एक बार देवगुरु बृहस्पति देवसभा में आए तो, इंद्र ने अपने आसन से उठकर उनका सत्कार नहीं किया। इससे देवगुरु बड़े व्यथित हो गए और उसी समय वहां से चले गए। इंद्र ने उन्हें बहुत ढूंढा पर वह उन्हें नहीं मिले
जब यह समाचार असुरों को मिला तो उन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और उन्हें हरा दिया। इसके बाद देवता ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने बोला कि जिनके साथ गुरु नहीं होते उनका यही हाल होता है और अगर तुम्हें अभी बृहस्पति नहीं मिल रहे हैं तो तुम त्वष्टा के पुत्र विश्व रूप के पास जाओ, उनकी सेवा करो और उनसे गुरु बनने के लिए प्रार्थना करो। तब देवता लोग त्वष्टा पुत्र विश्वरूप के पास गए। उनसे देवगुरु बनने की प्रार्थना करी। विश्वरूप ने उनकी विनती स्वीकार कर ली। विश्वरूप ने देवराज इंद्र को नारायण कवच दिया। उसी नारायण कवच की वजह से देवराज इंद्र ने असुरों को हरा दिया। विश्वरूप के तीन सिर थे। एक मुंह से सोमरस तथा दूसरे सिर से मदिरा और तीसरे सिर से अन्न ग्रहण करते थे। विश्वरूप के पिता त्वष्टा देवता थे लेकिन उनकी माता असुर कुल की थी। इसीलिए वह मातृस्नेह के कारण यज्ञ करते समय एक भाग असुरों को भी देते थे। जब देवराज इंद्र को यह पता चला तो उन्होंने क्रोध में भरकर बड़ी फुर्ती से उसके तीनों सर काट डाले। विश्व रूप का सोमरस पीने वाला सिर पपीहा, सुरापन करने वाला गौरैया और अन्न खाने वाला तीतर हो गया। विश्व रूप का वध करने से उन्हें ब्रह्म हत्या लग गई। जब यह ब्रह्म हत्या एक वर्ष तक उनसे नई छूटी, तब उन्होंने इसके चार हिस्से करके पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों को दे दिया। पृथ्वी को बदले में यह वरदान मिला कि जहां भी गड्ढा होगा, वह समय पर अपने आप भर जाएगा। लेकिन इसके बावजूद पृथ्वी पर कहीं-कहीं ऊसर भूमि दिखाई देती है। एक हिस्सा वृक्षों को दिया और उन्हें यह वरदान भी दिया कि उनका कोई भी हिस्सा कट जाने पर वह फिर से उग जाएगा। कुछ वृक्षों में वह ब्रह्म हत्या गोंद के रूप में दिखाई पड़ती है। स्त्री को यह वर दिया कि वह हमेशा पुरुष का सहवास कर सके लेकिन ब्रह्म हत्या हर महीने उनके रज के रूप में दिखाई पड़ती है। जल को यह वर दिया कि खर्च करते रहने पर भी निर्झर आदि के रूप में बढ़त होती रहेगी लेकिन यह ब्रह्म हत्या फैन या बुद्-बुद् के रूप में दिखाई पड़ती है।
विश्वरूप की मृत्यु के बाद उसके पिता त्वष्टा ने इंद्र का नाश करने के लिए हवन किया और उसे एक बहुत ही भयानक दैत्य निकला। जिसका नाम वृत्रासुर रखा गया। इस वृत्रासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग से भगा दिया। उसके बाद इसी वृत्रासुर का वध करने के लिए दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र का निर्माण कर गया।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/६/७-१०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/6/7-10
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