प्राकृत देह का निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण - इन तीन देहों के संयोग से। जब तक 'कारण शरीर' रहता है, तब तक इस प्राकृत देह से जीव को छुटकारा नहीं मिलता। 'कारण शरीर' कहते हैं पूर्वकृत कर्मों के उन संस्कारों को, जो देह-निर्माण के कारण होते हैं। इस 'कारण शरीर' के आधार पर जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ना होता है और यह चक्र जीव की मुक्ति न होने तक अथवा 'कारण' का सर्वथा अभाव न होने तक चलता ही रहता है। इसी कर्म बन्धन के कारण पांच भौतिक स्थूल शरीर मिलता है - जो रक्त, मांस, अस्थि आदि से भरा और चमड़े से ढका होता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/३३ (व्याख्या)
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/33
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