🙏మహాభారతం
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sn vyas
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#श्रीमहाभारतकथा-1️⃣8️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (अंशावतरणपर्व) त्रिषष्टितमोऽध्यायः राजा उपरिचर का चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रों की संक्षिप्त जन्म कथा...(दिन 182) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः । बभूव मृगयां गन्तुं सदा किल धृतव्रतः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! पहले उपरिचर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो नित्य-निरन्तर धर्ममें ही लगे रहते थे। साथ ही सदा हिंसक पशुओंके शिकारके लिये वनमें जानेका उनका नियम था ।। १ ।। स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः । इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपतिः ।। २ ।। पौरवनन्दन राजा उपरिचर वसुने इन्द्रके कहनेसे अत्यन्त रमणीय चेदिदेशका राज्य स्वीकार किया था ।। २ ।। तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्तं तपोनिधिम् । देवाः शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे ।। ३ ।। इन्द्रत्वमहों राजायं तपसेत्यनुचिन्त्य वै । तं सान्त्वेन नृपं साक्षात् तपसः संन्यवर्तयन् ।। ४ ।। एक समयकी बात है, राजा वसु अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके आश्रममें निवास करने लगे। उन्होंने बड़ा भारी तप किया, जिससे वे तपोनिधि माने जाने लगे। उस समय इन्द्र आदि देवता यह सोचकर कि यह राजा तपस्याके द्वारा इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है, उनके समीप गये। देवताओंने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें शान्तिपूर्वक समझाया और तपस्यासे निवृत्त कर दिया ।। ३-४ ।। देवा ऊचुः न संकीर्येत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते । त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत् ।। ५ ।। देवता बोले- पृथ्वीपते ! तुम्हें ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये जिससे इस भूमिपर वर्णसंकरता न फैलने पावे (तुम्हारे न रहनेसे अराजकता फैलनेका भय है, जिससे प्रजा स्वधर्ममें स्थित नहीं रह सकेगी। अतः तुम्हें तपस्या न करके इस वसुधाका संरक्षण करना चाहिये)। राजन् ! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित धर्म ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रहा है ।। ५ ।। इन्द्र उवाच लोके धर्म पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः। धर्मयुक्तस्ततो लोकान् पुण्यान् प्राप्स्यसि शाश्वतान् ।। ६ ।। इन्द्रने कहा- राजन् ! तुम इस लोकमें सदा सावधान और प्रयत्नशील रहकर धर्मका पालन करो। धर्मयुक्त रहनेपर तुम सनातन पुण्यलोकोंको प्राप्त कर सकोगे ।। ६ ।। दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः । रम्यः पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप ।। ७ ।। यद्यपि मैं स्वर्गमें रहता हूँ और तुम भूमिपर; तथापि आजसे तुम मेरे प्रिय सखा हो गये। नरेश्वर ! इस पृथ्वीपर जो सबसे सुन्दर एवं रमणीय देश हो, उसीमें तुम निवास करो ।। ७ ।। पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् । स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः ।। ८ ।। अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः । वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप ।। ९ ।। धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः । न च मिथ्याप्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।। १० ।। न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः । युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान् संधुक्षयन्ति च ।। ११ ।। सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद। न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु यद् भवेत् ।। १२ ।। इस समय चेदिदेश पशुओंके लिये हितकर, पुण्यजनक, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, स्वर्गके समान सुखद होनेके कारण रक्षणीय, सौम्य तथा भोग्य पदार्थों और भूमिसम्बन्धी उत्तम गुणोंसे युक्त है। यह देश अनेक पदार्थोंसे युक्त