जब जालंधर युद्ध में उतरता, वृंदा पूजा में बैठ जाती। जब तक उसका ध्यान अखंड रहता, कोई शक्ति जालंधर को छू नहीं सकती थी। देवता विवश होकर भगवान विष्णु के पास पहुँचे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा का प्रश्न था। विष्णु धर्मसंकट में पड़ गए—एक ओर सृष्टि, दूसरी ओर भक्त का अटूट विश्वास। अंततः धर्म की मर्यादा ने निर्णय कराया। युद्ध के निर्णायक क्षण में विष्णु जी ने माया का आश्रय लिया। उन्होंने जालंधर का ही रूप धारण किया और वृंदा के महल में प्रवेश किया। तपस्या में लीन वृंदा ने जब अपने स्वामी को विजय भाव में देखा, तो हर्ष से उठ खड़ी हुई। उसने पूजा रोक दी और चरणों में झुक गई। बस—यही वह क्षण था, जब सतीत्व का वह अदृश्य कवच टूट गया। उसी पल रणभूमि में जालंधर की शक्ति क्षीण हुई और भगवान शिव के त्रिशूल ने उसका अंत कर दिया। महल में वृंदा जब अभी भी सेवा में थी, तभी आँगन में जालंधर का कटा मस्तक आ गिरा। सत्य उसके सामने था। उसने सामने खड़े व्यक्ति से पूछा— “यदि मेरे स्वामी का अंत हो चुका है, तो तुम कौन हो?” विष्णु जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। मौन, लज्जित, नतमस्तक। वृंदा सब समझ चुकी थी। जिस आराध्य पर उसने सर्वस्व अर्पित किया, उसी ने उसके जीवन का आधार छीन लिया था। वेदना और रोष में वृंदा ने कहा— “हे नारायण! मेरी भक्ति का यह मूल्य? छल का सहारा लेकर तुमने मेरा सुहाग उजाड़ दिया। मैं तुम्हें श्राप देती हूँ—तुम पत्थर बन जाओ।” भगवान विष्णु ने बिना विरोध श्राप स्वीकार किया और शालिग्राम रूप में परिवर्तित हो गए। तीनों लोक काँप उठे। देवताओं और लक्ष्मी जी की प्रार्थना पर वृंदा का क्रोध शांत हुआ। उसने विष्णु जी को मुक्त तो कर दिया, पर स्वयं अग्नि में प्रवेश कर गई। जहाँ वृंदा की देह भस्म हुई, वहाँ से एक दिव्य पौधा प्रकट हुआ। विष्णु जी ने उसे नमन कर कहा— “तुम्हारे त्याग का ऋण मैं कभी नहीं चुका सकता। यह पौधा तुलसी कहलाएगा। तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय रहोगी।” उन्होंने वरदान दिया कि बिना तुलसी के वे कोई भोग स्वीकार नहीं करेंगे और कार्तिक मास में हर वर्ष तुलसी–शालिग्राम विवाह होगा। इसी कारण आज भी तुलसी हर सनातन घर के आँगन की शान है। वह केवल पौधा नहीं—वृंदा का त्याग, उसकी भक्ति और उसकी विजय है। यह कथा हमें याद दिलाती है— 👉 भगवान पूज्य हैं, पर सच्चा भक्त भगवान को भी बंधन में बाँध सकता है। ।। जय माँ तुलसी ।। 🌿🙏
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sn vyas
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#पौराणिक कथा 🤹राजा ययाति-पुत्र से मांग ली उसकी जवानी🤹 महाभारत में यह घटना राजा ययाति के जीवन से संबंधित है। जिन्हें शुक्राचार्य ने एक ऐसा श्राप दिया जिसकी वजह से उन्होंने अपनी जवानी ही खो दी थी। 🧘असुर गुरु शुक्राचार्य मृत संजीवनी, ऐसी दवा जो मृत इंसान को भी जीवित कर सकती है, के रहस्य को जानते थे, इसलिए वृक्परवा उनका बहुत सम्मान करते थे। शुक्राचार्य की एकमात्र संतान देवयानी थी। वह इतनी जिद्दी और घमंडी हो गई थी कि वह किसी को अपने सामने कुछ नहीं समझती थी। एक दिन राजा वृशपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा, शुक्राचार्य के पास उनकी पुत्री को स्नान के लिए झील में ले जाने की अनुमति मांगने आई। शुक्राचार्य ने शर्मिष्ठा की बात मानकर अपनी पुत्री देवयानी को झील पर