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रामायण ज्ञान

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sn vyas
567 views • 6 days ago
#☝अनमोल ज्ञान #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #रामायण महाभारत #रामायण ज्ञान कभी-कभी हम अपने जीवन में कुछ ऐसे लोगों से मिलते हैं जो अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार होता है, अपने दायित्व को पूरी निष्ठा और मेहनत से निभाता है, अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटता और वास्तव में उसके भीतर बहुत सारे अच्छे गुण होते हैं। लेकिन एक छोटी सी कमी उनके इन सभी गुणों पर भारी पड़ जाती है - वह है उसका क्रोध। ऐसे लोग बुरे नहीं होते, लेकिन उनका क्रोध उन्हें दूसरों की नजर में बुरा बना देता है। किसी ने उनकी बात नहीं मानी तो उन्हें लगता है कि सामने वाला उनकी बात की कद्र नहीं करता। किसी ने उनकी बात का विरोध किया तो लगता है कि वह उनके खिलाफ है। कोई काम उनकी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ तो उन्हें लगता है कि सब कुछ गलत हो रहा है। और फिर क्रोध आता है, शब्द कठोर होते हैं, व्यवहार बदल जाता है और देखते ही देखते वर्षों से बने संबंधों में दरार पड़ जाती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि क्रोध समाप्त होने के बाद वही व्यक्ति जब शांत होता है तो उसे अपनी गलती दिखाई देती है। वह मान भी लेता है कि हाँ, मुझे इतना क्रोधित नहीं होना चाहिए था। लेकिन तभी अहंकार एक दूसरी दीवार खड़ी कर देता है। गलती मेरी अकेले की तो थी नहीं... उसने भी मुझे गुस्सा दिलाया था, फिर मैं ही माफी क्यों मांगूं? और यहीं से एक छोटी सी गलती बड़ा संबंध-विच्छेद बन जाती है। श्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड में जब भरतजी के आने का समाचार सुनकर लक्ष्मणजी के मन में क्रोध उत्पन्न होता है, उस प्रसंग में गोस्वामी तुलसीदास जी हमें एक बहुत बड़ी सीख देते हैं , गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।। सहसा करि पाछे पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।। अर्थात -कोई भी कार्य हो, उसे उचित-अनुचित अच्छी तरह समझ-बूझकर करना चाहिए। वेद और विद्वान कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना विचारे जल्दबाजी में कोई कार्य कर बैठता है और बाद में पछताता है, वह बुद्धिमान नहीं है। जरा विचार कीजिए... क्रोध में हम अक्सर वही करते हैं जो शांत अवस्था में कभी नहीं करते। क्रोध में बोले गए शब्द वापस नहीं आते। क्रोध में किया गया अपमान भूलना आसान नहीं होता। क्रोध में लिया गया निर्णय कई बार वर्षों के संबंध को समाप्त कर देता है। और सबसे बड़ी बात - क्रोध के समय हमें सामने वाले की गलती दिखाई देती है, अपनी नहीं। हम कहते हैं -उसने मुझे गुस्सा दिलाया। लेकिन क्या वास्तव में किसी दूसरे व्यक्ति के पास हमारे क्रोध की चाबी होनी चाहिए? किसी ने कुछ कहा, वह उसके संस्कार और उसकी परिस्थिति थी। हमने उस बात को किस रूप में लिया, वह हमारे संस्कार और हमारी मानसिक अवस्था है। किसी का हमारी बात न मानना यह प्रमाण नहीं है कि वह हमारा विरोधी है। किसी का हमसे असहमत होना यह प्रमाण नहीं है कि वह हमारा अपमान कर रहा है। और हर काम हमारे मन के अनुसार न होना यह भी आवश्यक नहीं कि सब कुछ गलत हो रहा है। जीवन में संबंध वहीं अच्छे रहते हैं जहाँ केवल प्रेम नहीं, बल्कि दूसरे की स्वतंत्रता और असहमति को स्वीकार करने की क्षमता भी होती है। हम अक्सर अपने अच्छे गुणों पर गर्व करते हैं - मैं ईमानदार हूँ, मेहनती हूँ, अपने काम के प्रति समर्पित हूँ, दूसरों के लिए बहुत कुछ करता हूँ। लेकिन चरित्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब