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kashivishwanath

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sn vyas
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#काशी #काशी विश्वनाथ मंदिर, ज्ञानवापी मस्जिद, ज्ञानवापी मस्जिद न्यूज #वाराणसी काशी में मृत्यु से मुक्ति के रहस्य 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ काश्याम् मरणान् मुक्ति: “असारे खलु संसारे सारमेतच्चतुष्टयम् । काशीवासः सतां सङ्गो गङ्गाम्भः शिवपूजनम् ॥” इस असार संसार में चार वस्तुएँ सारभूत कही गई हैं—काशीवास, सत्संग, गङ्गाजल का सेवन तथा भगवान् शिव का पूजन। श्री काशी जी का दूसरा नाम ‘अविमुक्त’ है। मान्यता है कि भगवान् शंकर काशी को कभी छोड़कर कहीं नहीं जाते, इसलिए इसे ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है। १. भौतिक काशी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जो काशी भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश में स्थित है, वह भौतिक काशी है। चिन्मय काशी समस्त भूमण्डल से मिली हुई प्रतीत होने पर भी भगवान् शंकर के त्रिशूल पर स्थित मानी गई है। प्रलयकाल में जब समस्त संसार जलमग्न हो जाता है, तब भी काशी का नाश नहीं होता। मान्यता है कि प्रलय का जल जब काशी को डुबोना चाहता है, तब भगवान् शिव अपने त्रिशूल को ऊपर उठा देते हैं और काशी अंतरिक्ष लोक में स्थित हो जाती है। जल वहाँ तक पहुँचने पर त्रिशूल को और ऊपर उठा दिया जाता है और काशी स्वर्ग में स्थित हो जाती है। प्रलय की समाप्ति के पश्चात् भगवान् शिव त्रिशूल को पुनः नीचे करते जाते हैं और काशी पूर्ववत् पृथ्वी पर स्थित हो जाती है। इसी कारण इसे अविनाशी कहा गया है। चारों युगों में इसके अर्धचन्द्राकार, धनुषाकार आदि विभिन्न स्वरूप माने गए हैं। २. आधिदैविक काशी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जो देवताओं को अधीन करके स्थित है, वह भगवान् शंकर का महाकैलास, शिवलोक आदि आधिदैविक काशी है। ३. आध्यात्मिक काशी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मानव शरीर में अनेक नाड़ियाँ हैं, जिनमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना तीन प्रधान नाड़ियाँ मानी गई हैं। दाहिनी नासिका से प्रवाहित होने वाली वायु पिङ्गला तथा बायीं नासिका से प्रवाहित होने वाली वायु इड़ा कही जाती है। इन्हें क्रमशः सूर्य और चन्द्र नाड़ी भी कहा जाता है तथा गङ्गा और यमुना के रूप में भी इनके प्रतीकात्मक स्वरूप का वर्णन मिलता है। इन दोनों के मध्य स्थित सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहा गया है। इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना का संगम जिस सूक्ष्म केन्द्र में माना गया है, वही आध्यात्मिक काशी अथवा वाराणसी है। इसके संबंध में कहा गया है 👇🏻 “जन्मान्तरकृतान् सर्वान् दोषान् वारयति तेन वरणा भवति इति। सर्वानिन्द्रियकृतान् पापान् नाशयति इति नासी भवति। इति वरणां नाश्यां च मध्ये प्रतिष्ठिता इति वाराणसी।” अर्थात् जो जीव के जन्म-जन्मान्तरों के दोषों को दूर करती है, वह ‘वरणा’ तथा जो इन्द्रियों द्वारा किए गए पापों का नाश करती है, वह ‘असी’ कही गई है। इन दोनों के मध्य स्थित होने के कारण इसे ‘वाराणसी’ कहा जाता है। जो साधक इड़ा और पिङ्गला के द्वन्द्व से ऊपर उठकर सुषुम्ना में स्थित होकर भृकुटि में चित्त को स्थिर करता है और शरीर का त्याग करता है, वह पुनर्जन्म से रहित होने की अवस्था को प्राप्त होता है। परन्तु इस घोर कलिकाल में साधक के पास इतना विवेक, वैराग्य, योग और ध्यान आदि साधन नहीं हैं। इसी कारण भगवान् शंकर जीवों के कल्याण के लिए काशी में तारक-ब्रह्म का उपदेश करने वाले माने गए हैं। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले पुरुष के दाहिने कान तथा स्त्री के बाएँ कान में भगवान् शिव तारक मन्त्र का उपदेश करते हैं। रामभक्तों को राम-तारक मन्त्र, गणेश-भक्तों को गणेश-तारक मन्त्र, शक्ति-उपासकों को दुर्गा-तारक मन्त्र तथा यतियों को प्रणव का उपदेश देकर भगवान् शिव उन्हें तार देते हैं। यहाँ एक शंका उत्पन्न होती है 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जब शास्त्रों में “ऋते ज्ञानान्मुक्तिः” तथा “ज्ञानादेव कैवल्यम्” आदि सिद्धान्तों द्वारा ज्ञान को मुक्ति का साधन बताया गया है, तो केवल काशी में मृत्यु होने से मुक्ति कैसे सम्भव हो सकती है? इसका उत्तर यही है कि वास्तव में ज्ञान के बिना मुक्ति कहीं भी सम्भव नहीं है। काशी की महिमा का रहस्य भी इसी ज्ञानोपदेश में निहित माना गया है। