यथार्थ गीता

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Jagdish Sharma
515 views 4 days ago
।। ॐ ।। अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। (साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते-सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; किन्तु द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) अक्षयकाल मैं हूँ। काल सदैव परिवर्तनशील है; किन्तु वह समय जो अक्षय, अजर, अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। विराट् स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण-पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏
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Jagdish Sharma
587 views 8 days ago
।। ॐ ।। अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ। वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की समकालीन पुस्तक श्रीमद्भागवत में इसके रूप की चर्चा है कि इस पृथ्वी से तीस हजार योजन की दूरी पर परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है, जिसके सिर पर यह पृथ्वी सरसों के दाने की तरह भाररहित टिकी है। उस युग में योजन का पैमाना चाहे जो रहा हो, फिर भी यह पर्याप्त दूर है। वस्तुतः यह आकर्षण शक्ति का चित्रण है। वैज्ञानिकों ने जिसे ईथर माना है। ग्रह-उपग्रह सभी उसी शक्ति के आधार पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की कुण्डली की तरह सभी ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे पृथ्वी धारण की जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं-ऐसी ईश्वरीय शक्ति मैं हूँ। जलचरों में उनका अधिपति 'वरुण' हूँ तथा पितरों में 'अर्यमा' हूँ। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना 'अर:' है। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ।
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