नारायण के नाभि कमल से ब्रह्मा हुए। ब्रह्मा के पुत्र हुए अत्रि। अत्री के नेत्रों से चंद्रमा का जन्म हुआ। यहीं से चंद्रवंश की शुरुवात हुई।
इसी चंद्रवंश में पुरुरवा हुए। आगे ययाति हुए। इसी वंश में पुरु हुए और आगे दुष्यंत हुए और दुष्यंत के भरत हुए। भरत के पुत्र भारद्वाज ऋषि हुए। आगे इनके वंश में मुद्गल राजा हुए उनके जुड़वां सन्तान हुई। पुत्र दिवोदस और पुत्री अहल्या। अहल्या का विवाह गौतम ऋषि से हुआ। (यही रामायण वाली अहल्या थी) गौतम का शतानंद हुआ। शतानंद का पुत्र स्त्यधृति इसका पुत्र शरद्वान हुआ। एक बार उर्वशी को देख कर शरद्वान का वीर्य मूंज के झाड़ पर गिर पड़ा, उससे एक शुभ लक्षण वाले पुत्र और पुत्री का जन्म हुआ। महाराज शांतनु की उस पर दृष्टि पड़ गयी, उन्होंने दयावश दोनों को उठा लिया। उनमें जो पुत्र था, उसका नाम कृपाचार्य हुआ और कन्या का नाम कृपी हुआ। यही कृपी द्रोणाचार्य की पत्नी हुई।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/९/१४-२१
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