स्नान करने भेज दिया। सभी कन्याएं झील में नहा रही थीं कि अचानक बहुत बड़ा तूफान आया जिसकी वजह से सभी के कपड़े इधर-उधर फैल गए और गलती से शर्मिष्ठा ने देवयानी के कपड़े पहन लिए। शर्मिष्ठा को अपने वस्त्रों में देखकर देवयानी आगबबूला हो उठी और शर्मिष्ठा को भला-बुरा कहने लगी। दोनों के बीच कहासुनी बढ़ती गई और गुस्से में आकर शर्मिष्ठा ने देवयानी को एक सूखे कुएं में धक्का दे दिया। इसी दौरान पड़ोस के राजा ययाति अपने घोड़े पर वहां से गुजरे और देवयानी की आवाज सुनकर रुक गए। उन्होंने देवयानी का हाथ पकड़ कर कुएं से बाहर निकाला। हाथ पकड़ लेने की वजह से देवयानी ने राजा ययाति पर स्वयं के साथ विवाह करने का दबाव डाला। राजा ययाति ने यह कहकर विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि वह एक क्षत्रिय है और किसी ब्राह्मण युवती से विवाह नहीं कर सकता। राजा ययाति वहां से चले गए और उनके जाने के बाद देवयानी घर ना जाकर पेड़ के किनारे बैठी रही। जब काफी समय तक देवयानी अपने घर नहीं पहुंची तब शुक्राचार्य उसकी तलाश में निकल पड़े। जब वह उस कुएं के किनारे पहुंचे तब अपनी पुत्री को वहां बैठे देख वह बेहद आश्चर्यचकित रह गए। अपनी गलती छुपाते हुए देवयानी ने अपने साथ हुई घटना बताई शुक्राचार्य ने यह बात राजा वृशपर्व को बताई और उन्हें कहा कि अगर शर्मिष्ठा उनकी पुत्री से माफी नहीं मांगेगी तो वह इस नगर को छोड़कर चले जाएंगे।🧘 🧑‍🍼राजा वृशपर्व किसी भी रूप में उन्हें जाने नहीं दे सकते थे इसलिए अपने पिता के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी से माफी मांग ली। देवयानी का मन इतने से नहीं भरा और उसने शर्मिष्ठा से कहा उसे आजीवन उसकी दासी बनकर रहना होगा। शर्मिष्ठा जानती थी कि देवयानी हर समय उसका अपमान करेगी लेकिन फिर भी उसने यह शर्त स्वीकार ली। एक दिन राजा ययाति दोबारा उसी मार्ग से गुजरे और दोबारा उनकी मुलाकात देवयानी से हुई। देवयानी ने शर्मिष्ठा को अपनी नौकरानी के रूप में राजा से मिलवाया और कहा कि ययाति को उससे विवाह कर लेना चाहिए। राजा ने देवयानी की बात मानकर उससे विवाह कर लिया। इन दोनों के दो पुत्र हुए। 🧑‍🍼 👨‍❤️‍👨लेकिन एक दिन अचानक राजा ययाति और शर्मिष्ठा का आमना-सामना हुआ तब शर्मिष्ठा ने उन्हें देवयानी की हकीकत बताई। ययाति को देवयानी पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने शर्मिष्ठा के हालातों को समझते हुए उसे अपनी दूसरी पत्नी स्वीकार किया। राजा ययाति और शर्मिष्ठा के विवाह को काफी समय हो गया और तीन पुत्रों की उत्पत्ति के बाद शर्मिष्ठा और ययाति के विवाह की हकीकत देवयानी को पता चली। 👩‍❤️‍👩 🤱देवयानी अत्याधिक क्रोधित अवस्था में अपने पिता शुक्राचार्य के पास पहुंची और उन्हें सारा हाल बताया। शुक्राचार्य ने क्रोधावेग में ययाति को श्राप देकर उसकी जवानी छीन ली। ययाति उनके सामने गिड़गिड़ाए और माफी मांगी। उनकी हालत देखकर शुक्राचार्य और देवयानी को उन पर तरस आ गया। शुक्राचार्य ने कहा कि ‘मैं दिया गया श्राप वापस तो नहीं ले सकता लेकिन अगर तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हें अपनी जवानी देता है तो तुम जब तक चाहो तब तक जवान रह सकते हो’।🤱 🧍वृद्ध ययाति अपने महल पहुंचा और सबसे पहले अपने बड़े पुत्र से कहा कि वह उसे अपनी जवानी दे दे। उसके सभी बेटों ने उसका आग्रह टाल दिया लेकिन सबसे छोटा पुत्र पुरु इस बात के लिए राजी हो गया। पुरु ने अपने पिता ययाति को अपनी जवानी दे दी और स्वयं वृद्ध हो गया। ययाति ने अपनी जवानी का भरपूर आनंद उठाया लेकिन एक दिन उसे अपनी गलती और पुत्र के प्रति किए गए अन्याय का अहसास हुआ। 