sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-5️⃣1️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(वैवाहिकपर्व)
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यासजी का द्रुपद को पाण्डवों तथा द्रौपदी के पूर्वजन्म की कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपद का उनके दिव्य रूपों की झाँकी करना...(दिन 519)
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व्यास उवाच
पुरा वै नैमिषारण्ये देवाः सत्रमुपासते ।
तत्र वैवस्वतो राजशामित्रमकरोत् तदा ।। १ ।।
व्यासजीने कहा-पांचालनरेश ! पूर्व कालकी बात है, नैमिषारण्य क्षेत्रमें देवता लोग एक यज्ञ कर रहे थे। उस समय वहाँ सूर्यपुत्र यम शामित्र (यज्ञ) कार्य करते थे ।। १ ।।
ततो यमो दीक्षितस्तत्र राजन्
नामारयत् कंचिदपि प्रजानाम् । ततः प्रजास्ता बहुला बभूवुः
कालातिपातान्मरणप्रहीणाः ।। २ ।।
राजन् ! उस यज्ञकी दीक्षा लेनेके कारण यमराजने मानवप्रजाकी मृत्युका काम बंद कर रखा था। इस प्रकार मृत्युका नियत समय बीत जानेसे सारी प्रजा अमर होकर दिनों-दिन बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उसकी संख्या बहुत बढ़ गयी ।। २ ।।
सोमश्च शक्रो वरुणः कुबेरः
साध्या रुद्रा वसवोऽथाश्विनौ च । प्रजापतिर्भुवनस्य प्रणेता
समाजग्मुस्तत्र देवास्तथान्ये ।। ३ ।।
ततोऽब्रुवन् लोकगुरुं समेता भयात् तीव्रान्मानुषाणां च वृद्धया ।
तस्माद् भयादुद्विजन्तः सुखेप्सवः
प्रयाम सर्वे शरणं भवन्तम् ।। ४ ।।
चन्द्रमा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, साध्यगण, रुद्रगण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्य सब देवता मिलकर जहाँ सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्माजी रहते थे, वहाँ गये। वहाँ जाकर वे सब देवता लोकगुरु ब्रह्माजीसे बोले- 'भगवन्! मनुष्योंकी संख्या बहुत बढ़ रही है। इससे हमें बड़ा भय लगता है। उस भयसे हम सबलोग व्याकुल हो उठे हैं और सुख पानेकी इच्छासे आपकी शरणमें आये हैं' ।। ३-४ ।।
पितामह उवाच
किं वो भयं मानुषेभ्यो यूयं सर्वे यदामराः । मा वो मर्त्यसकाशाद् वै भयं भवितुमर्हति ।। ५ ।।
ब्रह्माजीने कहा- तुम्हें मनुष्योंसे क्यों भय लगता है? जबकि तुम सभी लोग अमर हो, तब तुम्हें मरणधर्मा मनुष्योंसे कभी भयभीत नहीं होना चाहिये ।। ५ ।।
देवा ऊचुः
मर्त्या अमर्त्याः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन । अविशेषादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहागताः ।। ६ ।।
देवता बोले- जो मरणशील थे, वे अमर हो गये। अब हममें और उनमें कोई अन्तर नहीं रह गया। यह अन्तर मिट जानेसे ही हमें अधिक घबराहट हो रही है। हमारी विशेषता बनी रहे, इसीलिये हम यहाँ आये हैं ।। ६ ।।
श्रीभगवानुवाच
वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो-
स्तेन त्विमे न म्रियन्ते मनुष्याः । तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये तत एषां भवितैवान्तकालः ।। ७ ।।
वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता वीर्येण युष्माकमुत प्रयुक्ता । सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले न तत्र वीर्यं भविता नरेषु ।। ८ ।।
