2122 2122 2122
खो दिया है जिसको पाना चाहता हूँ
फिर गले उस को लगाना चाहता हूँ
रात उतरा शाख पर जो फूल मेरी
अपने आँगन में सजाना चाहता हूँ
बस गई है जो महक अहसास में वो
फिर से पा कर मुस्कराना चाहता हूँ
वो तेरा इतराना , रातों को मचलना
उन लबो का वो तराना चाहता हूँ
जो चमन वीराँ है बिन खुश्बू के तेरी
उस चमन को फिर बसाना चाहता हूँ
शाखजो जख्मी है बिन गुलाब के अब
फूल फिर उस पे खिलाना चाहता हूँ
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
31/1/2018
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