gyan ganga

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1K views 4 days ago
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodNightWednesday #किसानमजदूरबचेगा_तभी_देशबचेगा . कबीर साहेब का अद्वितीय तत्वज्ञान हम सभी जानते हैं कि कबीर साहेब आज से लगभग 600 वर्ष पहले इतिहास के भक्तियुग में एक कवी की भूमिका निभाकर गये। उनकी बहुमूल्य एवं अनन्य कबीर वाणी आज भी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। पर वे वास्तव में कौन थे? कबीर साहेब ने पूर्ण परमेश्वर के विषय में क्या ज्ञान दिया?हम क्यों जन्मते मरते है? हमे मारने में किस प्रभू का स्वार्थ है? इस सृष्टि का व् मोक्ष प्राप्ति का वह कौनसा रहस्य है जो अब तक अनसुलझा है? इन सभी सवालों के जवाब स्वयं कबीर परमेश्वर ने आकर दिए। हर युग में परमात्मा कबीर स्वयं ही पूर्ण परमात्मा का संदेशवाहक बनकर आते हैं और अपना तत्वज्ञान सुनाते हैं। इस बात के साक्षी पवित्र वेद, पवित्र कुरान, पवित्र बाइबल, पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब भी हैं। कबीर साहेब ने अपने अनमोल तत्वज्ञान में इस नाशवान लोक के मालिक ब्रह्म/काल की जानकारी दी है, जो प्रतिदिन एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। इस ही वजह से हम सभी प्राणियों का जन्म मरण का चक्कर सदैव चलता रहता है, उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप-पुण्य रूपी जाल में उलझा रखा है, जिस वजह से सभी प्राणी इसके तीन लोक के पिंजरे में कैद है। वह नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने निज घर सतलोक का पता चले। इसलिए वह अपनी त्रिगुणी माया (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। कबीर साहेब जी की वाणी है- कबीर, राम कृष्ण अवतार हैं, इनका नाहीं संसार। जिन साहब संसार किया, सो किनहु न जनम्यां नार।। अर्थात ब्रह्मा जी, विष्णु जी, शिव जी तथा इनके अवतार सभी नाशवान हैं अर्थात जन्म मृत्यु में हैं। (प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत तीसरा स्कंध अध्याय 5 श्लोक 8) त्रिदेवों के पिता ब्रह्म/काल भी नाशवान है। (प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 2 श्लोक 12) केवल पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब- कविर्देव ही अविनाशी परमात्मा हैं, सबके पालनकर्ता हैं। (प्रमाण- यजुर्वेद अध्याय 8 श्लोक 40) कबीर, हाड चाम लहू नहीं मेरे, कोई जाने सतनाम उपासी। तारण तरण अभय पद दाता, मै हूँ कबीर अविनाशी।।” कबीर जी ने यह ज्ञान भी दिया था की जीव का मोक्ष बिना गुरु बनाये नहीं हो सकता, कबीर साहेब ने अपनी अनेकों वाणियों में गुरु की महिमा बताई है। कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।।" सतगुरु अर्थात पूर्ण गुरु से नाम दीक्षा लेकर आजीवन मर्यादा में रहकर भक्ति करने पर शाश्वत स्थान सतलोक को पाया जा सकता है, कबीर जी ने बताया था की सतलोक वह स्थान है जहाँ वे स्वयं सत्पुरुष रूप में विराजमान है। वहाँ रहने वाले मनुष्यों को हंस कहा जाता है, उनके शरीर का प्रकाश भी 16 सूर्यों जितना है। सतलोक में किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है। वहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तथा 3 गुण जीव को दुखी नहीं करते। वहां पर हर एक जीव का अपना महल है तथा अपना विमान है। वहाँ श्वासों से शरीर नहीं चलता। वहाँ जीव अमर है। