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*।। भक्ति विशेषांक।।*
जो मनुष्य श्रद्धा भाव से भगवान में मन लगाकर प्रेम से भजन करता है, वह युक्ततम- सर्वोत्तम योगी है।
श्री भगवान के पूजन में पत्र पुष्प फल और जल का प्रयोग किया जाता है, जो सर्वत्र सरलता पूर्वक मिल जाते हैं।
श्री भगवान के पूजन में दुर्लभ बहुमूल्य वस्तुओं के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है। भक्ति में भाव की प्रधानता होती है, वस्तु की नहीं। वस्तु केवल आधार का काम करती है। भक्ति में श्री भगवान के नाम का कीर्तन किया जाता है, उनकी लीला का पठन-पाठन और गायन होता है। श्री भगवान को प्रणाम करना भी भक्ति है। श्री भगवान को कर्म फलअर्पण करना भक्ति है। भक्तों के लिए श्रीभगवान सबसे बढ़कर हैं।
भक्तों का योग क्षेम श्री भगवान स्वयं वहन करते हैं। श्री भगवान भक्तों का भव सागर से स्वयं उद्धार करते हैं।
भक्त श्री भगवान की शरण लेता है। श्री भगवान भक्तों का पाप ताप हर लेते हैं और उनको परम शांति परमसुख अक्षय परमानंद प्रदान करते हैं। श्री भगवान भक्तों का अज्ञान दूर करके उनके ह्रदय में परम ज्ञान का प्रकाश भर देते हैं। भक्त श्रीभगवान की आत्मा हैं। भक्तों की प्रतिज्ञा श्री भगवान अपनी प्रतिज्ञा मानकर स्वयं पूर्ण करते हैं। श्री भगवान भक्तों का कष्ट दूर करते हैं और उन्हें हर प्रकार की विपत्ति से- संकट से बचाते हैं। वीतराग संन्यासी को परा भक्ति मिलती है। भक्ति करना सरल है। भक्ति में कठिन और जटिल क्रियाएं नहीं करनी पड़ती हैं। भक्त श्रीभगवान के भरोसे रहता है। भक्तों को श्रीभगवान का दर्शन प्राप्त होता है। भक्ति में सरल भाव और शुद्ध हृदय की आवश्यकता है, भक्ति में प्रेम की प्रधानता है। जो भक्त भोग चाहता है, उसे श्री भगवान दिव्य भोग प्रदान करते हैं और जो मोक्ष चाहता है, उसे परमधाम प्रदान करते हैं। श्री भगवान अपने भक्तों की कभी दुर्गति नहीं होने देते, उन्हें नरक से बचा लेते हैं। भगवत् कृपा से भक्त भविष्य में होने वाली घटनाओं को भी जान जाते हैं। भक्त स्वयं तो तरते ही हैं, वे दूसरों को भी तरने में सहायता करते हैं अर्थात् तार देते हैं। भक्तों की रक्षा के लिए ही श्री भगवान बार बार अवतार लेते हैं। श्री भगवान भक्तों का उसी प्रकार पालन पोषण सेवा करते हैं जैसे माता अपने छोटे बच्चे शिशु की दिन-रात देखभाल और सेवा करती है। भक्तों का कभी विनाश नहीं किया जा सकता, क्योंकि श्री भगवान स्वयं भक्तों की रक्षा करते हैं। युद्ध में श्री भगवान ने अर्जुन की विविध प्रकार से रक्षा की। जैसे राजा भगदत्त ने जब अमोघ वैष्णव अस्त्र चलाया तब श्री कृष्ण भगवान स्वयं खड़े होकर उसकी चोट सह लिए और अर्जुन को बचा लिए। द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने जब अमोघ आग्नेयास्त्र छोड़ा तो उन्होंने अर्जुन को बचा लिया। उस समय अर्जुन के पीछे चलने वाली सारी सेना क्षणभर में भस्म हो गई। अर्जुन का रथ दिव्यास्त्रों से बहुत पहले ही जल गया था, लेकिन श्री कृष्ण भगवान ने योगबल से उसे बचाए रखा और जब युद्ध समाप्त हो गया, तब उन्होंने अर्जुन को पहले उतरने के लिए कह कर अपने पीछे उतरे और दिव्य रथ सहसा जलकर भस्म हो गया और सब लोग यह घटना देखकर आश्चर्यचकित हो गए। *भक्त ध्रुव, भक्त प्रहलाद, महाराज अंबरीष, भक्त गजेंद्र, महारानी द्रौपदी, महामति विदुर, महर्षि कल्प संजय, सभी पांडव, महर्षि व्यास, देवर्षि नारद, महामुनि मार्कंडेय, महर्षि लोमश, अजेय महारथी महाबाहु भीष्म पितामह, ब्रह्मर्षि सनत्कुमार, महाराज मनु, पितामह ब्रह्मा जी,भगवान शिवजी, माता पार्वती जी, माता सरस्वती जी, माता लक्ष्मी जी, महर्षि वाल्मीकि, महाबली हनुमान जी, महाराज विभीषण, माता शबरी, लोकपाल यमराज, इत्यादि भक्तों की कथा सभी लोग जानते हैं।* अत: हम सब का पावन कर्तव्य है कि अनन्य मन से श्री भगवान की भक्ति करें। श्री भगवान ने इस द्वादश अध्याय में भक्ति का सरल और सुंदर वर्णन विस्तार से किया है। श्री भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त गीता जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। इसलिए *श्री भगवान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जो गीता को मेरे भक्तों को पढ़ायेगा, उस से बढ़कर मेरा कोई प्रिय मनुष्य भूत भविष्य और वर्तमान में हो ही नहीं सकता।* इसलिए हम लोगों को चाहिए कि हम लोग गीता पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएं ताकि अपना भी कल्याण हो और दूसरों का भी कल्याण हो।
*परम ब्रह्म परमात्मा वासुदेव भगवान श्री कृष्ण की जय।*
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