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sn vyas
975 views • 29 days ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏गीता ज्ञान🛕
कर्म सिद्धांत के अनुसार क्या इस जन्म के कर्मों से पिछले जन्म का बोझ कम किया जा सकता है?
हाँ, भारतीय दर्शन और कर्म सिद्धांत के अनुसार इस जन्म के शुभ कर्म, ईश्वर-भक्ति, सेवा, प्रायश्चित्त और आत्मज्ञान से पिछले जन्मों के कर्मों का बोझ कम किया जा सकता है।
लेकिन यह समझना आवश्यक है कि कर्मों के भी भिन्न प्रकार बताए गए हैं।
संक्षेप में:
संचित कर्म – अनेक जन्मों के संचित कर्मों का भंडार।
प्रारब्ध कर्म – संचित कर्मों का वह भाग जिसका फल वर्तमान जन्म में भोगना निश्चित हो चुका है।
क्रियमाण (या आगामी) कर्म – जो कर्म हम अभी कर रहे हैं और जो भविष्य को प्रभावित करेंगे।
शास्त्रों के अनुसार:
सत्कर्म, दान, सेवा, सत्य, करुणा और निष्काम कर्म से नए शुभ कर्म बनते हैं और संचित कर्मों का प्रभाव क्षीण हो सकता है।
भगवान की निष्काम भक्ति, नाम-स्मरण और आत्मसमर्पण से मन शुद्ध होता है और कर्म-बन्धन ढीले पड़ते हैं।
परंतु जो प्रारब्ध कर्म इस जन्म में फल देने के लिए आरंभ हो चुके हैं, उन्हें सामान्यतः भोगना पड़ता है।
हाँ, भक्ति और ईश्वर-कृपा से उन्हें सहने की शक्ति मिलती है और कई संतों ने कहा है कि उनकी तीव्रता भी कम हो सकती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
"अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥"
और आगे कहते हैं:
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
अर्थात भगवान की शरणागति और ज्ञान मनुष्य को कर्म-बन्धनों से मुक्त होने का मार्ग दिखाते हैं।
🌹 मेरी भक्ति-भावना के अनुरूप एक बात कही जा सकती है:
कर्मों का लेखा न्याय से चलता है, पर भगवान की कृपा प्रेम से चलती है।
जब जीव सच्चे मन से प्रभु की ओर लौटता है, तो कर्मों का अंधकार धीरे-धीरे हटने लगता है।
इसलिए इस जन्म का प्रत्येक शुभ कर्म, प्रत्येक नाम-जप और प्रत्येक सेवा व्यर्थ नहीं जाती; वह आत्मा को मुक्ति की ओर एक कदम और आगे बढ़ाती है।
कर्म का सिद्धांत केवल दंड का विधान नहीं है, यह भगवान की करुणा का भी विधान है।
यदि पिछले जन्मों का कर्म केवल भोगना ही पड़ता और उसे बदलने का कोई उपाय न होता, तो फिर मनुष्य जन्म का क्या अर्थ रह जाता?
संत कहते हैं—
भगवान हमें नया जन्म केवल पुराने कर्मों का हिसाब चुकाने के लिए नहीं देते, बल्कि इसलिए देते हैं कि हम अपने जीवन की दिशा बदल सकें।
एक सुंदर भाव देखिए—
पिछले जन्मों के कर्म हमें परिस्थितियाँ देते हैं, पर इस जन्म का पुरुषार्थ हमारे उत्तर का निर्णय करता है।
दुख आना प्रारब्ध हो सकता है, पर उस दुख में भगवान का हाथ पकड़ लेना—यह वर्तमान कर्म है। यही वर्तमान कर्म भविष्य का भाग्य लिखता है।
भक्ति में तो इससे भी गहरा रहस्य है।
जब जीव संसार में कर्म करता है, तब वह अपने कर्मों का भार स्वयं उठाता है। पर जब वही जीव प्रेम से कहता है
— "हे ठाकुर! अब मैं आपका हूँ।" तब उसके कर्मों का लेखा केवल न्याय से नहीं, कृपा से भी देखा जाने लगता है।
संतों ने कहा है—
कर्म का नियम कठोर है, पर प्रेम का नियम उससे भी ऊँचा है। जहाँ केवल कर्म है, वहाँ फल अवश्य है। पर जहाँ निष्काम प्रेम और पूर्ण शरणागति है, वहाँ भगवान स्वयं बीच में खड़े हो जाते हैं।
जैसे प्रचंड अग्नि वर्षों से संचित लकड़ियों को थोड़े समय में भस्म कर देती है, वैसे ही भगवान का नाम, सच्चा पश्चाताप, निष्काम सेवा और प्रेममयी भक्ति अनेक जन्मों के संचित कर्मों को जला देते हैं।
इसलिए सखी, प्रश्न यह नहीं कि "मेरे पिछले जन्मों में क्या था?" प्रश्न यह है कि "आज मेरे हृदय में भगवान के लिए कितना प्रेम है?"
