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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*परब्रह्म परमेश्वर ने विचित्र संसार की रचना की , जिसे हमारे सनातन के ग्रन्थों ने दुखालय अर्थात दुख का घर कहा है ! इस संसार में जन्म लेने के बाद प्रत्येक व्यक्ति सुखी होना चाहता है , परंतु वह सुखी कैसे हो सकता है इस पर कभी विचार नहीं करता ! यदि इस महत्वपूर्ण विषय पर विचार किया जाय तो यही परिणाम निकलता है कि सुखी होने के लिए व्यक्ति में सुमति का होना परम आवश्यक है ! सुमति का अर्थ होता है सद्बुद्धि - विवेक आदि ! यदि व्यक्ति में सुमति हो हो तो वह सुंदर सोंचता है और सुंदर करता भी है ! सुमति ही सुकर्म की जननी है ! यदि व्यक्ति में सुमति हो तो वह सुकर्म और शुभकर्म करता है ! इसी सुकर्म से ही उसे सुख प्राप्त होता है ! इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि सुख की कामना करने वालों को अपनी सुमति को जागृत करना पड़ेगा ! जहां सुख का कारण सुमति है वही दुख का कारण कुमति को कहा गया है , क्योंकि कुमति ही कुकर्म की जननी है ! जिसमें कुमति होती है वह प्रतिपल बुरा सोचता है और बुरा ही करता भी है ! कुमति से प्रेरित होकर के व्यक्ति अनेकों प्रकार के कुकर्म , दुष्कर्म , पाप कर्म आदि करता है , जिसका परिणाम उसे दुख के रूप में प्राप्त हो जाता है ! यदि व्यक्ति में सुमति हो तो वह सुंदर सोचता है सुंदर ही करता है जिसके परिणाम स्वरूप वह सुंदर सुख पाता है ! व्यक्ति को सुखी बनाने में सुमति का बहुत बड़ा स्थान है तो वही दुखी बनाने के लिए कुमति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है !*
**आज जिधर भी दृष्टि उठा कर देखो कोई भी सुखी दिखाई नहीं पड़ता , इसका कारण यही है कि लोगों ने सुमति का त्याग कर दिया है ! कुमति से प्रेरित होकर के मनुष्य दुखी होता है क्योंकि संसार में जितने दुख हैं वे सभी कुमति , कुबुद्धि , दुर्बुद्धि के कारण ही हैं ! मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" स्पष्ट करना चाहता हूं कि लड़ाई - झगड़ा आलस्य - दरिद्रता , व्यसन - कुविचार , भ्रष्टाचार - छल प्रपंच , अन्याय - अत्याचार आदि बुरे कर्मों की जननी कुमति ही है ! कुमति से प्रेरित होकर के ही मनुष्य ऐसे बुरे कर्मों को करता है और जिसके कारण वह जीवन में कष्ट - क्लेश , कलह - अशांति , अभाव - चिंता आदि प्राप्त करता रहता है ! बाबा जी मानस में स्पष्ट कर देते हैं :- "जहां सुमति तहँ संपत्ति नाना ! जहां कुमति तहँ विपत्ति निदाना !!" कहने का तात्पर्य यह है कि अनेकों प्रकार के सुख - साधन होने के बाद भी यदि सुमति नहीं है तो मनुष्य सुखी नहीं हो सकता ! सुखी होने का आधार सुमति ही है ! अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने मति को निर्मल करते हुए सुमति के मार्ग का अनुयायी बनना चाहिए जिससे कि वह इस दुखालय (संसार) में सुख प्राप्त कर सके , क्योंकि यदि व्यक्ति के मस्तिष्क में सुमति है तो वह सत्कर्म और पुरुषार्थ करने को प्रेरित होगा और यदि कुमति है तो उससे प्रेरित होकर वह पाप - पतन और पराभव की ओर अग्रसर हो करके दुख को प्राप्त होता रहेगा !*
*इस दुख भरे संसार में सुख प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय है कि अपनी मति को निर्मल बनाए रखते हुए सुकर्म करते रहें !*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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