यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्र्वरम् |
असम्मूढ़ः स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || ३ ||
जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित सब लोको के महान ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है, वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान है अर्थात अज, अनादि और सर्वलोक महेश्वर को भली प्रकार जानना ही ज्ञान है और ऐसा जानने वाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/१०/३
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
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