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कबीर परमात्मा की लीलाएं चारों युगों में भक्तों के उद्धार का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
कबीर साहेब का ज्ञान वेदों और संतवाणी में वर्णित आध्यात्मिक रहस्यों को स्पष्ट करता है।
भक्त की सच्ची पुकार पर सहायता करने वाले पूर्ण परमात्मा कबीर हैं।
कबीर साहेब चारों युगों में अलग-अलग नामों से प्रकट होते हैं। सतयुग में कबीर परमेश्वर, विष्णु जी के वाहन पक्षीराज गरुड़ से मिले और उन्हें वास्तविक ज्ञान से परिचित कराया:
ज्ञानी गरुड़ है दास तुम्हारा, तुम बिन नाहीं जीव निस्तारा।
इतना कह गरुड़ चरण लिपटाया, शरण लेवो अविगत राया।।
त्रेतायुग में कबीर परमेश्वर 'मुनीन्द्र' ऋषि के रूप में प्रकट हुए और नल-नील को अपनी शरण में लिया। जब रामचंद्र जी को सीता जी को रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए समुद्र पर पुल बनाना था, तब मुनीन्द्र ऋषि के रूप में कबीर जी ने ही वह पुल बनवाया था:
धन-धन सतगुरु सत कबीर, भक्त की पीर मिटाने वाले।
रहे नल-नील यत्न कर हार, तब सतगुरु से करी पुकार।
जा सत रेखा लिखी अपार, सिंधु पर शिला तिराने वाले।।