अधिक निद्रा अधर्म का मूल है। निद्रा पाप बढ़ाने वाली है। निद्रा दरिद्रता की जननी है तथा कल्याण का नाश करने वाली है। निद्रा के वश में रहना वाला राजा अधिक दिनों तक पृथ्वी का शासन नही कर सकता। निद्रा व्यभिचारिणी स्त्री की भाँति अपने स्वामी के लोक-परलोक दोनों का नाश करने वाली है।
नारदपुराण।उत्तरभाग।१५।२६-२९
नारद-पुराण/उत्तर-भाग/15/26-29
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