नारद मुनि जयंती की शुभ कामना

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sn vyas
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#🪕देवर्षी नारद जयंती🙏 #नारद जयंती की जन्म कथा #नारद मुनि जयंती की शुभ कामना . *नारद जयंती (ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया)* `मैं देवर्षियों में नारद हूं : श्रीकृष्ण` _देवर्षि नारद भगवान के विशेष कृपापात्र और लीला-सहचर हैं। भगवान के अवतरण के समय ये उनकी लीला के लिए भूमिका तैयार करते हैं।_ श्रीमद्भगवद् गीता के दशम अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं- *अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।* - "मैं समस्त वृक्षों में पीपल (अश्वत्थ) हूं. और देवर्षियों में नारद हूं।" ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार नारद मुनि का जन्म ब्रह्माजी के कंठ से ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ। भक्ति मार्ग के प्रणेता नारदजी ने दक्ष प्रजापति के दस हजार पुत्रों को संसार से निवृत्ति की शिक्षा दी। इससे क्रुद्ध होकर दक्ष प्रजापति ने नारद को शाप दिया कि वह दो घड़ी से ज्यादा कहीं टिक नहीं पाएंगे, इसलिए वे तीनों लोकों में हमेशा विचरण करते रहते हैं। *ब्रह्माजी भी दक्ष प्रजापति के पुत्रों को सृष्टिमार्ग पर अग्रसर करना चाहते थे, लेकिन नारदजी ने दक्ष प्रजापति के पुत्रों को संन्यास मार्ग की ओर प्रेरित किया। इससे क्रोधित होकर ब्रह्माजी ने भी नारद को गंधमादन पर्वत पर उपबर्हण नाम के गंधर्व के रूप में जन्म लेने का शाप दिया । उपबर्हण की साठ पत्नियां थीं। रूपवान होने के कारण वे हमेशा सुंदर स्त्रियों से घिरे रहते थे। उनके अशिष्ट आचरण से क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी ने उन्हें फिर से शूद्र योनि में जन्म लेने का शाप दिया। शाप के फलस्वरूप उनका दासी पुत्र के रूप में जन्म हुआ। वे अपनी माता के साथ साधु-संतों की सेवा करते थे, जिससे प्रसन्न होकर साधुओं उन्हें भगवद् भक्ति का उपदेश दिया। कुछ समय पश्चात उनकी मां की सर्प दंश से मृत्यु हो गई। एक दिन वह पीपल के वृक्ष के नीचे भक्ति में लीन थे, तभी उन्हें अपने हृदय में भगवान की झलक दिखाई दी और आकाशवाणी हुई- 'हे पुत्र ! अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद के रूप में जन्म लोगे !'* देवर्षि नारद भगवान के विशेष कृपापात्र और लीला-सहचर हैं। जब-जब भगवान का अवतरण होता है, ये उनकी लीला के लिए भूमिका तैयार करते हैं। नारद मुनि के शाप के कारण ही राम को देवी सीता से वियोग सहना पड़ा था। नारद की प्रेरणा से ही भृगु कन्या लक्ष्मी का विवाह विष्णु के साथ हुआ। इन्होंने ही महादेव द्वारा जलंधर का वध करवाया। वाल्मीकि को रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी। कंस के विनाश के लिए उसे आकाशवाणी का अर्थ समझाया। महर्षि वेदव्यास से महाभारत की रचना करवाई। प्रह्लाद और ध्रुव को उपदेश देकर महान भक्त बनाया। देवर्षि नारद वेदव्यास, वाल्मीकि और शुकदेव के गुरु भी हैं। ऐसे गुरु नारद जी को हम प्रणाम करते हैं। *जय जय सियाराम 🙏🏻🙏🏻*
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sn vyas
