सुदूर तक फैली अरावली की पर्वतमाला
रेगिस्तान के जहाज सी ,
ओट से झांकता सूरज,
लालिमा बिखेरता
लगे चटक रंग का अबीर उड़ता गोधूली में,
ढलती सांझ श्यामली सी
आसमान और पहाड़ियां का होता मिलन सा,
आसमान में उभरी आकृतियां लगती पहाड़ियों सी,
लगता पहाड़ियों पर एक और पहाड़ी है,
सुदूर तक फैली अरावली की पर्वत माला,
मध्य में बसा अजमेर
सांझ ढलते ही बत्ती जले,,
पर्वतमाला पर जुगनू से टिमटिमाए,
अमासागर झील दर्पण सी ,
निहारे अपना रूप,
अडिग पर्वतमालाओं का अस्तित्व है खतरे में,
पर्वतों को व्यर्थ समझ,
काट रहा है पर्वतमालाओ को
धरती की आद्रता नष्ट कर
बंजर बना रहे,
नष्ट हो रहे खनिज लवण,
जंगली जानवरों की कंदराएं लुप्त हो रही ,
जलवायु परिवर्तन हो रहा है,
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