रात के 2 बजे थे। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में सन्नाटा इतना गहरा था कि पत्ते की आवाज़ भी गोली जैसी लग रही थी।
DRG की अल्फा टीम धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
टीम लीडर — कमांडेंट अर्जुन सिंह — आँखों में आग, चेहरे पर सख़्ती।
अचानक—
धड़ाम!
आईईडी ब्लास्ट! ज़मीन कांपी, धुआँ छा गया।
“कवर लो!” अर्जुन की दहाड़ जंगल में गूँज गई।
चारों तरफ़ से फायरिंग शुरू। नक्सली सोच रहे थे—आज DRG खत्म।
लेकिन उन्हें नहीं पता था…
ये DRG है, भागने वालों की फौज नहीं।
अर्जुन ने मिट्टी से उठते हुए AK पकड़ी।
धीमी आवाज़ में बोला—
“आज नहीं… आज जवाब मिलेगा।”
टीम के जवान एक-एक कर पोज़िशन लेने लगे।
कोई पेड़ के पीछे, कोई चट्टान के पास।
तड़-तड़-तड़!
जवानो की जवाबी फायरिंग ने जंगल की खामोशी चीर दी।
एक नक्सली सामने आया—
अर्जुन दौड़ा, स्लो-मोशन में कूदकर हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट!
एक घूँसा, एक लात—
धड़ाम! ज़मीन पर गिरा दुश्मन।
रेडियो पर आवाज़ आई—
“सर, बैक-अप नहीं आएगा… हमें ही निकलना होगा।”
अर्जुन ने आसमान की तरफ़ देखा, फिर मिट्टी उठाकर माथे से लगाई—
“भारत माँ की कसम… एक क़दम भी पीछे नहीं।”
अंतिम हमला।
जवानों की गूंजती आवाज़ें—
“जय हिन्द!”
कुछ ही मिनटों में जंगल शांत था।
धुआँ था, थकान थी…
लेकिन तिरंगा सीधा खड़ा था।
सुबह की पहली किरण जब जंगल पर पड़ी,
अर्जुन ने शहीद साथी की तरफ़ देखा और बोला—
“कह देना घर पर… देश सुरक्षित है।”
🇮🇳🔥जय हिन्द जय भारत 🇮🇳
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