sn vyas
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7 days ago
#जय श्री राम भगवान श्रीराम की विशाल वानर सेना में एक ऐसी छोटी सी सेविका भी थी, जिसने बिना किसी शक्ति, बिना किसी बल और बिना किसी सामर्थ्य के भी रामकाज में अपना अमूल्य योगदान दिया था? यह कथा उस नन्ही गिलहरी की है, जिसने दुनिया को सिखाया कि भगवान के कार्य में छोटा या बड़ा कोई नहीं होता, केवल भाव और समर्पण ही सबसे बड़ा होता है। जब माता सीता की खोज पूरी हो गई और भगवान श्री राम अपनी सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे, तब लंका तक पहुंचने के लिए समुद्र पर एक विशाल सेतु बनाने का निर्णय लिया गया। चारों ओर हजारों वानर और भालू दौड़ रहे थे। कोई पहाड़ उखाड़कर ला रहा था, कोई विशाल शिलाएं उठा रहा था, तो कोई बड़े-बड़े पत्थरों पर श्री राम का नाम लिखकर समुद्र में डाल रहा था। जैसे ही पत्थर पानी में गिरते, वे डूबने के बजाय तैरने लगते और धीरे-धीरे एक भव्य सेतु का निर्माण होने लगा। समुद्र तट पर हर तरफ उत्साह का वातावरण था। सभी अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार रामकाज में लगे हुए थे। उसी समय वहां एक छोटी सी गिलहरी भी रहती थी। उसने देखा कि भगवान श्री राम के लिए इतने सारे वानर और भालू दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं। उसके मन में भी इच्छा जागी कि वह भी प्रभु की सेवा करे। लेकिन उसके पास न तो वानरों जैसा बल था और न ही बड़े पत्थर उठाने की क्षमता। वह कुछ देर सोचती रही, फिर उसके मन में एक उपाय आया। गिलहरी समुद्र के किनारे दौड़कर जाती, अपने छोटे से शरीर को पानी में भिगोती और फिर रेत में लोट जाती। उसके शरीर पर जितने रेत के कण चिपकते, वह उन्हें सेतु के पास जाकर झाड़ देती। फिर वापस समुद्र की ओर दौड़ती और वही काम दोबारा करती। वह बार-बार यही करती रही। उसके छोटे-छोटे पैरों में थकान थी, लेकिन उसके मन में केवल एक ही भावना थी—मुझे भी अपने प्रभु के कार्य में योगदान देना है। कुछ समय बाद कुछ वानरों की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने देखा कि जहां वे विशाल पर्वत उठा रहे हैं, वहीं यह नन्ही सी गिलहरी रेत के कुछ कण लेकर इधर-उधर दौड़ रही है। कुछ वानर हंसने लगे। एक वानर बोला, “अरे नन्ही गिलहरी! तुम क्या कर रही हो? हमारे इतने बड़े पत्थरों के सामने तुम्हारी यह मुट्ठी भर रेत क्या कर लेगी?” दूसरा वानर बोला, “तुम तो केवल रास्ते में बाधा बन रही हो। हट जाओ यहां से।” सभी वानर उसका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन गिलहरी ने किसी की बात का बुरा नहीं माना। उसने विनम्रता से कहा, “भाइयों, मैं जानती हूं कि मैं आप लोगों जितनी शक्तिशाली नहीं हूं। मैं बड़े पत्थर नहीं उठा सकती। लेकिन यह सेतु केवल आपका नहीं, मेरे प्रभु का कार्य है। इसलिए मैं अपनी शक्ति के अनुसार जो कर सकती हूं, वही कर रही हूं।” इतना कहकर वह फिर से रेत के कण लाने में लग गई। उसी समय भगवान श्री राम की दृष्टि उस गिलहरी पर पड़ी। वे कुछ देर तक उसे ध्यान से देखते रहे। उन्होंने देखा कि जहां बड़े-बड़े योद्धा अपने बल का प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं यह छोटी सी गिलहरी बिना किसी अभिमान के, बिना किसी प्रशंसा की इच्छा के, केवल प्रेम और भक्ति से सेवा कर रही है। भगवान श्री राम मुस्कुराए और उसके पास पहुंच गए। जब वानरों ने देखा कि स्वयं प्रभु उस गिलहरी की ओर जा रहे हैं, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। श्री राम ने प्रेम से गिलहरी को अपनी हथेली पर उठा लिया। गिलहरी डर गई और सोचने लगी कि कहीं उसने कोई गलती तो नहीं कर दी। लेकिन प्रभु ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, “नन्ही गिलहरी, तुम्हारी सेवा मेरे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी इन बड़े-बड़े वानरों की। सेवा का मूल्य उसके आकार से नहीं, उसके भाव से होता है। जो अपने पूरे मन और श्रद्धा से कार्य करता है, वह मेरे लिए सबसे प्रिय होता है।” भगवान श्री राम के यह वचन सुनकर सभी वानरों का सिर शर्म से झुक गया। उन्हें समझ आ गया कि वे केवल बल को महत्व दे रहे थे, जबकि प्रभु तो भाव को देखते हैं। श्री राम ने प्रेमपूर्वक अपनी उंगलियां गिलहरी की पीठ पर फेर दीं। कहते हैं कि प्रभु की उन दिव्य उंगलियों के स्पर्श से उसकी पीठ पर तीन सुंदर धारियां बन गईं। गिलहरी की आंखों से आनंद के आंसू बहने लगे। उसे ऐसा लगा मानो उसे संसार का सबसे बड़ा पुरस्कार मिल गया हो। अब वह और भी अधिक उत्साह से सेवा करने लगी। वानर भी उसका सम्मान करने लगे और उसे अपने साथ रामकाज में शामिल करने लगे। उस दिन से किसी ने उसकी छोटी शक्ति का मजाक नहीं उड़ाया। कहते हैं कि आज भी गिलहरियों की पीठ पर जो धारियां दिखाई देती हैं, वे भगवान श्री राम के करुणामय स्पर्श की स्मृति हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के सामने किसी का आकार, धन, शक्ति या पद महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण होता है केवल सच्चा प्रेम, निस्वार्थ सेवा और निष्कपट भक्ति। जो व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार ईमानदारी से सेवा करता है, भगवान उसे अवश्य स्वीकार करते हैं। इसीलिए जब भी आप किसी छोटे व्यक्ति, छोटे कार्य या छोटी सहायता को महत्वहीन समझें, तो उस नन्ही गिलहरी को याद कीजिए जिसने रेत के कुछ कणों से भी रामसेतु के निर्माण में अपना योगदान दिया था और भगवान श्री राम के हृदय में सदा के लिए स्थान पा लिया था। जय श्रीराम। .