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विष्णु पुराण के प्रथम अंश (अध्याय 15) में महर्षि कण्डु और प्रम्लोचा अप्सरा का आख्यान मिलता है। यह कथा काम (वासना) के प्रभाव, समय के भ्रम और पश्चाताप के बाद ईश्वर भक्ति से परम पद पाने का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
कथा का विस्तार:
1. महर्षि कण्डु की घोर तपस्या:
महर्षि कण्डु परम ज्ञानी और तपोनिष्ठ ऋषि थे। वे मंदराचल पर्वत के पास गोमती नदी के सुंदर तट पर कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या का प्रभाव इतना तीव्र था कि स्वर्गलोक में देवराज इंद्र घबरा गए। इंद्र को लगा कि कण्डु जी अपनी तपस्या के बल से उनका इंद्रासन न छीन लें। इसलिए, उन्होंने महर्षि की तपस्या भंग करने के लिए 'प्रम्लोचा' नाम की अत्यंत रूपवती अप्सरा को भेजा।
2. प्रम्लोचा का आगमन और साधना भंग:
प्रम्लोचा महर्षि कण्डु के आश्रम पहुँची और अपनी मधुर वाणी, गान और अलौकिक सौंदर्य से महर्षि का ध्यान भटकाने लगी। उसके अनुपम रूप और हाव-भाव को देखकर महर्षि कण्डु का संयम टूट गया और वे कामासक्ति के वशीभूत हो गए। वे अपनी संध्या-वंदन, जप और साधना को भूलकर प्रम्लोचा के साथ भोग-विलास में लीन हो गए।
3. समय का महा-भ्रम (शताब्दियों का बीत जाना):
महर्षि कण्डु अप्सरा के प्रेम में इतने सुध-बुध खो बैठे कि उन्हें दिन और रात का अहसास ही नहीं रहा। वे प्रम्लोचा के साथ सैकड़ों वर्षों तक कुंजों और गुफाओं में विहार करते रहे।
एक दिन सायंकाल के समय महर्षि कण्डु अचानक आश्रम से बाहर जाने लगे। प्रम्लोचा ने पूछा— "भगवान! आप इतनी शीघ्रता में कहाँ जा रहे हैं?"
महर्षि ने उत्तर दिया— "देवी! संध्या का समय हो गया है। यदि मैं संध्या-वंदन और अग्निहोत्र नहीं करूँगा, तो मेरा धर्म नष्ट हो जाएगा।"
यह सुनकर प्रम्लोचा मंद-मंद मुस्कुराई और बोली— "हे महात्मन! आप किस 'संध्या' की बात कर रहे हैं? आपके साथ तो सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। आज कोई एक दिन की संध्या नहीं है!"
4. महर्षि का बोध और पश्चाताप:
प्रम्लोचा के वचन सुनकर महर्षि कण्डु स्तब्ध रह गए। उन्होंने अपने योगबल से देखा तो पाया कि वे सैकड़ों वर्षों तक अज्ञान के अंधकार में डूबे रहे और उन्हें लगा कि यह सब केवल एक ही दिन की बात है।
उन्हें अपनी भूल और तपस्या के नाश होने का अत्यंत तीव्र दुख हुआ। क्रोध और पश्चाताप में भरकर उन्होंने कहा— "धिक्कार है मेरे इस संयम और ज्ञान को! नारी के रूप के मोह में पड़कर मैंने अपना संपूर्ण तपोबल गँवा दिया।"
महर्षि ने प्रम्लोचा पर क्रोध तो किया, लेकिन यह सोचकर उसे भस्म नहीं किया कि उसने उनके साथ लंबा समय बिताया है। उन्होंने प्रम्लोचा से तुरंत वहाँ से चले जाने को कहा।
5. प्रम्लोचा का प्रस्थान और मारिषा का जन्म:
महर्षि कण्डु के भय और घबराहट के कारण प्रम्लोचा के शरीर से अत्यधिक पसीना (स्वेद) छूटने लगा। जब वह आकाश मार्ग से जा रही थी, तब उसने अपने पसीने की बूंदों को वृक्षों के पत्तों पर पोंछा। उन्हीं पसीने की बूंदों और महर्षि के तेज से वृक्षों ने एक कन्या को पोषण दिया, जिसका नाम 'मारिषा' पड़ा। (यही मारिषा आगे चलकर प्रचेता-पुत्र दक्ष की माता बनीं)।
6. पुनः तपस्या और परम पद की प्राप्ति:
प्रम्लोचा के जाने के बाद महर्षि कण्डु पूरी तरह विरक्त हो गए। वे समझ गए कि संसार के भोग-विलास क्षणभंगुर और विनाशकारी हैं। वे तुरंत 'पुरुषोत्तम क्षेत्र' (श्रीक्षेत्र/पुरी) चले गए।
वहाँ उन्होंने भगवान विष्णु के 'विष्णु-स्तोत्र' का निरंतर जाप किया और केवल श्रीहरि के ध्यान में लीन हो गए। उनकी इस निष्काम भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा किया और अंततः महर्षि कण्डु ने परम पद (मोक्ष) प्राप्त किया।