भगवान ऋषभ देव जी अपनी सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं:
"दूसरे किसी भी प्राणीको मैं ब्राह्मणोंके समान भी नहीं समझता, फिर उनसे अधिक तो मान ही कैसे सकता हूँ। लोग श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंके मुखमें जो अन्नादि आहुति डालते हैं, उसे मैं जैसी प्रसन्नतासे ग्रहण करता हूँ वैसे अग्निहोत्रमें होम की हुई सामग्रीको स्वीकार नहीं करता।"
श्रीमद्भागवत-महापुराण/५/५/२३
श्रीमद्भागवत-महापुराण/5/5/23
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