श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण किया। दुर्योधन और बाकी कौरवों ने मिलकर साम्ब को पकड़ लिया। यह समाचार जब द्वारका में बलरामजी और बाकी यादवों को मिला तो, वे कौरवों से लड़ने के लिए तैयार हो गए। बलरामजी अकेले ही उनसे बात करने के लिए हस्तिनापुर चल पड़े। हस्तिनापुर के बाहर जाकर उन्होंने उद्धव के द्वारा हस्तिनापुर में संदेशा भिजवाया। कौरवों की और से दुर्योधन, भीष्म, द्रोणाचार्य और काफी लोग आये। यहां पर कौरव बलरामजी का अपमान करके वापस हस्तिनापुर आ जाते हैं। बलरामजी क्रुद्ध होकर अपने हल की नोक से हस्तिनापुर को ही गंगाजी में डुबाने के लिए लेकर चल पड़े। हल से खींचने पर हस्तिनापुर कांपने लगा। सभी कौरव घबराकर साम्ब और लक्ष्मणा को आगे करके बलरामजी से क्षमा मांगने लगे।
हस्तिनापुर आज भी दक्षिण की ओर ऊंचा और गंगाजी की ओर कुछ झुका हुआ है और इस प्रकार यह बलरामजी के पराक्रम की सूचना दे रहा है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६८
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/68
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