द्वारका जाने के बाद एक बाद बलरामजी व्रज में नन्द बाबा और दूसरे गोपों से मिलने के लिए आए। एक बार रात्रि के समय उन्होंने सभी गोपियों को बुलाया और उनके साथ विहार करने लगे। इसी दौरान जलक्रीड़ा के लिए उन्होंने यमुनाजी को पुकारा। यमुनाजी जब उनकी पुकार पर नहीं आई तो बलरामजी को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने उसे अपने हल की नोक से खींचना शुरू कर दिया। ये देखकर यमुनाजी जी उनसे प्रार्थना करी और क्षमा मांगी।
यमुनाजी आज भी बलरामजी के खींचे हुए मार्ग से बहती है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/65
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