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में भी यह प्रमाण है की परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सतलोक की स्थापना करके एक गुबंद अर्थात् गुम्बज में सिंहासन पर तेजोमय मानव सदृश शरीर में आकार में विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। कबीर परमेश्वर ने ही बताया है कि एक ब्रह्म/काल का लोक इक्कीस ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, दूसरा परब्रह्म का लोक है जो सात संख ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, तीसरा परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् पूर्ण ब्रह्म कबीर परमेश्वर का ऋतधाम अर्थात् सतलोक है। जो की पूर्ण मोक्ष स्थान है। कबीर जी का बताया तत्वज्ञान वास्तव में अद्वितीय व अनमोल है जो पूर्णतः शास्त्र प्रमाणित है, इस ही अनमोल सत्य ज्ञान व सतभक्ति मन्त्रों से जीव का मोक्ष संभव है, जो की वर्तमान में सतगुरु रामपालजी महाराज बता रहें। Farmers Savior SantRampalJi
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669 views 4 days ago
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodNightWednesday #किसानमजदूरबचेगा_तभी_देशबचेगा . कबीर साहेब का अद्भुत ज्ञान आज तक हमने हमारे सभी धर्म गुरुओं से व लोकवेद के आधार से यही सुना है कि कबीर साहेब जी एक भक्त संत कवि या फिर एक आम इंसान थे। जबकि सच्चाई कुछ और ही है जो हमें आज पता चला है कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा सर्व सृष्टि रचनहार कुल मालिक हैं इस आवश्यक जानकारी से हम कोसों दूर रहे और अपने मनुष्य जीवन व्यर्थ करते रहे हमारे धर्म गुरुओं ने भी हमारे शास्त्रों को ठीक से नहीं समझा। कबीर साहेब जी 600 वर्ष पहले भारतवर्ष में काशी नगर में शिशु रुप में प्रकट हुए थे और सन् 1398 से 1518 तक 120 वर्ष तक अपनी लीला करके गए अपने द्वारा रची गई सृष्टि की जानकारी ठीक ठीक बताकर गये और अपना ज्ञान हम सभी जीवों के उद्धार हेतु बताकर गये। कबीर साहेब ने हमे अक्षर पुरुष, क्षर पुरुष और तीनों देवता की स्थिति का वर्णन इस वाणी के द्वारा समझाया है। कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। तीनों देवा शाखा हैं, ये पात रूप संसार।। जिसका प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में यथार्थ मिलता है। कबीर परमेश्वर ने ही यथार्थ ज्ञान बताया कि ब्रह्मा विष्णु महेश की जन्म और मृत्यु होती है, ये अविनाशी नहीं हैं। यही प्रमाण श्रीमद्देवी भागवत पुराण, स्कंद 3, अध्याय 5 में है। कबीर परमेश्वर ने बताया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भी जन्म तथा मृत्यु होती है। इनकी माता दुर्गा तथा पिता काल (ब्रह्म) है। कबीर, मां अष्टंगी पिता निरंजन, ये जम दारुण वंशन अंजन। तीन पुत्र अष्टंगी जाए, ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराए।। हम सभी के मन में एक सवाल अवश्य घर करता रहा है कि आखिर हमारी जन्म मृत्यु क्यों और किसलिए होती हैं और इसके पीछे किसका हाथ है और इस जानकारी से भी कबीर साहेब ने ही हमें अवगत कराया कि हमें जन्म देने व मारने में काल (ब्रह्म) प्रभु का स्वार्थ है जोकि श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में