మహా భారతం
630 Posts • 11M views
sn vyas
881 views
#महाभारत अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा एक दिन राजमहल में झाड़ू लगा रही थीं। तभी माता द्रौपदी उनके समीप आईं। स्नेहपूर्वक उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए बोलीं— “पुत्री, यदि भविष्य में तुम पर कितनी ही घोर विपत्ति क्यों न आ जाए, तो कभी अपने किसी नाते-रिश्तेदार की शरण में मत जाना। सीधे भगवान की शरण लेना।” माता द्रौपदी के ये वचन सुनकर उत्तरा विस्मित हो उठीं। उन्होंने आदरपूर्वक पूछा— “माता, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?” द्रौपदी ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया— “पुत्री, क्योंकि यह पीड़ा मैं स्वयं भोग चुकी हूँ। जब मेरे पाँचों पति कौरवों के साथ जुए में प्रवृत्त हुए, तो अपना समस्त राज्य और वैभव हार बैठे। अंततः उन्होंने मुझे भी दाँव पर लगा दिया और वह भी हार गए। इसके पश्चात कौरवों ने भरी सभा में मेरा घोर अपमान किया। मैंने सहायता के लिए अपने पतियों को पुकारा, पर वे सभी लज्जा से सिर झुकाए बैठे रहे। मैंने पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और महाराज धृतराष्ट्र से भी बार-बार प्रार्थना की, किंतु किसी ने मेरी ओर दृष्टि उठाकर नहीं देखा। सब मौन थे—नेत्रों में आँसू, किंतु हृदय में असहायता। तब पूर्णतः निराश होकर मैंने श्रीकृष्ण को पुकारा— ‘हे प्रभु! आपके सिवा मेरा और कोई नहीं है।’ और उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकट होकर मेरी लाज की रक्षा की।” अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह उधर द्वारका में श्रीकृष्ण अत्यंत व्याकुल हो उठे थे, क्योंकि उनकी परमप्रिय भक्त संकट में थी। रुक्मिणी ने उनके विषाद का कारण पूछा। तब श्रीकृष्ण बोले— “मेरी सबसे बड़ी भक्त को भरी सभा में अपमानित किया जा रहा है।” रुक्मिणी ने कहा— “तो आप तुरंत जाकर उसकी सहायता कीजिए।” भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया— “जब तक द्रौपदी मुझे पुकारेगी नहीं, मैं वहाँ कैसे जा सकता हूँ? किंतु जिस क्षण वह मुझे स्मरण करेगी, उसी क्षण मैं उसकी रक्षा के लिए पहुँच जाऊँगा। तुम्हें स्मरण होगा—राजसूय यज्ञ के समय जब शिशुपाल का वध करते हुए मेरी उँगली कट गई थी। उस समय मेरी सभी पत्नियाँ वहाँ थीं—कोई वैद्य बुलाने दौड़ी, कोई औषधि लाने गई। परंतु उसी क्षण मेरी इस भक्त ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर मेरी उँगली पर बाँध दिया था। आज उसी ऋण को चुकाने का समय है। किंतु मैं तभी जा सकता हूँ, जब वह स्वयं मुझे पुकारे।” और जैसे ही द्रौपदी ने करुण पुकार में श्रीकृष्ण का नाम लिया— भगवान तुरंत दौड़ पड़े और उनकी मर्यादा की रक्षा की। 🙏श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी🙏 🙏हे नाथ नारायण वासुदेव।🙏
21 likes
15 shares