🧍 🤹ययाति आत्मग्लानि में अपने पुत्र के पास पहुंचा और उसे कहा कि वह अब और ज्यादा जवान नहीं रहना चाहता। ययाति ने पुरु को उसकी जवानी वापस की और उसे राजपाठ सौंपते हुए कहा वह संयमित और सही तरीके से शासन की बागडोर संभाले। अपनी पारिवारिक और राजकीय जिम्मेदारियों से मुक्त होकर ब्रह्म की उपासना करने के लिए सम्राट ययाति जंगल की ओर प्रस्थान कर गया और अपना संपूर्ण जीवन वहीं बिताया।🤹 धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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sn vyas
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#पौराणिक कथा मंथरा अपने पिछले जन्म में कौन थी? आदरणीय सज्जनों । जैसा कि आप सब जानते हैं कि रामायण में मंथरा, महाराज दशरथ की सबसे छोटी पत्नी कैकेयी की सबसे निकटतम दासी थी जो कैकेयी के विवाह के साथ ही अयोध्या आ गई थी । मंथरा रानी कैकेयी से अपनी पुत्री के समान व्यवहार करती थी और रानी कैकेयी भी मंथरा को अपनी माता के समान समझती थी । अयोध्या वासियों को जब पता चला कि उनके प्राणप्रिय राजकुमार राम का राज्याभिषेक होने की बजाय उन्हें चौदह वर्ष के वनवास के लिए भेजा जा रहा है और इन सबके पीछे कैकेयी की दासी मंथरा का हाँथ है तो वे सब मंथरा पर कुपित हो गए और उन कुपित अयोध्या वासियों ने श्री लोमश जी से पूछा "प्रभु ! इस मंथरा का ही राम से विरोध क्यों है ? जबकि पशु-पक्षी, जड़, चेतन, वृक्ष आदि तक हमारे राम के प्रेमी हैं"। यह मंथरा जन्मांतर में प्रहलाद की पौत्री तथा विरोचन की पुत्री थी। उस जन्म में भी इसका नाम मंथरा ही था। इसका छोटा भाई बलि जब माता के गर्भ में ही था, तब देवताओं ने छलपूर्वक ब्राह्मण का रूप धारण कर विरोचन से अपनी सारी आयु ब्राह्मणों को दान देने की प्रार्थना की। अतः दानी विरोचन ने अपना शरीर त्याग दिया। जिसके बाद दैत्य निराश्रित हो गए। वह मंथरा की शरण में गए। मंथरा ने उनको रक्षा का आश्वासन दिया। जिससे उत्साहित होकर शम्बर, मय, बाण आदि दैत्य युद्ध के लिए निकले, पर वे देवताओं से हार गए। तब मंथरा देवताओं पर भयंकर क्रोधित हुई और क्रुद्ध होकर उसने नागपाश के द्वारा समस्त देवताओं को बांध लिया। नारद जी ने देवताओं के ऊपर आयी इस विपत्ति को वैकुंठ स्थित भगवान नारायण के समस्त निवेदित की। भगवान विष्णु ने इंद्र को अमोघ शक्ति दी जिससे इंद्र ने ना केवल नागपाश के बंधन को काटा बल्कि उसी शक्ति से इंद्र ने मंथरा को मार कर बेहोश कर दिया। उस दिव्य शक्ति के प्रभाव से मंथरा का शरीर अपंग हो गया, वह कुब्जा-सी हो गई। दैत्य स्त्रियों ने भी पीछे से उसका बड़ा उपहास किया। मृत्यु के बाद अगले जन्म में वह उसी रूप में कश्मीर क्षेत्र में उत्पन्न हुई और भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने के लिए कैकई की दासी बन कर उसने रामराज्य की स्थापना में विघ्न डाला जिसकी वजह से वह सारे संसार में अपयश की भागी हुई। उसका ही भगवान ने अपयश मिलने के कारण, कृष्णावतार के समय उद्धार किया। वैसे कल्पभेद से अलग-अलग पुराणों में, कुब्जा के विषय में, अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। 🙏 हे महादेव ॥🙏
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