समुद्र मंथन के लिए मन्दराचल पर्वत को देव और दानवों ने मिलकर उखाड़ लिया और गरजते हुए समुद्र की और चलने लगे। मन्दराचल बहुत भारी था और उसे लेकर भी बहुत दूर जाना था। देव और दानव बीच में थक कर इस पर्वत को छोड़ दिया। इन लोगों का उत्साह भी मंद पड़ गया था। यह देख कर गरुड़ पर चढ़े हुए भगवान सहसा वहां प्रकट हुए और उन्होंने खेल ही खेल में एक हाथ से उस पर्वत को उठा कर गरुड़ पर रख लिया और स्वयं भी सवार हो गए। पक्षिराज गरुड़ ने समुद्र के तट पर पर्वत को उतार दिया। फिर भगवान् के विदा करने पर गरुड़ जी वहां से चले गये।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/६/३२-३९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/6)32-39
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