मृत प्राणीके लिये आत्मीयजनोंको भूलकर भी रोना नहीं चाहिये। अपितु उसकी सद्गतिके लिये भगवत्स्मरणपूर्वक यथाशक्ति और्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिये। रोने से जो आँसू आदि निकलते हैं वे ही उस प्राणीको खाने पड़ते हैं-
गरुडपुराण/प्रेतखण्ड/१५/५८
कपालक्रियाके अनन्तर ही जोरसे रोनेका शास्त्रने विधान किया है, उससे मृत प्राणीको सुख मिलता है।
गरुड़पुराण/सारोद्धार/१०/५६
गरुड़-पुराण/प्रेतखण्ड/15/58
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