रुक्मणी द्वादशी
आज परशुराम द्वादशी है। आज के दिन को रुक्मिणी द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं इसी दिन देवी रुक्मिणी का अविर्भाव हुआ था। इसके अलावा आपको ये भी बता दूं कि आज की द्वादशी कोई सामान्य द्वादशी नहीं है, बल्कि ये महाद्वादशी है।
रुक्मिणी और भगवान कृष्ण की प्रेम कहानी और उनका पलायन भगवान कृष्ण से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। रुक्मिणी द्वादशी वैशाख महीने (अप्रैल-मई) के शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के वैक्सिंग चरण) के बारहवें दिन मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग पूजा-अर्चना करते हैं और फूलों से पूजा करते हैं, उनकी मनोकामना पूरी होती है।
रुख्मिणी देवी को समर्पित प्रार्थनाएं भगवान कृष्ण मंदिरों में दिन में आयोजित की जाती हैं। मथुरा के द्वारकादीश मंदिर में इस दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। रुक्मणी रहण, विवाह और प्रेम का प्रसंग अलग अलग मिलता है। महाभारत के अनुसार विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के 5 भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मिणी सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे अतः लोग उसे लक्ष्मीस्वरूपा कहा करते थे।
शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। रुक्म ने माता-पिता के विरोध के बावजूद अपनी बहन का शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा, तो वह बड़ी दुखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारिका श्रीकृष्ण के पास भेजा। रुक्मणी का विवाह भी बहुत रोचक परिस्थितियों में हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले रुक्मणी से ही विवाह किया था। श्रीमद्भागवत गीता में इस विवाह का वर्णन रोचक तरीके से मिलता है। भागवत कथा का जहां भी आयोजन होता है वहां इस विवाह की नाटकीय रूप से प्रस्तुति की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीशुकदेवजी राजा परीक्षित को सुनाते हैं।
#शुभ कामनाएँ 🙏