🐍🔱 अद्भुत कथा: कैसे एक साधारण बालक ने मृत्यु को हराया और बना शिव का वाहन 'नंदी' 🕉️🚩
।। हर हर महादेव ।।
हम सभी मंदिर में जाकर नंदी जी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर नंदी जी का जन्म कैसे हुआ और कैसे उन्होंने मृत्यु को जीतकर कैलाश का द्वारपाल पद प्राप्त किया।
📖 यह प्रामाणिक कथा श्री शिव महापुराण की शतरुद्र संहिता में विस्तार से वर्णित है।
1️⃣ ऋषि शिलाद की तपस्या और वरदान:
प्राचीन काल में 'शिलाद' नाम के एक महान ऋषि थे। पितरों के आग्रह पर उन्होंने संतान प्राप्ति का निर्णय लिया, पर उन्हें साधारण पुत्र नहीं चाहिए था। उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र अयोनिज (बिना गर्भ के जन्मा), मृत्युहीन (अमर) और स्वयं भगवान शिव के समान तेजस्वी हो।
घोर तपस्या के बाद भगवान शिव प्रकट हुए। जब ऋषि ने 'शिव समान पुत्र' माँगा, तो भोलेनाथ मुस्कुराए और बोले— "हे मुनि! मेरे समान तो कोई दूसरा है ही नहीं, इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतार लूँगा।"
2️⃣ नंदी का प्राकट्य और आनंद:
कुछ समय बाद, जब ऋषि शिलाद खेत जोत रहे थे, धरती से एक दिव्य बालक प्रकट हुआ। उस बालक की छवि साक्षात शिव जैसी थी—तीन नेत्र और चार भुजाएं। ऋषि उसे देखकर 'परमानंद' में डूब गए, इसलिए उन्होंने बालक का नाम 'नंदी' रखा (नंदी का अर्थ है—आनंद देने वाला)।
3️⃣ मृत्यु की भविष्यवाणी और पिता का शोक:
नंदी अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। एक दिन ऋषि शिलाद के आश्रम में दिव्य ऋषि 'मित्र' और 'वरुण' पधारे। उन्होंने नंदी का सत्कार देखा, पर जाते समय उनकी आँखों में आँसू थे। कारण पूछने पर ऋषियों ने कहा— "मुनिवर! हमें दुख है कि आपके इस सर्वगुण संपन्न पुत्र की आयु बहुत कम है। यह केवल 8 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।"
यह सुनते ही ऋषि शिलाद विलाप करने लगे। पिता को रोता देख बालक नंदी हँसे और बोले— "पिताजी! शोक त्याग दें। मेरा जन्म स्वयं महादेव की कृपा से हुआ है। जिसने मुझे भेजा है, वही मेरी रक्षा भी करेंगे। मैं मृत्यु को जीतकर वापस आऊँगा।"
4️⃣ नंदी की कठोर तपस्या और महादेव का दर्शन:
पिता के चरण स्पर्श कर नंदी वन में चले गए। उन्होंने भुवन नदी के किनारे बैठकर 'रुद्र मंत्र' का ऐसा कठोर जाप किया कि वे समाधि में लीन हो गए। बालक नंदी की ऐसी कठोर तपस्या देखकर पूरा ब्रह्मांड डोलने लगा। अंततः भगवान शिव और माता पार्वती स्वयं वहां प्रकट हुए।
भगवान शिव ने नंदी को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और कहा— "नंदी! तुम्हें मृत्यु का भय कैसा? तुम तो मेरे ही अंश हो। आज से तुम अजर और अमर हो। काल कभी तुम्हें छू भी नहीं पाएगा।"
5️⃣ बने शिव-गणों के स्वामी (नंदीश्वर):
उसी क्षण भगवान शिव ने अपनी माला उतारकर नंदी के गले में डाल दी और घोषणा की:
🔹 "आज से तुम मेरे सभी गणों के स्वामी (गणाध्यक्ष) होगे।"
🔹 "तुम्हें 'नंदीश्वर' के नाम से पूजा जाएगा।"
🔹 "तुम मेरे सबसे प्रिय वाहन और मेरे निवास कैलाश के मुख्य द्वारपाल रहोगे। मेरी आज्ञा के बिना कोई मेरे दर्शन नहीं कर पाएगा।"
इस प्रकार, अपनी अटूट भक्ति और विश्वास के बल पर नंदी जी ने न केवल अपनी मृत्यु को टाला, बल्कि भगवान शिव के सबसे करीब और पूजनीय बन गए। इसीलिए कहा जाता है कि शिव की पूजा नंदी के बिना अधूरी
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🙏 प्रेम से बोलिए— नंदीश्वर भगवान की जय! हर हर महादेव! 🚩✨
(स्रोत: शिव महापुराण, शतरुद्र संहिता)