#🙏 भक्ति #🌺 जय मां तारा 🌺 #🌺 जय गुरु बामदेव 🌺
🔱 दक्षिण काली ध्यान मंत्र...
प्रत्ययालीढ पदां घोरां मुण्डमाला विभूषिताम्।
खरर्वांग लंबोदरीं भीमां व्याघ्रचर्मावृतां कटौ॥
नवयौवन सम्पन्नां पंचमुद्रा विभूषिताम्।
चतुर्भुजां ललज्जिह्वां घोरदंष्ट्रां करालिनीम्॥
मुक्तकेशीं विशालाक्षीं स्मेरवक्त्रां स्तनीं द्वयीम्।
शवमध्यस्थितां देवीं श्मशानालयवासिनीम्॥
खड्गकर्त्री समायुक्त सव्येतर भुजा द्वयम्।
अभयं वरदं चैव दक्षिणेनाप्यधस्तथा॥
एवंरूपा महाकाली ह्यसाधु जन मोहनी।
महायतिर्महामाया साक्षाद् देवी प्रकीर्तिता॥
🙏 मंत्र का भावार्थ (संक्षेप में)
यह ध्यान मंत्र भगवती महाकाली के उग्र और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करता है:
प्रत्ययालीढ पदां: वह जिसने प्रत्यलीढ़ (दायाँ पैर आगे, बायाँ पीछे) मुद्रा में पग रखे हैं।
घोरां मुण्डमाला विभूषिताम्: भयानक स्वरूप वाली और मुण्डों की माला से सुशोभित हैं।
खरर्वांग लंबोदरीं: उनका छोटा, मोटा शरीर है और उनका पेट (उदर) लम्बा है।
व्याघ्रचर्मावृतां कटौ: कमर पर बाघ की खाल लपेटी हुई है।
चतुर्भुजां ललज्जिह्वां: उनकी चार भुजाएँ हैं और उनकी जीभ लपलपा रही है।
घोरदंष्ट्रां करालिनीम्: उनके भयंकर दाँत हैं और वे अत्यंत डरावनी (कराल) हैं।
शवमध्यस्थितां देवीं श्मशानालयवासिनीम्: वह देवी शव के ऊपर स्थित हैं और श्मशान में निवास करती हैं।
खड्गकर्त्री समायुक्त: उनके बाएं हाथों में खड्ग (तलवार) और कर्तृ (खोपड़ी काटने वाला उपकरण) हैं।
अभयं वरदं चैव दक्षिणेनाप्यधस्तथा: उनके दाहिने हाथों में अभय (रक्षा का आश्वासन) और वरद (वरदान देने) की मुद्राएँ हैं।
यह स्वरूप दुष्टों का नाश करने वाला, साधकों को सिद्धि देने वाला और साक्षात् महामाया का प्रतीक है।
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