भगवान् ब्रह्माजीने कहा- सूर्यपुत्र यमराज यज्ञके कार्यमें लगे हैं, इसीलिये ये मनुष्य मर नहीं रहे हैं। जब वे यज्ञका सारा काम पूरा करके इधर ध्यान देंगे, तब इन मनुष्योंका अन्तकाल उपस्थित होगा। तुमलोगोंके बलके प्रभावसे जब सूर्यनन्दन यमराजका शरीर यज्ञकार्यसे अलग होकर अपने कार्यमें प्रयुक्त होगा, तब वही अन्तकाल आनेपर मनुष्योंकी मृत्युका कारण बनेगा। उस समय मनुष्योंमें इतनी शक्ति नहीं होगी कि वे मृत्युसे अपनेको बचा सकें ।। ७-८ ।।
व्यास उवाच
ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं श्रुत्वा जग्मुर्यत्र देवा यजन्ते । समासीनास्ते समेता महाबला भागीरथ्यां ददृशुः पुण्डरीकम् ।। ९ ।।
व्यासजी कहते हैं- राजन् ! तब वे अपने पूर्वज देवता ब्रह्माजीका वचन सुनकर फिर वहीं चले गये, जहाँ सब देवता यज्ञ कर रहे थे। एक दिन वे सभी महाबली देवगण गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये और वहाँ तटपर बैठे। उसी समय उन्हें भागीरथीके जलमें बहता हुआ एक कमल दिखायी दिया ।। ९ ।।
दृष्ट्वा च तद् विस्मितास्ते बभूवु-स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम । सोऽपश्यद् योषामथ पावकप्रभां यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ।। १० ।।
उसे देखकर वे सब देवता चकित हो गये। उनमें सबसे प्रधान और शूरवीर इन्द्र उस कमल का पता लगाने के लिये गंगाजी के मूल-स्थान की ओर गये। गंगोत्तरी के पास, जहाँ गंगादेवी का जल सदा अविच्छिन्नरूपसे झरता रहता है, पहुँचकर इन्द्रने एक अग्निके समान तेजस्विनी युवती देखी ।। १० ।।
सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी गङ्गां देवीं व्यवगाह्य व्यतिष्ठत् । तस्याश्रुबिन्दुः पतितो जले य-स्तत् पद्ममासीदथ तत्र काञ्चनम् ।। ११ ।।
वह युवती वहाँ जलके लिये आयी थी और भगवती गंगाकी धारामें प्रवेश करके रोती हुई खड़ी थी। उसके आँसुओंका एक-एक बिन्दु, जो जलमें गिरता था, वहाँ सुवर्णमय कमल बन जाता था ।। ११ ।।
तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी-मपृच्छत् तां योषितमन्तिकाद् वै । का त्वं भद्रे रोदिषि कस्य हेतो-र्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ।। १२ ।।
यह अद्भुत दृश्य देखकर वज्रधारी इन्द्रने उस समय उस युवतीके निकट जाकर पूछा - 'भद्रे ! तुम कौन हो और किसलिये रोती हो? बताओ, मैं तुमसे सच्ची बात जानना चाहता हूँ' ।। १२ ।।
त्र्युवाच
त्वं वेत्स्यसे मामिह यास्मि शक्र यदर्थं चाहं रोदिमि मन्दभाग्या । आगच्छ राजन् पुरतो गमिष्ये द्रष्टासि तद् रोदिमि यत्कृतेऽहम् ।। १३ ।।
युवती बोली-देवराज इन्द्र ! मैं एक भाग्यहीन अबला हूँ; कौन हूँ और किसलिये रो रही हूँ, यह सब तुम्हें ज्ञात हो जायगा। तुम मेरे पीछे-पीछे आओ, मैं आगे-आगे चल रही हूँ। वहाँ चलकर स्वयं ही देख लोगे कि मैं किसलिये रोती हूँ ।। १३ ।।
व्यास उवाच
तां गच्छन्तीमन्वगच्छत् तदानीं सोऽपश्यदारात् तरुणं दर्शनीयम् । सिद्धासनस्थं युवतीसहायं क्रीडन्तमैक्षद् गिरिराजमूर्ध्नि ।। १४ ।।
व्यासजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर आगे-आगे जाती हुई उस स्त्रीके पीछे-पीछे उस समय इन्द्र भी गये। गिरिराज हिमालयके शिखरपर पहुँचकर उन्होंने देखा-पास ही एक परम सुन्दर तरुण पुरुष सिद्धासनसे बैठे हैं, उनके साथ एक युवती भी है। इन्द्रने उस युवतीके साथ उन्हें क्रीड़ा-विनोद करते देखा ।। १४ ।।