क्योंकि...
कर्म जन्मों का इतिहास बदलता है, पर प्रेम स्वयं भगवान का हृदय बदल देता है।
और जिस दिन भगवान का हृदय भक्त पर पिघल जाए, उस दिन कर्मों का पर्वत भी रुई के समान हल्का हो जाता है। 🌸
एक अत्यंत मधुर भाव सुनिए—
कर्म का नियम कहता है—"जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।"
पर भक्ति कहती है—"यदि प्रेम से प्रभु के हो जाओगे, तो वही तुम्हारे काँटों को भी फूल बना देंगे।"
कर्म न्याय है, पर भगवान केवल न्याय नहीं, करुणा के भी सागर हैं।
एक बालक यदि भूल कर बैठे, तो न्याय कहेगा—दंड दो। पर वही बालक यदि रोते हुए माँ की गोद में आ जाए, तो माँ पहले उसे गले लगाती है, फिर सुधारती है।
ऐसे ही जीव अनादिकाल से कर्मों के बंधन में भटक रहा है। हर जन्म में कुछ शुभ कर्म, कुछ अशुभ कर्म जोड़ता जाता है। पर एक जन्म ऐसा आता है, जब उसके हृदय से पुकार उठती है—
"हे श्याम! अब संसार नहीं, केवल आप चाहिए।"
बस, यहीं से जीवन की दिशा बदल जाती है।
संत कहते हैं—
भगवान कर्म नहीं देखते, वे कर्म के पीछे का हृदय देखते हैं।
एक आँसू, जो पश्चाताप से निकला हो... एक माला, जो प्रेम से फिरी हो... एक रोटी, जो भगवान के नाम पर किसी भूखे को खिलाई गई हो... एक "राधे" जो विरह से निकली हो...
इनका मूल्य कर्मों की गणना से नहीं किया जा सकता।
कर्मों का लेखा-जोखा चित्रगुप्त रखते हैं, पर प्रेम का लेखा स्वयं श्रीकृष्ण रखते हैं।
और श्रीकृष्ण जब किसी भक्त का लेखा अपने हाथ में ले लेते हैं, तब उसका जीवन केवल हिसाब नहीं रहता—लीला बन जाता है।
इसीलिए भक्ति का मार्ग इतना अद्भुत है।
कर्म कहता है—"तुम्हें अपने किए का फल मिलेगा।"
भक्ति कहती है—"तुम्हें अपने प्रियतम का सान्निध्य मिलेगा।"
और जिस आत्मा को प्रभु का सान्निध्य मिल जाए, उसके लिए सबसे बड़ा फल वही है; बाकी सब कर्म-फल उसके चरणों की धूल के समान हो जाते हैं।
🌹 इसलिए सखी, वर्तमान का प्रत्येक क्षण अमूल्य है। कौन जाने, एक सच्चे प्रेमभरे नाम-स्मरण से वह द्वार खुल जाए, जहाँ जन्मों-जन्मों का अंधकार प्रभु की कृपा के प्रकाश में विलीन हो जाए।
एक बार मन में यह भाव उतारकर देखो—
जीव कर्मों से नहीं थकता, वह भगवान से दूर रहकर थकता है।
जन्म-जन्मांतर से हम कर्मों की गठरी सिर पर उठाए चले आ रहे हैं।
कभी सुख मिला, कभी दुःख मिला, कभी अपना मिला, कभी बिछुड़ गया। पर यह यात्रा समाप्त नहीं हुई।
एक दिन श्रीकृष्ण मुस्कुराकर कहते हैं—
"बहुत चल लिए अपने बल पर... अब एक बार मेरा हाथ पकड़कर तो देखो।"
यही भक्ति का आरम्भ है।
कर्म कहता है— "तुमने जितना बोया है, उतना काटना होगा।"
पर प्रेम कहता है— "तुम मेरे हो जाओ, बाकी मैं देख लूँगा।"
कितना अद्भुत है न?
