#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 307)
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वैशम्पायन उवाच
स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजर्षिसत्कृतः । धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा शान्तनु बड़े बुद्धिमान् थे; देवता तथा राजर्षि भी उनका सत्कार करते थे। वे धर्मात्मा नरेश सम्पूर्ण जगत्में सत्यवादीके रूपमें विख्यात थे ।। १ ।।
दमो दानं क्षमा बुद्धिर्तीधृतिस्तेज उत्तमम् । नित्यान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे ।। २ ।।
उन महाबली नरश्रेष्ठ शान्तनुमें इन्द्रियसंयम, दान, क्षमा, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज आदि सद्गुण सदा विद्यमान थे ।। २ ।।
एवं स गुणसम्पन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः । आसीद् भरतवंशस्य गोप्ता सर्वजनस्य च ।। ३ ।।
इस प्रकार उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं धर्म और अर्थके साधनमें कुशल राजा शान्तनु भरतवंशका पालन तथा सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते थे ।। ३ ।।
कम्बुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः । अन्वितः परिपूर्णार्थः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः ।। ४ ।।
उनकी ग्रीवा शंखके समान शोभा पाती थी। कंधे विशाल थे। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी थे। उनमें सभी राजोचित शुभ लक्षण पूर्ण सार्थक होकर निवास करते थे ।। ४ ।।
तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्म सततं नराः ।
धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिताः ।। ५ ।।
उन यशस्वी महाराजके धर्मपूर्ण सदाचारको देखकर सब मनुष्य सदा इसी निश्चयपर पहुँचे थे कि काम और अर्थसे धर्म ही श्रेष्ठ है ।। ५ ।।
एतान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे । न चास्य सदृशः कश्चिद् धर्मतः पार्थिवोऽभवत् ।। ६ ।।
महान् शक्तिशाली पुरुषश्रेष्ठ शान्तनुमें ये सभी सद्गुण विद्यमान थे। उनके समान धर्मपूर्वक शासन करनेवाला दूसरा कोई राजा नहीं था ।। ६ ।।
वर्तमानं हि धर्मेषु सर्वधर्मभृतां वरम् ।
तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचयन् ।। ७ ।।
वे धर्ममें सदा स्थिर रहनेवाले और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे; अतः समस्त राजाओंने मिलकर राजा शान्तनुको राजराजेश्वर (सम्राट्) के पदपर अभिषिक्त कर दिया ।। ७ ।।
वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्ननिबोधनाः।
पतिं भारत गोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः ।। ८ ।।
जनमेजय ! जब सब राजाओंने शान्तनुको अपना स्वामी तथा रक्षक बना लिया, तब किसीको शोक, भय और मानसिक संताप नहीं रहा। सब लोग सुखसे सोने और जागने लगे ।। ८ ।।
तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा ।
यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः ।। ९ ।।
इन्द्रके समान तेजस्वी और कीर्तिशाली शान्तनुके शासनमें रहकर अन्य राजालोग भी दान और यज्ञ कर्मोंमें स्वभावतः प्रवृत्त होने लगे ।। ९ ।।
शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा ।
नियमात् सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ।। १० ।।
उस समय शान्तनुप्रधान राजाओंद्वारा सुरक्षित जगत्में सभी वर्णोंके लोग नियमपूर्वक प्रत्येक बर्तावमें धर्मको ही प्रधानता देने लगे ।। १० ।।
ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन् विशः ।। ११ ।।
क्षत्रियलोग ब्राह्मणोंकी सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुरक्त रहते तथा शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुराग रखते हुए वैश्योंकी सेवामें तत्पर रहते थे ।। ११ ।।
स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने ।
वसन् सागरपर्यन्तामन्वशासद् वसुन्धराम् ।। १२ ।।
महाराज शान्तनु कुरुवंशकी रमणीय राजधानी हस्तिनापुरमें निवास करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन और पालन करते थे ।। १२ ।।
स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः ।
दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युतः ।। १३ ।।
वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी तथा सरल थे। दान, धर्म और तपस्या तीनोंके योगसे उनमें दिव्य कान्तिकी वृद्धि हो रही थी ।। १३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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