समुद्र मंथन से निकले अमृत को देवताओं को पिलाने के लिए विष्णुजी मोहिनी अवतार लेते हैं। जब मोहिनी अवतार के बारे में शिवजी को पता चलता है तो शिवजी पार्वती और गणों सहित भगवान् के दर्शनों हेतु गए और उनसे प्रार्थना करी कि उन्हें भी मोहिनी रूप के दर्शन करवाएं। विष्णुजी ने मोहिनी रूप लिया तो शिवजी उस रूप पर इतने मोहित हो गए कि पार्वती और गणों के सामने ही लज्जा छोड़कर उसके पीछे दौड़ने लगे। कामदेव के वेग से उनका वीर्य स्खलित हो गया। भगवान् शंकर का वीर्य पृथ्वी पर जहां-जहां गिरा, वहां-वहां सोने-चांदी की खाने बन गयीं। वीर्यपात होते ही उन्हें अपनी स्मृति हुई। इसके बाद शिवजी ने विष्णुजी की माया को नमस्कार किया और विष्णुजी ने बोला कि आज के बाद उनकी माया शिवजी पर असर नहीं करेगी।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/८/१२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/8/12
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