तमब्रवीद् देवराजो ममेदं त्वं विद्धि विद्वन् भुवनं वशे स्थितम् । ईशोऽहमस्मीति समन्युरब्रवीद् दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ।। १५ ।।
वे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे क्रीड़ामें अत्यन्त तन्मय हो रहे थे, अतः इधर-उधर उनका ध्यान नहीं जाता था। उन्हें इस प्रकार असावधान देख देवराज इन्द्रने कुपित होकर कहा - 'महानुभाव! यह सारा जगत् मेरे अधिकारमें है, मेरी आज्ञाके अधीन है; मैं इस जगत्का ईश्वर हूँ' ।। १५ ।।
क्रुद्धं च शक्रं प्रसमीक्ष्य देवो जहास शक्रं च शनैरुदैक्षत । संस्तम्भितोऽभूदथ देवराज-स्तेनेक्षितः स्थाणुरिवावतस्थे ।। १६ ।।
इन्द्रको क्रोधमें भरा देख वे देवपुरुष हँस पड़े। उन्होंने धीरेसे आँख उठाकर उनकी ओर देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्रका शरीर स्तम्भित हो गया (अकड़ गया)। वे ठूंठे काठकी भाँति निश्चेष्ट हो गये ।। १६ ।।
यदा तु पर्याप्तमिहास्य क्रीडया तदा देवीं रुदतीं तामुवाच । आनीयतामेष यतोऽहमारा-न्नैनं दर्पः पुनरप्याविशेत ।। १७ ।।
जब उनकी वह क्रीड़ा समाप्त हुई, तब वे उस रोती हुई देवीसे बोले- 'इस इन्द्रको जहाँ मैं हूँ, यहीं- मेरे समीप ले आओ, जिससे फिर इसके भीतर अभिमानका प्रवेश न हो' ।। १७ ।।
ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तया तु स्रस्तैरङ्गैः पतितोऽभूद् धरण्याम् । तमब्रवीद् भगवानुग्रतेजा मैवं पुनः शक्र कृथाः कथंचित् ।। १८ ।।
तदनन्तर उस स्त्रीने ज्यों ही इन्द्रका स्पर्श किया, उनके सारे अंग शिथिल हो गये और वे धरतीपर गिर पड़े। तब उग्र तेजस्वी भगवान् रुद्रने उनसे कहा- 'इन्द्र ! फिर किसी प्रकार भी ऐसा घमंड न करना ।। १८ ।।
निवर्तयैनं च महाद्रिराजं बलं च वीर्यं च तवाप्रमेयम् । छिद्रस्य चैवाविश मध्यमस्य यत्रासते त्वद्विधाः सूर्यभासः ।। १९ ।।
'तुममें अनन्त बल और पराक्रम है, अतः इस गुफाके दरवाजेपर लगे हुए इस महान् पर्वतराजको हटा दो और इसी गुफाके भीतर घुस जाओ, जहाँ सूर्यके समान तेजस्वी तुम्हारे-जैसे और भी इन्द्र रहते हैं' ।। १९ ।।
स तद् विवृत्य विवरं महागिरे-स्तुल्यद्युतींश्चतुरोऽन्यान् ददर्श । स तानभिप्रेक्ष्य बभूव दुःखितः कच्चिन्नाहं भविता वै यथेमे ।। २० ।।
उन्होंने उस महान् पर्वतकी कन्दराका द्वार खोलकर उसमें अपने ही समान तेजस्वी अन्य चार इन्द्रोंको भी देखा। उन्हें देखकर वे बहुत दुखी हुए और सोचने लगे- 'कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मैं भी इन्हींके समान दुर्दशामें पड़ जाऊँ' ।। २० ।।
ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच । दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो यन्मां बाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ।। २१ ।।
तब पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजीने आँखें तरेरकर कुपित हो वज्रधारी इन्द्रसे कहा- 'शतक्रतो! तुमने मूर्खतावश पहले मेरा अपमान किया है, इसलिये अब इस
कन्दरा में प्रवेश करो' ।। २१ ।।
क्रमशः...
साभार– पं देव शर्मा🔥
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