कहता है कि मैं बढ़ा हुआ काल हूँ अर्जुन। परमात्मा कबीर साहेब जी ने ही हमे बताया है कि संसार में करोड़ों नाम (मंत्र) हैं उनसे मुक्ति नहीं होती, सारनाम से ही मुक्ति होती है लेकिन उस मंत्र को कोई नहीं जानता। उस मंत्र को सिर्फ तत्वदर्शी संत ही बता सकता है। कबीर, कोटि नाम संसार में, इनसे मुक्ति ना होय। सारनाम मुक्ति का दाता, वाको जाने न कोय।। कबीर परमेश्वर जी ने गुरू और सतगुरू में भेद बताया तथा सच्चे गुरु के लक्षण बताए। सतगुरु के लक्षण कहूं, मधूरे बैन विनोद। चार वेद षट शास्त्र, कहै अठारा बोध।। कबीर साहेब जी ने तत्वज्ञान दिया कि मानव जीवन में सतगुरु बनाकर भक्ति करना परमावश्यक है। सच्चे गुरु की शरण में जाकर दीक्षा लेने से ही पूर्ण लाभ मिलेगा, अन्यथा मानव जीवन बर्बाद है। वर्तमान में पूर्ण सतगुरु केवल संत रामपाल जी महाराज ही हैं। उनसे सतभक्ति प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करें। Farmers Savior SantRampalJi
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-roshni
838 views 1 days ago
#शराब_पीना_महापाप संत रामपाल जी महाराज के शिष्य नशे को हाथ तक नहीं लगाते, जो उनकी शिक्षाओं का #🙏गुरु महिमा😇 प्रभाव है। क्योंकि संत रामपाल जी बताते हैं: गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, सुरा पान से हेत। गोश्त मट्टी खाय कर, जंगली बनें प्रेत।। #gyan ganga
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741 views 1 days ago
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . भक्ति व साधना राजा बीर सिंह की एक छोटी रानी सुंदरदेई थी। उसने भी परमेश्वर कबीर जी से दीक्षा ले रखी थी। उसने सत्संग बहुत सुने थे। विश्वास कम था, नाम की कमाई यानि साधना नहीं करती थी। जब रानी का अंतिम समय आया तो यम के दूत राजभवन में प्रवेश कर गए। फिर यमदूत रानी के शरीर में प्रवेश कर गए और अंतिम श्वांस का इंतजार करने लगे। उस समय रानी सुंदरदेई के शरीर में बेचैनी हो गई। यमदूत दिखाई देने लगे। राजा ने रानी से पूछा कि क्या बात है? रानी ने कहा कि मुझे राजपाट, महल, आभूषण, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। रानी ने कहा कि साधु-भक्तों को बुलाकर परमात्मा की चर्चा कराओ। साधु तथा भक्त आकर परमात्मा की चर्चा तथा भक्ति करने लगे। उससे कोई लाभ नहीं हुआ। रानी के शरीर में कष्ट और बढ़ गया। अर्ध-अर्ध यानि आधा श्वांस चलने लगा। श्वांस खींच-खींचकर आने-जाने लगा। हृदय कमल को त्यागकर जीव भयभीत होकर त्रिकुटी की ओर भागा। यम दूतों ने चारों ओर से घेर लिया। चारों यमदूतों ने जीव को घेरकर कहा कि आप चलो! हरि ने तुम्हें बुलाया है। तब रानी के जीव को सत्संग वचन याद आए। उसने यमदूतों से कहा कि हे बटपार! हे जालिमों! तुम यहाँ कैसे आ गए? हमारा सतगुरू हमारा मालिक है। आप हमें नहीं ले जा सकते। मेरे सतगुरू धनी ने मुझे नाम दिया है। मेरे गुरूजी आएंगे तो मैं जाऊँगी। यह बात सुनकर यम के दूत बोले कि यदि आपका कोई खसम है तो उसको बुलाओ, नहीं तो हमारे साथ परमात्मा के दरबार में चलो। जीव ने कहा कि :- धरनी आकाश से नगर नियारा। तहाँ निवाजै धनी हमारा।। अगम शब्द जब भाखै नाऊं। तब यम जीव के निकट नहीं आऊं। