mahabharat
62 Posts • 1M views
sn vyas
597 views
#महाभारत दुर्योधन में कोई अच्छा गुण नहीं था। दुर्योधन असल मे एक डरपोक व्यक्ति था। उसने भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया,पांडवों को जला कर मारने का प्रयत्न किया, जुए में धोखा करके पांडवों को वन भेज दिया,द्रौपदी जैसी विदुषी नारी पर झूठा आरोप लगाया कि उसने अंधे का पुत्र अंधा कहा इत्यादि। इन सब मौकों पर उसके पास विकल्प था कि वो ललकार कर पांडवों से युद्ध कर लेता पर उसने नही किया। लोग शकुनि को दोष देते हैं पर अंततः व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है। दुर्योधन को शुरू से पता था कि भीष्म और द्रोण पांडवों को नही मारेंगे और बिना पांडवों का वध किये उसका काम नही होगा। इसलिए उसने कर्ण को बहुत महत्व देना शुरू किया। कर्ण डींगें हांकने में निपुण था। उसने कभी कोई युद्ध नही जीता था। उसने एक दिग्विजय की थी जो हस्तिनापुर के ध्वज के तले थी, मतलब अगर कोई राजा कर्ण को हरा कर पकड़ता या मारता तो फिर भीष्म और द्रोण युद्ध के लिए आते।इनसे लड़ना कौन चाहता? इसलिए ये दिग्विजय अकेले कर्ण की नही कही जा सकती।बाकी सब जगह कर्ण भाग जाता था। खुद दुर्योधन ने कभी कोई युद्ध नही लड़ा था। इनकी शिक्षा समाप्त होने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हराने की बात की थी तब दुर्योधन ,कर्ण,दुशासन को अकेले द्रुपद ने हरा कर भगा दिया था। गन्धर्वों से युद्ध मे भी दुर्योधन बंदी हो गया था,कर्ण भाग गया था। पूरे 18 दिन के महाभारत युद्ध मे दुर्योधन की वीरता का कोई वर्णन नही है। उसने किसी बड़े योद्धा को मारा हो ये भी नही लिखा।यहां तक कि युधिस्ठिर ने भी एक बड़े वीर शल्य को मारा पर दुर्योधन से कुछ न हुआ। " सुई की नोक बराबर भूमि नही दूंगा" की डींगें मारने वाला दुर्योधन युद्ध की हार के बाद सामने से लड़ने के बजाय युद्धभूमि से भागकर छिप गया। पांडवों ने उसको ढूंढकर ललकारा तो उसने कहा कि मुझे नही लड़ना,तुम लोग राज करो 😂 दुर्योधन जैसे लोग विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर होते हैं, पूरे जीवन उसने यही किया। उसने पांडवों को उन्ही के धर्म से बांध दिया। अच्छे लोगों की तब और अब भी यही समस्या है कि" किसी ने हमारे साथ बुरा किया और अगर हमने भी उसके साथ बुरा किया तो उसमें और हममें क्या अंतर रह जायेगा"। श्री कृष्ण ने यही समझाया कि ये अंतर होना भी नही चाहिए। जब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो ये नही सोचते बैठे कि अगर मैं लंका में आग लगा दूँ तो इसमे और मुझमें क्या अंतर रह जायेगा। ऐसे ही किसी जाहिल ने किसी समय अयोध्या में मन्दिर गिरकर मस्जिद बना दी थी तो उचित समय पर फिर से मंदिर बने यही न्याय है। इसमे किसी को कोई अपराध बोध नही होना चाहिए। इसी तरह जीवन भर षड्यंत्र रचने वाले दुर्योधन की जांघ तोड़कर मारने में कुछ भी गलत नही था।
15 likes
6 shares
sn vyas
895 views
#महाभारत अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा एक दिन राजमहल में झाड़ू लगा रही थीं। तभी माता द्रौपदी उनके समीप आईं। स्नेहपूर्वक उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए बोलीं— “पुत्री, यदि भविष्य में तुम पर कितनी ही घोर विपत्ति क्यों न आ जाए, तो कभी अपने किसी नाते-रिश्तेदार की शरण में मत जाना। सीधे भगवान की शरण लेना।” माता द्रौपदी के ये वचन सुनकर उत्तरा विस्मित हो उठीं। उन्होंने आदरपूर्वक पूछा— “माता, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?” द्रौपदी ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया— “पुत्री, क्योंकि यह पीड़ा मैं स्वयं भोग चुकी हूँ। जब मेरे पाँचों पति कौरवों के साथ जुए में प्रवृत्त हुए, तो अपना समस्त राज्य और वैभव हार बैठे। अंततः उन्होंने मुझे भी दाँव पर लगा दिया और वह भी हार गए। इसके पश्चात कौरवों ने भरी सभा में मेरा घोर अपमान किया। मैंने सहायता के लिए अपने पतियों को पुकारा, पर वे सभी लज्जा से सिर झुकाए बैठे रहे। मैंने पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और महाराज धृतराष्ट्र से भी बार-बार प्रार्थना की, किंतु किसी ने मेरी ओर दृष्टि उठाकर नहीं देखा। सब मौन थे—नेत्रों में आँसू, किंतु हृदय में असहायता। तब पूर्णतः निराश होकर मैंने श्रीकृष्ण को पुकारा— ‘हे प्रभु! आपके सिवा मेरा और कोई नहीं है।’ और उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकट होकर मेरी लाज की रक्षा की।” अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह उधर द्वारका में श्रीकृष्ण अत्यंत व्याकुल हो उठे थे, क्योंकि उनकी परमप्रिय भक्त संकट में थी। रुक्मिणी ने उनके विषाद का कारण पूछा। तब श्रीकृष्ण बोले— “मेरी सबसे बड़ी भक्त को भरी सभा में अपमानित किया जा रहा है।” रुक्मिणी ने कहा— “तो आप तुरंत जाकर उसकी सहायता कीजिए।” भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया— “जब तक द्रौपदी मुझे पुकारेगी नहीं, मैं वहाँ कैसे जा सकता हूँ? किंतु जिस क्षण वह मुझे स्मरण करेगी, उसी क्षण मैं उसकी रक्षा के लिए पहुँच जाऊँगा। तुम्हें स्मरण होगा—राजसूय यज्ञ के समय जब शिशुपाल का वध करते हुए मेरी उँगली कट गई थी। उस समय मेरी सभी पत्नियाँ वहाँ थीं—कोई वैद्य बुलाने दौड़ी, कोई औषधि लाने गई। परंतु उसी क्षण मेरी इस भक्त ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर मेरी उँगली पर बाँध दिया था। आज उसी ऋण को चुकाने का समय है। किंतु मैं तभी जा सकता हूँ, जब वह स्वयं मुझे पुकारे।” और जैसे ही द्रौपदी ने करुण पुकार में श्रीकृष्ण का नाम लिया— भगवान तुरंत दौड़ पड़े और उनकी मर्यादा की रक्षा की। 🙏श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी🙏 🙏हे नाथ नारायण वासुदेव।🙏
21 likes
15 shares