#🙏गीता ज्ञान🛕
🍁*"कमी बड़ी खटकती है"*🍁
🌍संसार में जितने प्राणी कैद में पड़े हैं, जितने चौरासी लाख योनियों और नरकों में पड़े हैं, उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयों का भोग किया है, उनसे सुख लिया है, इसी से वे कैद, नरक आदि में दुःख पा रहे हैं; क्योंकि राजस सुख का परिणाम दुःख होता ही है-🌍 *'रजसस्तु फलं दुःखम्'* (गीता १४।१६)।
🛐*आज भी जो लोग घबरा रहे हैं, दुःखी हो रहे हैं, वे सब पदार्थों के राग के कारण ही दुःख पा रहे हैं।* जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है, वह जितना दुःखी और संतप्त है, उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धन को नहीं है; क्योंकि उसके भीतर सुख के संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनी ने राजस सुख अधिक भोगा है, उसके भीतर सुख के संस्कार अधिक पड़े हैं, इसलिये उसको धन के अभाव का दुःख ज्यादा है। जैसे, जो मनुष्य तरह- तरह की सामग्री का भोजन करने वाला है, उसके भोजन में कभी थोड़ी-सी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजन में चटनी नहीं है, खटाई नहीं है, मिठाई नहीं है, अमुक अमुक चीज नहीं है-इस प्रकार नहीं-नहीं का ही ताँता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरे की रूखी-सूखी रोटी खाकर भी मौज से रहता है, उसको भोजन में किसी चीज की कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि *पदार्थों के संयोग से जितना ज्यादा सुख लिया है, उतना ही उसके अभाव का अनुभव होता है। अभाव के अनुभव में दुःख ही होता है।*🛐
🙏*राम !.राम!!.राम !!!*🙏