#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रों की बालक्रीड़ा, दुर्योधन का भीमसेन को विष खिलाना तथा गंगा में ढकेलना और भीम का नागलोक में पहुँचकर आठ कुण्डों के दिव्य रस का पान करना...(दिन 378)
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ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः स्वयम् ।
मृतकल्पं तदा वीरं स्थलाज्जलमपातयत् ।। ५४ ।।
तब दुर्योधनने स्वयं लताओंके पाशमें वीरवर भीमको कसकर बाँधा। वे मुर्देके समान हो रहे थे। फिर उसने गंगाजीके ऊँचे तटसे उन्हें जलमें ढकेल दिया ।। ५४ ।।
स निःसङ्गो जलस्यान्तमथ वै पाण्डवोऽविशत् । आक्रामन्नागभवने तदा नागकुमारकान् ।। ५५ ।।
ततः समेत्य बहुभिस्तदा नागैर्महाविषैः । अदश्यत भृशं भीमो महादंष्ट्रर्विषोल्बणैः ।। ५६ ।।
भीमसेन बेहोशीकी ही दशामें जलके भीतर डूबकर नागलोकमें जा पहुँचे। उस समय कितने ही नागकुमार उनके शरीरसे दब गये। तब बहुत-से महाविषधर नागोंने मिलकर अपनी भयंकर विषवाली बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे भीमसेनको खूब हँसा ।। ५५-५६ ।।
ततोऽस्य दश्यमानस्य तद् विषं कालकूटकम् । हतं सर्पविषेणैव स्थावरं जङ्गमेन तु ।। ५७ ।।
उनके द्वारा डॅसे जाने से कालकूट विषका प्रभाव नष्ट हो गया। सर्पों के जंगम विष ने खाये हुए स्थावर विषको हर लिया ।। ५७ ।।
दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः । त्वचं नैवास्य बिभिदुः सारत्वात् पृथुवक्षसः ।। ५८ ।।
चौड़ी छातीवाले भीमसेनकी त्वचा लोहेके समान कठोर थी; अतः यद्यपि उनके मर्मस्थानोंमें सर्पोंने दाँत गडाये थे, तो भी वे उनकी त्वचाको भेद न सके ।। ५८ ।।
ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वं संछिद्य बन्धनम् । पोथयामास तान् सर्वान् केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः ।। ५९ ।।
तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन भीम जाग उठे। उन्होंने अपने सारे बन्धनोंको तोड़कर उन सभी सर्पोंको पकड़-पकड़कर धरतीपर दे मारा। कितने ही सर्प भयके मारे भाग खड़े हुए ।। ५९ ।।
हतावशेषा भीमेन सर्वे वासुकिमभ्ययुः ।
ऊचुश्च सर्पराजानं वासुकिं वासवोपमम् ।। ६० ।।
भीमके हाथों मरनेसे बचे हुए सभी सर्प इन्द्रके समान तेजस्वी नागराज वासुकिके समीप गये और इस प्रकार बोले ।। ६० ।।
अयं नरो वै नागेन्द्र ह्यप्सु बद्ध्वा प्रवेशितः । यथा च नो मतिर्वीर विषपीतो भविष्यति ।। ६१ ।।
'नागेन्द्र ! एक मनुष्य है, जिसे बाँधकर जलमें डाल दिया गया है। वीरवर! जैसा कि हमारा विश्वास है, उसने विष पी लिया होगा ।। ६१ ।।
निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्तः स च दष्टोऽन्वबुध्यत । ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु नः ।। ६२ ।।
पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि ।
'वह हमलोगोंके पास बेहोशीकी हालतमें आया था, किंतु हमारे डॅसनेपर जाग उठा और होशमें आ गया। होशमें आनेपर तो वह महाबाहु अपने सारे बन्धनोंको शीघ्र तोड़कर हमें पछाड़ने लगा है। आप चलकर उसे पहचानें' ।। ६२३ ।।
ततो वासुकिरभ्येत्य नागैरनुगतस्तदा ।। ६३ ।।
पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम् । आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च ।। ६४ ।।
तदा दौहित्रदौहित्रः परिष्वक्तः सुपीडितम् । सुप्रीतश्चाभवत् तस्य वासुकिः स महायशाः ।। ६५ ।।
अब्रवीत् तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम् । धनौघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम् ।। ६६ ।।
तब वासुकिने उन नागोंके साथ आकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमसेनको देखा। उसी समय नागराज आर्यकने भी उन्हें देखा, जो पृथाके पिता शूरसेनके नाना थे। उन्होंने अपने दौहित्रके दौहित्रको कसकर छातीसे लगा लिया। महायशस्वी नागराज वासुकि भी भीमसेनपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- 'इनका कौन-सा प्रिय कार्य किया जाय? इन्हें धन, सोना और रत्नोंकी राशि भेंट की जाय' ।। ६३-६६ ।।
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत । यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः ।। ६७ ।।
उनके यों कहनेपर आर्यक नागने वासुकिसे कहा- 'नागराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यह धनराशि लेकर क्या करेगा' ।। ६७ ।।
रसं पिबेत् कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः । बलं नागसहस्रस्य यस्मिन् कुण्डे प्रतिष्ठितम् ।। ६८ ।।
'आपके संतुष्ट होनेपर तो इस महाबली राजकुमारको आपकी आज्ञासे उस कुण्डका रस पीना चाहिये, जिससे एक हजार हाथियोंका बल प्राप्त होता है ।। ६८ ।।
यावत् पिबति बालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम् । एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत ।। ६९ ।।
'यह बालक जितना रस पी सके, उतना इसे दिया जाय।' यह सुनकर वासुकिने आर्यक नागसे कहा 'ऐसा ही हो' ।। ६९ ।।
ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः । प्राङ्मुखश्चोपविष्टश्च रसं पिबति पाण्डवः ।। ७० ।।
तब नागोंने भीमसेनके लिये स्वस्तिवाचन किया। फिर वे पाण्डुकुमार पवित्र हो पूर्वाभिमुख बैठकर कुण्डका रस पीने लगे ।। ७० ।।
एकोच्छ्वासात् ततः कुण्डं पिबति स्म महाबलः । एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिबत् पाण्डुनन्दनः ।। ७१ ।।
वे एक ही साँसमें एक कुण्डका रस पी जाते थे। इस प्रकार उन महाबली पाण्डुनन्दनने आठ कुण्डोंका रस पी लिया ।। ७१ ।।
ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुजः । अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदमः ।। ७२ ।।
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेन नागोंकी दी हुई दिव्य शय्यापर सुखपूर्वक सो गये ।। ७२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमसेनरसपाने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके रसपानसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🪷
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