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#नारद जयंती #🌹महर्षी नारद मुनी जयंती 2023🌹 #नारद मुनि जयंती की शुभ कामना #🪕देवर्षी नारद जयंती🙏 #नारद जयंती 🌸🌸🔥🔥 नारद मुनि की कहानी केवल एक संदेशवाहक की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास और एक साधारण दासी पुत्र से "देवर्षि" बनने की अद्भुत यात्रा है। 1. पूर्व जन्म: एक दासी पुत्र का संघर्ष श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, पिछले कल्प में नारद जी एक साधारण दासी के पुत्र थे। उनकी माता एक ब्राह्मण परिवार में सेवा करती थीं। एक बार चातुर्मास (वर्षा ऋतु के चार महीने) के दौरान कुछ महान संत और ऋषि उस स्थान पर ठहरे। सेवा और संस्कार:बालक नारद ने उन संतों की तन-मन से सेवा की। वे संतों के भोजन के बाद बचा हुआ भोजन (प्रसाद) ग्रहण करते थे, जिससे उनके हृदय के विकार मिट गए और उनकी बुद्धि शुद्ध हो गई। ज्ञान की प्राप्ति:संतों की सत्संगत से उनके मन में भगवान विष्णु के प्रति गहरा प्रेम जागृत हुआ। जाते समय ऋषियों ने उन्हें "नारायण" के गुप्त नाम और ध्यान की विधि सिखाई। वैराग्य: कुछ समय बाद एक सर्प के डसने से उनकी माता की मृत्यु हो गई। बालक नारद ने इसे ईश्वर की इच्छा माना और सब कुछ त्याग कर उत्तर दिशा की ओर घने जंगलों में चले गए। 2. दिव्य दर्शन और आकाशवाणी जंगल में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर नारद जी ने भगवान का ध्यान शुरू किया। अचानक उनके हृदय में भगवान की एक क्षणिक झलक दिखाई दी और वे परमानंद में डूब गए। लेकिन अगले ही पल वह छवि ओझल हो गई। नारद व्याकुल हो गए। तब एक आकाशवाणी हुई: "हे बालक! इस जन्म में तुम मेरे दर्शन फिर से नहीं कर पाओगे। मैंने अपनी झलक तुम्हें केवल इसलिए दिखाई ताकि मुझमें तुम्हारी प्रीति बढ़ जाए। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद बनोगे।" बाकी का जीवन नारद जी ने भगवान के कीर्तन में बिताया और अंत में समय आने पर उन्होंने अपना पांचभौतिक शरीर त्याग दिया। 3. ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में पुनर्जन्म सृष्टि के नए कल्प की शुरुआत में, भगवान की माया से वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने उन्हें सृष्टि के विस्तार (संतान उत्पत्ति) की आज्ञा दी, लेकिन नारद जी ने मना कर दिया क्योंकि वे केवल भक्ति मार्ग पर चलना चाहते थे। इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें गन्धर्व (उपबर्हण) बनने का श्राप दिया। गन्धर्व रूप में वे कामवासना और गायन में डूबे रहे। बाद में अपनी गलती का एहसास होने और श्राप मुक्ति के बाद, वे पुनः दिव्य ऋषि के रूप में प्रकट हुए। 4. 'महती' वीणा और नारद का कार्य भगवान विष्णु ने स्वयं नारद जी को 'महती' नाम की वीणा भेंट की। नारद जी को यह वरदान है कि वे तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) में कहीं भी कभी भी बिना किसी रोक-टोक के जा सकते हैं। 5. नारद जी के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मोड़ दक्ष प्रजापति का श्राप: नारद जी ने राजा दक्ष के हजारों पुत्रों को गृहस्थ जीवन त्याग कर संन्यास की राह पर भेज दिया। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने श्राप दिया कि "तुम कभी भी एक स्थान पर दो घड़ी (करीब 48 मिनट) से ज्यादा नहीं ठहर सकोगे।" यही कारण है कि नारद जी हमेशा घूमते रहते हैं। भक्ति के मार्गदर्शक: उन्होंने ही ध्रुवको कठोर तपस्या सिखाई, प्रहलादको गर्भ में ही ज्ञान दिया और वाल्मीकि को 'मरा-मरा' जाप करने की सलाह दी जिससे वे महान कवि बने। श्रीमद्भागवत की रचना:जब महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के बाद भी मानसिक शांति नहीं पा रहे थे, तब नारद जी ने ही उन्हें भगवान की लीलाओं (श्रीमद्भागवत) को लिखने की प्रेरणा दी। नारद जयंती हमें सिखाती है कि ज्ञान और सूचना का उपयोग हमेशा दूसरों के कल्याण के लिए होना चाहिए। नारद जी का 'कलह' दरअसल अहंकार को तोड़ने और धर्म को स्थापित करने का एक तरीका था।
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