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो सतगुरू जी सत्संग में ज्ञान सुना रहे हैं, वह सत्य है। वह सोचती थी कि यह केवल कहानी है क्योंकि सब नौकर-नौकरानी आज्ञा मिलते ही दौड़े आते थे। मनमर्जी का खाना खाती थी, सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनती थी। उसने सोचा था कि ऐसे ही आनन्द बना रहेगा। यह तो पूर्व जन्म की बैटरी चार्ज थी। वर्तमान में चार्जर मिला (नाम मिला) तो चालू नहीं किया यानि साधना नहीं की। जब बैटरी की चार्जिंग समाप्त हो जाती है, बैटरी डाउन हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं बंद हो जाती हैं। फिर न पंखा चलता है, न बल्ब जगता है। बटन दबाते रहो, कोई क्रिया नहीं होती। इसी प्रकार जीव का पूर्व जन्म की भक्ति का धन यानि चार्जिंग समाप्त हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं छीन ली जाती हैं। जीव को नरक में डाल दिया जाता है, तब उसको अक्ल आती है। उस समय वक्त हाथ से निकल चुका होता है। केवल पश्चाताप और रोना शेष रह जाता है। रानी सुंदरदेई ने सत्संग सुन रखा था। पूर्ण सतगुरू से दीक्षा ले रखी थी। नाम की कमाई नहीं की थी। वह गुरूद्रोही नहीं हुई थी। गुरू निंदा नहीं करती थी। रानी ने सतगुरू को याद किया कि हे सतगुरू! हे मेरे धनी! मेरे को यमदूतों ने घेर रखा है। मुझ दासी को छुड़ावो। मैंने आपकी दीक्षा ले रखी है। आज मुझे पता चला कि ऐसी आपत्ति में न पति, न पत्नी, ने बेटा-बेटी, भाई-बहन, राजा-प्रजा कोई सहायक नहीं होता। रानी के जीव ने हृदय से सतगुरू को पुकारा। तुरंत सतगुरू कबीर जी वहाँ उपस्थित हुए। रानी ने दौड़कर सतगुरू देव जी के चरण लिए। उसी समय यमदूत भागकर हरि यानि धर्मराज के पास गए और बताया कि उसका सतगुरू आया तो वहाँ पर प्रकाश हो गया। जीव ने सत सुकृत नाम जपा था। उसको इतना ही याद था। इस कारण से उसको यमदूतों से छुड़वाया तथा पुनः जीवन बढ़ाया। तब रानी ने दिल से भक्ति की। फिर सतगुरू कबीर जी ने पुनः सतनाम, सारनाम दिया, उसकी कमाई की। संसार असार दिखाई देने लगा। राज, धन, परिवार पराया दिखाई दे रहा था। जाने का समय निकट लग रहा था। इस कारण से रानी ने तन-मन-धन सतगुरू चरणों में समर्पित करके भक्ति की तो सत्यलोक में गई। वहाँ परमेश्वर (सत्य पुरूष) ने रानी के जीव के सामने अपने ही दूसरे रूप सतगुरू से प्रश्न किया कि हे कडि़हार! (तारणहार) मेरे जीव को यमदूतों ने कैसे रोक लिया? सतगुरू रूप में कबीर जी ने कहा कि हे परमेश्वर! इसने दीक्षा लेकर भक्ति नहीं की। इस कारण से इसको यमदूतों ने घेर लिया था। मैंने छुड़वाया। परमेश्वर कबीर जी ने जीव से कहा कि आपने भक्ति क्यों नहीं की? सत्यलोक में कैसे आ गई? सिर नीचा करके जीव ने कहा कि पहले मुझे विश्वास नहीं था। फिर यमदूतों की यातना देखकर मुझे आपकी याद आई। आपका ज्ञान सत्य लगा। आपको पुकारा। आपने मेरी रक्षा की। फिर मेरे को वापिस जीवन दिया गया। तब मैंने दिलोजान से आपकी भक्ति की। पूर्ण दीक्षा प्राप्त करके आपकी ही कृपा से गुरू जी के सहयोग से मैं यहाँ आपके चरणों में पहुँच पाई हूँ। सत्यलोक में जाकर भक्त अन्य भक्तों के पास भेज दिया जाता है। सुंदर अमर शरीर मिलता है। बहुत बड़ा आवास महल मिलता है। विमान आँगन में खड़ा है। सिद्धियां आदेश का इंतजार करती हैं। तुरंत विद्युत की तरह सक्रिय होती हैं जैसे बिजली का बटन दबाते ही बिजली से चलने वाला यंत्र तुरंत कार्य करने लगता है। ऐसे वहाँ पर वचन