और धन-रत्न आदिसे सम्पन्न है। यहाँकी वसुधा वास्तवमें वसु (धन-सम्पत्ति) से भरी पूरी है। अतः तुम चेदिदेशके पालक होकर उसीमें निवास करो। यहाँके जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहाँ हास-परिहासमें भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता है। पुत्र सदा गुरुजनोंके हितमें लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बँटवारा नहीं करते। यहाँ के लोग बैलोंको भार ढोने में नहीं लगाते और दीनों एवं अनाथों का पोषण करते हैं। मानद ! चेदिदेशमें सब वर्णोंके लोग सदा अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई घटना होगी, वह सब यहाँ रहते हुए भी तुमसे छिपी न रहेगी- तुम सर्वज्ञ बने रहोगे ।। ८-१२ ।। देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् । आकाशगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते ।। १३ ।। जो देवताओंके उपभोगमें आने योग्य है, ऐसा स्फटिक मणिका बना हुआ एक दिव्य, आकाशचारी एवं विशाल विमान मैंने तुम्हें भेंट किया है। वह आकाश में तुम्हारी सेवा के लिये सदा उपस्थित रहेगा ।। १३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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sn vyas
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#महाभारत दुर्योधन में कोई अच्छा गुण नहीं था। दुर्योधन असल मे एक डरपोक व्यक्ति था। उसने भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया,पांडवों को जला कर मारने का प्रयत्न किया, जुए में धोखा करके पांडवों को वन भेज दिया,द्रौपदी जैसी विदुषी नारी पर झूठा आरोप लगाया कि उसने अंधे का पुत्र अंधा कहा इत्यादि। इन सब मौकों पर उसके पास विकल्प था कि वो ललकार कर पांडवों से युद्ध कर लेता पर उसने नही किया। लोग शकुनि को दोष देते हैं पर अंततः व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है। दुर्योधन को शुरू से पता था कि भीष्म और द्रोण पांडवों को नही मारेंगे और बिना पांडवों का वध किये उसका काम नही होगा। इसलिए उसने कर्ण को बहुत महत्व देना शुरू किया। कर्ण डींगें हांकने में निपुण था। उसने कभी कोई युद्ध नही जीता था। उसने एक दिग्विजय की थी जो हस्तिनापुर के ध्वज के तले थी, मतलब अगर कोई राजा कर्ण को हरा कर पकड़ता या मारता तो फिर भीष्म और द्रोण युद्ध के लिए आते।इनसे लड़ना कौन चाहता? इसलिए ये दिग्विजय अकेले कर्ण की नही कही जा सकती।बाकी सब जगह कर्ण भाग जाता था। खुद दुर्योधन ने कभी कोई युद्ध नही लड़ा था। इनकी शिक्षा समाप्त होने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हराने की बात की थी तब दुर्योधन ,कर्ण,दुशासन को अकेले द्रुपद ने हरा कर भगा दिया था। गन्धर्वों से युद्ध मे भी दुर्योधन बंदी हो गया था,कर्ण भाग गया था। पूरे 18 दिन के महाभारत युद्ध मे दुर्योधन की वीरता का कोई वर्णन नही है। उसने किसी बड़े योद्धा को मारा हो ये भी नही लिखा।यहां तक कि युधिस्ठिर ने भी एक बड़े वीर शल्य को मारा पर दुर्योधन से कुछ न हुआ। " सुई की नोक बराबर भूमि नही दूंगा" की डींगें मारने वाला दुर्योधन युद्ध की हार के बाद सामने से लड़ने के बजाय युद्धभूमि से भागकर छिप गया। पांडवों ने उसको ढूंढकर ललकारा तो उसने कहा कि मुझे नही लड़ना,तुम लोग राज करो 😂 दुर्योधन जैसे लोग विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर होते हैं, पूरे जीवन उसने यही किया। उसने पांडवों को उन्ही के धर्म से बांध दिया। अच्छे लोगों की तब और अब भी यही समस्या है कि" किसी ने हमारे साथ बुरा किया और अगर हमने भी उसके साथ बुरा किया तो उसमें और हममें क्या अंतर रह जायेगा"। श्री कृष्ण ने यही समझाया कि ये अंतर होना भी नही चाहिए। जब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो ये नही सोचते बैठे कि अगर मैं लंका में आग लगा दूँ तो इसमे और मुझमें क्या अंतर रह जायेगा। ऐसे ही किसी जाहिल ने किसी समय अयोध्या में मन्दिर गिरकर मस्जिद बना दी थी तो उचित समय पर फिर से मंदिर बने यही न्याय है। इसमे किसी को कोई अपराध बोध नही होना चाहिए। इसी तरह जीवन भर षड्यंत्र रचने वाले दुर्योधन की जांघ तोड़कर मारने में कुछ भी गलत नही था।
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