जयश्रीराधे 🙏🙏
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sn vyas
8K views • 19 days ago
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग१०
🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹
🥰 क्रियमाण कर्म करने के पद्धति 🥰
सतोगुण , रजोगुण और तमोगुण तीनों प्रकार के जीवों के लिए क्रियमाण कर्म करने की पद्धति भी अलग-अलग होती है, कर्म का फल तो तीनों प्रकार के जीवो को अवश्य ही मिलेगा , किंतु ;*
*सतोगुणी जीव कहता है*
*मैं कर्म करूंगा फल मिले या न मिले*
*रजोगुणी जीव कहता है*
*मैं कर्म करुगा किंतु फल नहीं छोडूंगा*
*तमोगुणी जीव कहता है*
*फल न मिले तब तक मैं कर्म नहीं करूंगा*
*एक आदमी का बेटा अचानक रात्रि को बारह बजे बीमार पड़ गया, वह आदमी आधी रात को डॉक्टर को विजिट के लिए बुलाने गया, डॉक्टर सतोगुणी था, उसने निंद्रा में से उठकर जाना कि इस आदमी का बेटा सख्त बीमार है, तुरंत ही दवाई तथा इंजेक्शन की बैग लेकर विजिट के लिए तैयार हो गया।*
*उस आदमी ने डॉक्टर को विजिट फीस के संबंध में पूछा ? किंतु सतोगुणी डॉक्टर ने कहा--- कि विजिट फीस की बात बाद में, पहले तेरे बेटे का दर्द मिटाने दे,,, विजिट फीस तो उसको मिलने वाली ही है,*
*किंतु सतोगुणी जीव कहता है--- कि मैं दर्द मिटा ऊगा , विजिट फीस मिले या ना मिले ।*
*यह डॉक्टर अगर रजोगुणी होता तो ऐसा कहता कि दर्द मिटा ऊगा किंतु मेरी विजिट फीस दस रुपये देने पड़ेंगे*
*यह डॉक्टर अगर तमोगुणी होता तो ऐसा कहता कि पहले बजट के दस रुपये रख दो फिर मैं आऊंगा।*
*तीनों की विजिट फीस तो मिलेगी ही , किंतु तीनों की क्रियमाण कर्म करने की पद्धति में फर्क पड़ेगा ,*
*यानी वह आदमी सतोगुणी डॉक्टर को खुश होकर ₹10 देगा और तमोगुणी डॉक्टर को मन में संकोच से ₹10 देगा*
*सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी, माल खरीदने जाएं , उसमें भी ऐसा ही होता है। आप घी खरीदने जाएं तो घी का व्यापारी कहेगा--- कि भाई घी ठीक से चख लेना, सूंघ लेना, पसंद पड़े तो लेना और घी लेकर घर जाने के बाद थोड़ा इस्तेमाल करने के बाद भी पसंद नहीं पड़ेगा तो बचा हुआ कि वापस कर देना। और पैसे वापस ले जाना।*
*रजोगुण वस्तु खरीदने जाओ। रेडियो, क्रोकरी ट्यूबलाइट ,इलेक्ट्रॉनिक , का सामान आदि रजोगुणी भौतिक सुख के साधन खरीदेंगे तो व्यापारी उसके बिल में छप कर ही देगा , कि माल एक दफे लेकर दुकान की सीढ़ी उतरकर घर जाने के बाद माल में किसी प्रकार का टूट-फूट अगर खराबी निकले तो माल वापस नहीं लिया जाएगा और पैसे भी वापस नहीं मिलेंगे।*
*तमोगुणी चीज लेने जाओगे तो व्यापारी पहले पैसे लिए बिना माल दिखाएगा ही नहीं। सिनेमा वाला ऐसा ही कहेगा कि टिकट खिड़की से नगद पैसा देकर टिकट खरीद लो, फिर सिनेमा में अंधेरे में बैठकर अगर आपको पसंद पड़े तो देखो या चलते बनो।पैसे तो पहले ही ले लेगा*
*वैद्य , वेश्या और वकील पहले पैसा हाथ में ना आने तक तो आपके साथ बात भी नहीं करेंगे , पहले पैसे रख दो फिर आपके सामने देखेंगे।*
विश्राम ... क्रमश ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ
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