का बटन हैं। जो वस्तु चाहिए बोलिये। वस्तु-पदार्थ आपके पास उपस्थित होगा। जैसे भोजन खाने की इच्छा होते ही आपके भोजनस्थल पर गतिविधि प्रारम्भ हो जाएंगी, थाली-गिलास रखे जाएंगे। कुछ देर में खाने की इच्छा बनी तो सिद्धि से उठकर रसोई में रखे जाएंगे। मिनट पश्चात् इच्छा हुई तो भी उसी समय व्यवस्था हो जाएगी। घूमने की इच्छा हुई तो विमान में गतिविधि महसूस होगी। विमान के निकट जाते ही द्वार खुल जाएगा। विमान स्टार्ट हो जाएगा। जहाँ जिस द्वीप में जाने की इच्छा होगी, विचार करने पर विमान उसी ओर उड़ चलेगा। इच्छा करते ही ताजे-ताजे फल वृक्षों से तोड़कर लाकर आपके समक्ष रख दिए जाएंगे। सत्यलोक की नकल यह काल लोक है। इसी तरह स्त्री-पुरूष परिवार हैं। सत्यलोक में दो तरह से संतानों की उत्पत्ति होती है। शब्द से तथा मैथुन से। वह हंस पर निर्भर करता है। वचन से संतानोपत्ति वाला क्षेत्र सतपुरूष के सिंहासन के चारों ओर है। नर-नारी से परिवार वाला क्षेत्र उसके बाद में है। वचन से संतान उत्पन्न करने वाले केवल नर ही उत्पन्न करते हैं। सत्यलोक में वृद्धावस्था नहीं है। नर-नारी वाले क्षेत्र में लड़के तथा लड़कियां दोनों उत्पन्न करते हैं। विवाह करते हैं केवल वचन से। जो बच्चे उत्पन्न होते हैं, वे काल लोक से मुक्त होकर गए जीव जन्म लेते हैं। फिर कभी नहीं मरते, न वृद्ध होते। जो सत्यलोक में मुक्त होकर जाते हैं, उनको सर्वप्रथम सत्यपुरूष जी के दर्शन कराए जाते हैं। उस समय उसका वही स्वरूप रहता है जैसा पृथ्वी से आता है, परंतु वृद्ध नीचे से गया तो वहाँ सतपुरूष के सामने उसी अवस्था व स्वरूप में जाता है। उसका प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश जितना हो जाता है। उसके पश्चात् उसको उस स्थान पर भेजा जाता है जो सबसे भिन्न है। वहाँ जाते ही उसका स्वरूप तो वैसा ही रहता है, लेकिन उसके शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों जैसा हो जाता है, परंतु यदि वृद्ध नीचे से गया है तो युवा अवस्था हो जाती है। जवान है तो जवान ही रहता है, बालक है तो बालक ही रहता है। वहाँ पर कुछ को सत्य पुरूष के वचन से स्त्री-पुरूष का शरीर मिलता है। कुछ बीज रूप में सतपुरूष द्वारा बनाए जाते हैं जिनका फिर एक बार किसी के घर सत्यलोक में जन्म होगा, परिवार बनेगा। उस स्थान पर वे हंस एक बार जन्म लेंगे जो काल लोक तथा अक्षर लोक से मुक्त होकर जाते हैं। एकान्त स्थान पर रखे जाते हैं। वे दोनों क्षेत्रों में जन्म लेते हैं। (वचन से उत्पन्न होने वाले तथा स्त्री-पुरूष से जन्म लेने वाले में) स्त्री-पुरूष से उत्पत्ति की औसत अधिक होती है। यह औसत 10-90 होती है। यह 10ः वचन से उत्पत्ति, 90ः विवाह रीति से उत्पत्ति होती है। सत्यलोक में स्त्री तथा नर के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। मीनी सतलोक, मानसरोवर पहले हैं। वहाँ दोनों के शरीर का प्रकाश चार सूर्यों के समान होता है। फिर आगे जाते हैं। जब परब्रह्म के लोक में बने अष्ट कमल के पास पहुँचते हैं तो हंस तथा हंसनी यानि नर-नारी के शरीर का प्रकाश 12 सूर्यों के प्रकाश के समान हो जाता है। फिर सत्यलोक में बनी भंवर गुफा में प्रत्येक के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के समान हो जाता है। Sa True Story YouTube
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