sn vyas
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# बालाजी कलयुग अवतारी #कलयुग ॥ जब धर्म अत्यंत क्षीण होगा, तब भगवान् कल्कि का अवतार होगा ---
सनातन धर्म के शास्त्रों में युग-चक्र का वर्णन केवल समय की गणना के रूप में नहीं, बल्कि धर्म की स्थिति और उसके उत्थान-पतन के संदर्भ में भी मिलता है।
कलियुग के विषय में श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कन्ध में बताया गया है कि काल के प्रभाव से धर्म, सत्य, शौच, क्षमा, दया, आयु तथा सदाचार आदि का क्रमशः ह्रास होता जाएगा। राजा और शासक प्रजा के रक्षक न रहकर स्वार्थ एवं अत्याचार में प्रवृत्त हो सकते हैं और समाज में धर्म-विहीनता बढ़ती जाएगी।
अर्थात् कलियुग का चरम केवल बाहरी संघर्ष का नाम नहीं, बल्कि धर्माचरण, सत्य, सदाचार और वैदिक मर्यादाओं के क्रमशः क्षीण होने की स्थिति है।
इसी कलियुग के अंतिम चरण के संबंध में श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान् कल्कि के अवतार की स्पष्ट घोषणा मिलती है—
शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।
भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति ॥
अर्थात् शम्भल ग्राम के श्रेष्ठ एवं महात्मा ब्राह्मण विष्णुयशा के भवन में भगवान् कल्कि प्रकट होंगे।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि शास्त्रीय पाठ में “उत्तर प्रदेश का संभल गाँव” ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं है। मूल श्लोक में “शम्भल ग्राम” कहा गया है। इसलिए प्रमाणिक लेख में केवल “शम्भल ग्राम” कहना अधिक सुरक्षित और शास्त्रसम्मत है।
भगवान् कल्कि के स्वरूप और उनके कार्य का वर्णन आगे भी मिलता है। श्रीमद्भागवत महापुराण कहता है—
अश्वमाशुगमारुह्य देवदत्तं जगत्पतिः ।
असिनासाधुदमनमष्टैश्वर्यगुणान्वितः ॥
अर्थात् जगत्पति भगवान् कल्कि देवदत्त नामक शीघ्रगामी अश्व पर आरूढ़ होकर और हाथ में तलवार धारण करके असाधुओं का दमन करेंगे।
यहाँ भी एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी आवश्यक है।
आजकल प्रचलित अनेक कथाओं में कहा जाता है कि भगवान् परशुराम ने भगवान् कल्कि को घोड़ा और तलवार प्रदान की थी। लेकिन श्रीमद्भागवत महापुराण में ऐसा नहीं कहा गया है।
भगवान् परशुराम को कल्कि का गुरु मानने का विस्तृत प्रसंग कल्कि पुराण में मिलता है। उसमें भगवान् कल्कि द्वारा भार्गव परशुराम से वेद, वेदाङ्ग तथा धनुर्वेद आदि की शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन है।
इसके पश्चात् कल्कि पुराण के वर्णन में भगवान् कल्कि भगवान् शिव की आराधना करते हैं और उनसे दिव्य वर प्राप्त करते हैं। उसी प्रसंग में उन्हें वायु के समान वेग वाला देवदत्त अश्व तथा वज्रसार की तलवार प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
अतः शास्त्रीय रूप से बात इस प्रकार समझनी चाहिए—
परशुराम — भगवान् कल्कि के गुरु के रूप में;
भगवान् शिव — दिव्य वरदाता के रूप में;
देवदत्त अश्व और दिव्य खड्ग — भगवान् कल्कि के अवतारी कार्य के साधन के रूप में।
भगवान् कल्कि का उद्देश्य किसी व्यक्तिगत वैर की पूर्ति नहीं, बल्कि अधर्म का क्षय और धर्म की पुनः प्रतिष्ठा है।
विष्णु पुराण के कल्कि-वर्णन में भी कलियुग के अंतिम चरण में धर्म के अत्यंत क्षीण होने के बाद भगवान् विष्णु के कल्कि रूप में प्रकट होने, दुष्टों के विनाश तथा वैदिक धर्माचरण की पुनः स्थापना का वर्णन मिलता है। इसके पश्चात् कृतयुग की पुनः प्रवृत्ति का उल्लेख भी किया गया है।
इसलिए कल्कि-अवतार का संदेश केवल इतना नहीं कि भविष्य में कोई दिव्य योद्धा आएगा।
इसका व्यापक आध्यात्मिक संदेश यह है कि जब अधर्म अपनी सीमा तक पहुँचता है, तब धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिए भगवान् का अवतार होता है।
कलियुग चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न दिखाई दे, सनातन दृष्टि में अधर्म अंतिम सत्य नहीं है।
धर्म शाश्वत है।
सत्य शाश्वत है।
और भगवान् की धर्मसंस्थापन की शक्ति भी शाश्वत है।
इसीलिए कल्कि-अवतार की कथा भय की नहीं, बल्कि धर्म की अंतिम विजय में आस्था की कथा है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान् कल्कि के प्राकट्य के साथ अधर्मियों का दमन होगा और धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की दिशा में युग-परिवर्तन का क्रम आरम्भ होगा। विष्णु पुराण भी कलियुग के अंत के पश्चात् कृतयुग की पुनः प्रवृत्ति का संकेत देता है।
इसलिए सनातन धर्मावलम्बी के लिए कल्कि-अवतार का स्मरण केवल भविष्य की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि वर्तमान में भी एक संदेश है—
धर्म का साथ छोड़कर धर्म की रक्षा नहीं हो सकती।
सत्य का त्याग करके सत्ययुग की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
और सनातन मर्यादाओं की उपेक्षा करके धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की कल्पना नहीं की जा सकती।
भगवान् कल्कि के अवतार का शास्त्रीय वर्णन हमें यह स्मरण कराता है कि युग बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, किन्तु धर्म का सनातन सिद्धान्त कभी समाप्त नहीं होता।
॥ धर्मो रक्षति रक्षितः ॥
॥ हर हर शंकर, जय जय शंकर ॥ श्री नारायणाय नमः॥
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