कोई हमारी बात नहीं मानता। जब कोई हमें टोकता है। जब कोई हमसे असहमत होता है। जब परिस्थिति हमारे अनुसार नहीं होती। उस समय हम अपने व्यवहार को कितना नियंत्रित कर पाते हैं, यही हमारे व्यक्तित्व की वास्तविक परीक्षा है। रामायण हमें यही सिखाती है कि शक्ति केवल अपनी बात मनवा लेने में नहीं है। शक्ति अपनी प्रतिक्रिया को रोक लेने में भी है। लक्ष्मणजी स्वयं अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और श्रीराम के प्रति पूर्ण समर्पित थे। लेकिन रामचरितमानस हमें उनके क्रोध के प्रसंग के माध्यम से यह भी सिखाता है कि महान व्यक्ति भी भावावेश में आ सकते हैं। महानता इस बात में है कि विवेक उस भावावेश पर विजय प्राप्त करे। और एक बात हमें अपने जीवन में विशेष रूप से समझनी चाहिए -माफी मांगना हमेशा यह स्वीकार करना नहीं होता कि गलती केवल हमारी थी। कई बार माफी इसलिए मांगी जाती है क्योंकि हम उस संबंध को अपने अहंकार से अधिक महत्व देते हैं। आप कह सकते हैं -मुझसे भी गलती हुई। तुम्हारी बात से मुझे दुख हुआ, लेकिन जिस तरह मैंने प्रतिक्रिया दी, वह सही नहीं था। यह वाक्य आपको छोटा नहीं करता। बल्कि आपके चरित्र को बड़ा करता है। क्योंकि अहंकार कहता है - पहले वह माफी मांगे। संस्कार कहते हैं - मैं अपनी गलती स्वीकार करने में देर क्यों करूं? अहंकार हिसाब रखता है कि किसने कितनी गलती की। प्रेम केवल यह देखता है कि संबंध कैसे बचाया जाए। और यही कारण है कि कई बार दो अच्छे लोग भी केवल इसलिए एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं क्योंकि दोनों अपनी-अपनी जगह सही होने के प्रमाण खोजते रहते हैं, लेकिन संबंध बचाने के लिए एक कदम पीछे हटने को तैयार नहीं होते। हमें यह भी समझना होगा कि हर बहस जीतना आवश्यक नहीं है। हर बात साबित करना आवश्यक नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी बात समझाना आवश्यक नहीं है। और हर गलती का जवाब उसी तीव्रता से देना भी आवश्यक नहीं है। कभी-कभी मौन किसी बहस से बड़ा उत्तर होता है। कभी-कभी कुछ समय के लिए पीछे हट जाना किसी रिश्ते को टूटने से बचा लेता है। और कभी-कभी केवल इतना कहना -चलो, अभी हम दोनों शांत हो जाएं, फिर बात करेंगे। एक पूरे संबंध को बचा सकता है। श्रीराम का जीवन हमें मर्यादा सिखाता है और श्री रामचरितमानस हमें बार-बार यह स्मरण कराती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं, स्वयं पर होती है। क्रोध आएगा। अपेक्षाएं होंगी। लोग हमारी बात नहीं मानेंगे। हमसे असहमति भी होगी। कभी-कभी सामने वाला वास्तव में गलत भी होगा। लेकिन हर बार अपनी प्रतिक्रिया का निर्णय हमें स्वयं करना है। क्योंकि सामने वाले की गलती हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उस गलती के प्रति हमारा व्यवहार हमारे हाथ में अवश्य है। इसलिए अगली बार जब क्रोध आए तो केवल यह मत सोचिए कि,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? एक बार यह भी पूछिए -मैं इस परिस्थिति में स्वयं को किस रूप में देखना चाहता हूँ? क्योंकि क्रोध के उस एक क्षण में हम सामने वाले को नहीं, अपने चरित्र को प्रकट कर रहे होते हैं। और अंत में रामचरितमानस की वही सीख याद रखिए -सहसा करि पाछे पछिताहीं... जो काम सोच-समझकर किया जा सकता है, उसे क्रोध में करने की आवश्यकता ही क्या है? रिश्ते बहुत कठिनाई से बनते हैं और कई बार केवल कुछ कठोर शब्दों में टूट जाते हैं। इसलिए क्रोध को जीतना केवल अपने स्वभाव को बदलना नहीं है। यह अपने रिश्तों को बचाना है, यह अपने भीतर के अहंकार को थोड़ा छोटा करना है और शायद यही सच्चे अर्थों में स्वयं पर विजय है। 🚩जय सियाराम🚩 🚩जय श्रीराम🚩 #रामायण कथा
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