sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_४१/१
योग: कर्मसु कौशलम् :*
योग की परिभाषा स्पष्ट करते हुए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि----
*योग: कर्मसु कौशलम ।*
*अपना कर्म कुशलतापूर्वक करने का नाम ही योग है।*
*प्रारब्ध वशात् व्यक्ति के जीवन में जो कर्म सुनिश्चित हो, उसे वह व्यक्ति कुशलतापूर्वक करें , तो उसने योग किया कहलाता है ।*
*एक दर्जी कुर्ते की सुंदर सिलाई करता है , उसमें दोनों हाथों की आस्तीन समान हो, न एक हाथ की आस्तीन लंबी हो , न दूसरे हाथ की आस्तीन छोटी हो , माप के अनुसार ही सिलाई की हो और उसमें उसने अपनी कुशलता का उपयोग किया हो तो उसने योग किया माना जाता है।*
*एक चमार अपने ग्राहक का जूता ठीक से सिले और उसे पहनने से ही ग्राहक खुश हो जाए । ऐसी दक्षता और कुशलता से वह जूता बनाएगा तो उसने योग किया माना जाएगा ।*
*जब आप चलते हैं तब ऐसी दक्षता से चलें कि आपको ठोकर न लगे , तो आपने योग किया माना जाता है ।*
*आप पानी पिये तो ऐसे धीरज के साथ और स्थिर वृत्ति से पीये कि आपको हिचकी न आए तो आपने योग किया माना जाता है ।*
*आप कथा सुनने जाते हैं या कोई पुस्तक पढ़ते हैं , उस समय एकाग्रचित्त से सुने या पढे और इधर-उधर न देखें तो आपने योग किया कहलाता है।*
*इसी प्रकार जीवन का प्रत्येक कर्म कुशलतापूर्वक स्थिर मनोवृत्ति से करें तो आप योग करते हैं , यह माना जाएगा।*
क्रमश: ✍🏽
#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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