राधा के बकेबिहारी #@ राधे राधे #

25 Posts • 13K views
sn vyas
3K views 19 days ago
#राधे कृष्ण कहा करूं बैकुंठ लै, कहा मुक्ति की चाह: भक्त कहता है कि हे किशोराधेकरी जी! मुझे उस स्वर्ग या बैकुंठ धाम को लेकर क्या करना है, जहाँ हर प्रकार के वैभव तो हैं, लेकिन आपकी यह रसमय भक्ति नहीं है? मुझे जन्म-मरण के चक्र से छूटने यानी 'मुक्ति' (मोक्ष) की भी कोई अभिलाषा नहीं है। क्योंकि भक्त के लिए मुक्ति का अर्थ प्रभु से दूर होना नहीं, बल्कि उनके प्रेम में डूबे रहना है। मोहे देहु श्री राधिके, चरन कमल की छाह: मेरी केवल एक ही अंतिम और परम इच्छा है कि मुझे सदैव आपके इन परम पावन, अत्यंत कोमल और करुणामयी चरण कमलों की शीतल छाया प्राप्त रहे। आपके चरणों की शरण में जो परम आनंद और शांति है, वह संसार या स्वर्ग के किसी भी सुख में नहीं है। मूल भाव (निष्कर्ष): इस दोहे का मूल भाव 'अनन्य शरणागति' और 'निष्काम प्रेम' है। भक्त भगवान से धन, ऐश्वर्य, स्वर्ग या मोक्ष नहीं मांगता; वह केवल और केवल श्री राधा रानी के चरणों में नित्य निवास और उनकी सेवा की याचना करता है। ब्रज रस में माना जाता है कि यदि श्री राधा जी की कृपा मिल जाए, तो साक्षात भगवान श्री कृष्ण स्वतः ही सुलभ हो जाते हैं।
104 likes
1 comment 52 shares