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले जीव के समीप भगवान् शिव स्वयं उपस्थित होते हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू आदि होते हैं। अधिकारी भक्तों द्वारा उनके ऐसे दर्शन किए जाने की कथाएँ भी मिलती हैं। भगवान् शिव उस जीव को दिव्य ज्ञान का उपदेश करते हुए कहते हैं👇🏻 “न मैं हूँ, न तुम हो, न काशी है, न गङ्गा है, न ब्रह्मा-विष्णु आदि देवता हैं और न असुर आदि कुछ भी है।” तब जीव प्रश्न करता है—“यह सब तो मुझे प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है, फिर आप कैसे कहते हैं कि कुछ भी नहीं है?” तब भगवान् शिव समझाते हैं कि यह जगत् स्वप्न के समान मिथ्या है। यह चेतन ब्रह्म का विवर्त है। अर्थात् ब्रह्म स्वयं जगत् के रूप में परिणत हुए बिना भी जीव के अज्ञान के कारण जगत् के रूप में भासित होता है। इसी भाव को निम्न श्लोक में व्यक्त किया गया है 👇🏻 “अनिलो मृगनाभिरेणुगन्धिः राधिकाशि प्रणवोपदेशकाले। हरते मरणश्रमं नराणां हर वामार्धकुचोत्तरीयजन्मा ॥” भाव यह है कि काशी में मनुष्य के मरण समय भगवान् शिव उस प्राणी को अपनी गोद में रखकर तारक मन्त्र का उपदेश करते हैं और माता पार्वती, अन्नपूर्णा स्वरूप में, कस्तूरी की सुगन्ध से सुवासित अपने आँचल की वायु द्वारा उसके मरणकालीन संताप और व्याकुलता को दूर करती हैं। आद्य जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य जी ने भी ‘काशी-पञ्चकम्’ में कहा है 👇🏻 “काश्यां हि काशते काशी काशी सर्वप्रकाशिका । सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका ॥” अर्थात् जो समस्त शरीर को प्रकाशित करने वाली आध्यात्मिक काशी अर्थात् आत्मस्वरूप को जान लेता है, उसी ने वास्तविक काशी को प्राप्त कर लिया। शिवपुराण में भी काशी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भगवान् शंकर ने जब देखा कि उनकी माया से मोहित जीव सहज ही उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता, तब उन्होंने त्रिशूल पर स्थित काशी को मृत्यु-लोक में स्थापित किया। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त यह दिव्य काशी जीवों के सञ्चित कर्मों को भस्म करने वाली मानी गई है। इसी कारण इसे ‘काशी’ कहा गया है। कभी-कभी संसार में यह देखने को मिलता है कि पुण्य-कर्म करने वाले व्यक्ति की मृत्यु काशी से बाहर होती है और पाप-कर्म करने वाला व्यक्ति काशी में शरीर त्यागता है। तब प्रश्न उठता है की ऐसा क्यों? इस विषय में सूक्ष्म विचार आवश्यक है कि वास्तविक अर्थ में कौन पापी है और कौन धर्मात्मा? हम प्रायः मनुष्य के वर्तमान जन्म के कर्मों को देखकर उसे धर्मात्मा अथवा पापी कह देते हैं। किन्तु किसी व्यक्ति के मन में वर्तमान समय में पुण्य है अथवा पाप, इसे दूसरा व्यक्ति पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। यदि कोई साधक अपने साधन द्वारा कुछ जान भी ले, तो भी वह सीमित ही होगा; क्योंकि वह जीव के सभी पूर्वजन्मों के कर्मों को पूर्णतः नहीं जान सकता। ईश्वर की सर्वज्ञता असीम है। वे जीव के अनन्त जन्मों के पुण्य-पाप और सञ्चित कर्मों को जानते हैं। अतः काशी-मरण की महिमा को केवल बाह्य दृष्टि से नहीं, अपितु सञ्चित कर्म और ईश्वर की व्यवस्था के सूक्ष्म सिद्धान्त के साथ समझना चाहिए। जैसे अग्नि में जलाने की शक्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है, वैसे ही काशी को मोक्षदायिनी शक्ति से सम्पन्न माना गया है। जैसे स्वाति नक्षत्र की वर्षा-बूंद जब सीप में गिरती है तो मोती बनने की प्रसिद्ध मान्यता है, वैसे ही काशी में देह त्यागने वाले जीवों के संबंध में मोक्ष की महिमा कही गई है। पञ्चकोशी काशी में सुई की नोक के बराबर भी ऐसा कोई स्थान नहीं माना गया है, जहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष का फल प्राप्त न हो। ॥ काशी काशी शिवः शिवः ॥ ‘काशी-रहस्य’ में भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं— “योगोऽत्र निद्रा कृतभः प्रचारः स्वेच्छाशनं देवि महानिवेद्यम् । लीलात्मनो देवि पवित्रदानम् जपः प्रजल्पं शयनं प्रणामः ॥” अर्थात् हे देवी! काशी में निद्रा योगनिद्रा है, काशी में चलना योग की खेचरी मुद्रा के समान है, स्वेच्छा से किया गया भोजन भी नैवेद्य है, अपनी लीला ही पवित्र दान है, बातचीत ही जप है तथा सोना और बैठना भी प्रणाम के समान फलदायी माना गया है। अतः मुक्ति को दुर्लभ समझकर अपने शरीर को कष्ट देकर काशी में पड़े रहना आवश्यक नहीं है। काशीपति भगवान् शिव के आश्रित होना और उनके प्रति समर्पित होना ही जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होने का वास्तविक मार्ग है। जिसने अपने कानों से दो अक्षरों वाला ‘काशी’ मन्त्र सुना, उसके लिए काशी की महिमा जीवन में एक दिव्य स्मरण बन जाती है। “शिवः काशी शिवः काशी काशीकाशी शिवः शिवः । त्रिवारं यः पठेन्नित्यं काशीवासफलं लभेत् ॥” अर्थात् काशी ही शिव हैं और शिव ही काशी हैं। जो व्यक्ति नित्य तीन बार इस भाव का स्मरण करता है, उसे काशीवास के फल की प्राप्ति कही गई है। इस प्रकार काशी केवल एक भौगोलिक नगरी नहीं, बल्कि शिवतत्त्व, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और मोक्ष की दिव्य भूमि मानी गई है। जैसे ऊसर भूमि में बोया हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही काशी को ऐसा क्षेत्र माना गया है जहाँ शुभ-अशुभ मिश्रित कर्मरूपी बीज पुनर्जन्मरूपी फल उत्पन्न नहीं करता। सूर्यवंशी राजा मान्धाता प्रतिदिन अयोध्या से हिमालय जाकर भगवान् शंकर की आराधना करते थे। वे भगवान् शिव के दर्शन किए बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे। जब वे वृद्ध हो गए, तब उन्होंने भगवान् शिव को काशी में लाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें वर माँगने को कहा। तब राजा मान्धाता ने भगवान् शिव से काशी जाने की प्रार्थना की। भगवान् शिव ने कहा 👇🏻 “तुम्हारी इच्छा से मैं एक कला से यहाँ रहूँगा और पन्द्रह कलाओं से काशी में निवास करूँगा, जिससे बालक, वृद्ध, रोगी और निर्धन सभी का कल्याण होगा तथा काशी-केदारखण्ड में देह त्यागने वाले महापापियों को भी भैरवी-यातना से मुक्ति प्राप्त होगी।” तब से केदारखण्ड में देह त्यागने वाले महादुष्टों को भी भगवान् शिव की कृपा से भैरवी-यातना से मुक्ति मिलने की महिमा कही गई है। जैसे कोई व्यभिचारी स्त्री अथवा पुरुष किसी रोग से पीड़ित होकर चिकित्सक के पास जाता है तो चिकित्सक उसके पूर्व आचरण को देखकर उपचार से वंचित नहीं करता, बल्कि रोग को देखकर उसका उपचार करता है; वैसे ही जन्म-मरणरूपी महारोग के चिकित्सक भगवान् शंकर माने गए हैं। वे केदारखण्ड में देह त्यागने वालों के दोषों को न देखकर उन्हें अपनी कृपा से मुक्त करते हैं—ऐसी काशी-महिमा में श्रद्धा व्यक्त की गई है। काशीवास करने वालों को यह भावना रखनी चाहिए कि भगवान् शिव मेरे पिता हैं और माता पार्वती मेरी माता हैं। गङ्गाजी मेरी मौसी हैं, ढुण्ढिराज गणेश जी युवराज हैं, काशी के कोतवाल भगवान् कालभैरव मेरे बड़े भाई हैं और मणिकर्णिका मेरी बहन हैं। मेरी बुद्धि ही मेरी पत्नी है, सत्कर्म मेरे पुत्र-पुत्री हैं तथा काशी के समस्त निवासी, पशु-पक्षी और जीव-जन्तु मेरे अपने परिजन हैं। ऐसी आत्मीयता, श्रद्धा और शिवमय भावना के साथ काशीवास करने वाला व्यक्ति काशी को केवल एक नगर के रूप में नहीं, बल्कि परम मोक्षधाम के रूप में अनुभव करता है। काशी केवल पृथ्वी पर स्थित एक नगरी नहीं—यह भगवान् विश्वनाथ की नगरी है; जहाँ गङ्गा बहती हैं, जहाँ माता अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है, जहाँ कालभैरव क्षेत्रपाल हैं और जहाँ प्रत्येक कण में शिवतत्त्व की अनुभूति का अवसर मिलता है। ॥ नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव ॥ ॥ वाराणसीं पुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ साभार– पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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